गुरुद्वारे में ‘अमृत’ पीकर इंदिरा गांधी को मार देने की कसम खाई थी बेअंत-सतवंत ने

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फाइल फोटो

लाइवसिटीज डेस्‍क : 31 अक्टूबर 1984 का वो दिन आज भी भुलाया नहीं जा सकता है. भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या ने जैसे पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था. किसी ने नहीं सोचा था कि ऐसा भी हो सकता है. श्रीमती इंदिरा गांधी को उनके ही 2 अंगरक्षकों ने उनके ही सरकारी बंगले में गोलियों से भून दिया था.

हम आज आपको इस वारदात के बाद की कहानी का पूरा सच आपके सामने ला रहे हैं. आखिर क्या हुआ उन दो हत्यारों का जिन्होंने इंदिरा गांधी को मौत की नींद सुला दिया था.

जब बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने अपना काम खत्म कर लिया था, तभी कुछ सुरक्षा सैनिकों ने अपने क्वाटर्स से बाहर आकर  स्थिति को भांपा. बेअंत सिंह और सतवंत सिंह को मारते – कूटते हुए पास के गार्ड रूम में ले गए. दोनों हत्यारे वहां करीब 10 मिनट तक रहे. इस बीच इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस के दो पुलिसकर्मियों ने गोलियां चलाकर बेअंत सिंह का अंत कर दिया और सतवंत को बुरी तरह घायल. ये दोनों पुलिसकर्मी थे – इंस्पेक्टर शर्मा और कांस्टेबल दर्शन सिंह.

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गार्ड रूम के अधिकारियों का कहना था कि वे दोनों हत्यारों को बंद करने के लिए गार्ड रूम में आए थे और 12 कमांडो को उनकी रक्षा के लिए तैनात कर दिया था. इस बीच हत्‍यारे बेअंत सिंह ने एक कमांडो की पिस्तौल हथियाने की कोशिश की और सतवंत सिंह ने अपना कृपाण निकाल लिया. तब आत्म – रक्षा में उन्हें गोलियां चलाने को मजबूर होना पड़ा.

सतवंत सिंह ने पकड़े जाने के तुरंत बाद पुलिस को जो बयान दिया था, उसमें स्वीकार किया था कि उसने दिल्ली के बंगला साहिब गुरूद्वारे में “अमृत” लेकर शपथ ली थी कि वह श्रीमती गांधी की हत्या करेगा. पहले 13 अक्टूबर को हत्या की योजना बनी थी, लेकिन उसे आगे बढ़ाना पड़ा, क्योकि बेअंत सिंह प्रधानमंत्री निवास में हथगोले नहीं ला पाया था.

beant-satwantबेअंत सिंह और सतवंत सिंह

इंदिरा गांधी की हत्या के आरोप में बलबीर सिंह और केहर सिंह को भी गिरफ्तार किया गया. लम्बा मुकदमा चला. बलबीर को सबूतों के अभाव में छोड़ दिया गया पर सतवंत और केहर को फांसी की सजा हुई.

इन प्रारंभिक जांचों के परिणामस्वरूप, हत्या के लगभग सप्ताह बाद, दो सुरक्षा अधिकारियों जी.आर.गुप्ता और डी.सी.गुलिया को मुअत्‍तल कर दिया गया. सहायक कमिश्नर गुलिया पर यह आरोप था कि उन्हें सतवंत की ड्यूटी में कोई परिवर्तन नहीं होने देना चाहिए था.

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विशेष अदालत ने श्रीमती गांधी के हत्यारों को दोषी पाया और उन्हें दी गई फांसी की सजा काफी दिन रुकी रही। उनके वकीलों ने सर्वोच्च न्यायालय में इस निर्णय के विरुद्ध अपील की. फिर भी अंततः दोनों को फांसी हो गई.

श्रीमती गांधी की कायरतापूर्ण हत्या ने एक बार फिर यह बात निर्विवादित रूप से सिद्ध कर दी कि हिंसा राजनैतिक समस्यायों का समाधान कभी नहीं हो सकती. स्वयं श्रीमती गांधी ने एक बार कहा था कि, ‘हिंसा हमारी जीवन-पद्धति का अंग कभी नही बन सकती. हमारी नीति सदा उससे दूर रहने की है.’

सभी तस्वीरें विभिन्न स्रोतों से साभार

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