जब कुशवाहा के सख्त तेवर देख मुंह ताकते रह गए थे अमित शाह

लाइव सिटीज डेस्क (रुद्र प्रताप सिंह) :बात इतनी भर नहीं है कि एनडीए के दूसरे घटक दलों को जगह न देने की नीति के चलते जदयू के सांसद केंद्रीय  कैबिनेट में दाखिल नहीं हो पाए. सच यह है कि रालोसपा की धमकी के बाद ही भाजपा ने जदयू को हालिया विस्तार में उपकृत करने से मना कर दिया. रालोसपा के अध्यक्ष और मानव संसाधन राज्यमंत्री उपेंद्र कुशवाहा और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बीच मुलाकात के चंद मिनट बाद ही जदयू को संदेश दे दिया गया था कि केंद्र सरकार में भागीदारी के लिए वह थोड़ा सब्र करे.
-उपेंद्र ने क्या कह दिया
रालोसपा से जुड़े सूत्र बताते हैं कि विस्तार से ठीक पहले कुशवाहा को अमित शाह ने मुलाकात के लिए बुलाया. बातचीत शुरू हुई. शाह ने कुशवाहा से कहा कि वे कुछ दूसरे मंत्रियों की तरह इस्तीफा दे दें. उपेंद्र ने बिना समय गंवाए जवाब दिया-हम इस्तीफा नहीं देने जा रहे हैं. आप चाहें तो बर्खास्त कर दें. कहते हैं कि कुशवाहा की इस तल्खी से शाह का मुंह खुला का खुला रह गया. उपेंद्र ने यह भी जोड़ा कि बर्खास्तगी के संदेश को जनता किस तरह ग्रहण करेगी, हम नहीं जानते हैं. लेकिन, केंद्र की ऐसी कार्रवाई के बाद वे जनता के बीच जाने के लिए स्वतंत्र हैं.
-पासवान को मिला पंचायती का जिम्मा
खबर है कि कुशवाहा को समझाने का जिम्मा लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान को दिया गया. पासवान ने उन्हें फोन कर घर बुलाया. कुशवाहा इसके लिए राजी नहीं हुए. दोनों की मुलाकात तीसरे जगह पर हुई. यहां भी उपेंद्र की तल्खी कम नहीं हुई. व कह कर निकल गए-नीतीश कुमार के दबाव में यह सब हो रहा है. केंद्र सरकार कार्रवाई करे. हम निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हो जाएंगे. उन्होंने कहा कि किसी भी हालत में नीतीश के दबाव को स्वीकार नहीं कर सकते.
-क्यों हुआ यह नाटक
असल में जदयू ने अपने सांसद संतोष कुशवाहा को कैबिनेट में शामिल करने की इच्छा जाहिर की थी. भाजपा अध्यक्ष को यह बताया गया था कि संतोष अपेक्षाकृत युवा हैं. मंत्री की हैसियत से वे अपनी बिरादरी के बीच जाएंगे तो कुशवाहा वोटरों का रूझान भाजपा-जदयू गठबंधन की ओर बढ़ेगा. रणनीति यही थी कि संतोष को एनडीए के अंदर उपेंद्र के विकल्प के तौर पर उभारा जाए. यह एक तरह से उपेंद्र को कमजोर करने का भी एक रास्ता था. उपेंद्र के बारे में भाजपा नेतृत्व को यह फीड बैक भी दिया गया कि ये किसी भी समय राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद से मिल सकते हैं.
-पुराना है टकराव
यूं तो उपेंद्र कुशवाहा नरम मिजाज के माने जाते हैं, लेकिन ऐतिहासिक कारणों से उनके मन में नीतीश के प्रति सम्मान का घोर अभाव है. याद होगा कि उपेंद्र ने नीतीश के साथ टकराव के चलते ही राज्यसभा की सदस्यता छोड़ी थी. इसके बाद वे सड़क पर आ गए थे. मगर, इस अंजाम की उन्होंने परवाह नहीं की. असल में विवाद पुराना है. विपक्ष के नेता पद पर रहने के कारण कुशवाहा खुद को सीएम पद के स्वाभाविक दावेदार मानते रहे हैं. लेकिन, सरकार बनने की नौबत आई तो नीतीश खुद सीएम बन गए. उसी दिन से कुशवाहा के मन में नीतीश के प्रति जो टीस पैदा हुई, वह आजतक कायम है.

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