अब इस ‘बीमारी’ पर भी हमें बात करनी होगी

सेल्फी नाम से शायद ही अभी के वक़्त कोई अनजान होगा. हाथ मे स्मार्टफ़ोन हो और दिन में 3-4 बार सेल्फ़ी न लिया हो, ये सुन कर आज थोड़ा अजीब लगता है.

आज कल पटना में अगर किसी कॉलेज के पास से गुज़रेंगे तो सेल्फ़ी क्वीन्स दिख ही जाएंगी. नए नए दोस्त बनते ही उनके मुंह से सबसे पहले निकलने वाला वर्ड होता है “one selfi please” और फिर शुरू होता है सेल्फ़ी का सिलसिला. लेकिन कभी कभी हम ये भी बोलते हैं कि उसको तो सेल्फ़ी की बीमारी है. तो मैं बता दूँ ये सच है. ज्यादा सेल्फ़ी लेना भी एक बीमारी है. इसी टॉपिक पर लाइव सिटीज ने सायकॉलोजिस्ट और कुछ स्टूडेंट्स से बात की.

सेल्फी से जुड़ी ‘ऑब्सेसिव कंप्लसिव डिसऑर्डर’ एक ऐसी बीमारी है, जो हम में से बहुत लोग नही जानते होंगे. लेकिन यदि आप एक दिन में तीन बार से अधिक सेल्फी क्लिक कर सोशल मीडिया में पोस्ट करते हैं तो आप खुद को मानसिक बीमार बना रहे हैं और चाहे अनचाहे आप इस बीमारी के शिकार हो रहे हैं. वहीं सेल्फी का चढ़ता यह भूत खासकर यूथ को तेजी से अपनी चपेट में ले रहा है. तेजी से बढ़ रहे सेल्फी के जुनून और खुद को स्मार्ट दिखाने के चक्कर में यूथ जान जोखिम तक में डाल देते है.

सायकॉलोजिस्ट के मुताबिक मेट्रो सिटीज में तो बहुत पहले ये क्रेज है. लेकिन अब यह भूत शहर के बाद गांवों में भी आ चुका है जिसकी चपेट में करीब 60 परसेंट गर्ल्स हैं.

क्या है यह बीमारी

सेंट्रल यूनिवर्सिटी में कार्यरत सायकोलॉजी डिपार्टमेंट के प्रोफेसर डॉ. नरसिंह कुमार कहते हैं कि कोई व्यक्ति यदि सुबह से शाम तक कोई सेल्फी नहीं ले और उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट नहीं करे तो उसे बेचैनी होने लगती है. इसी बेचैनी को ‘ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर’ कहते हैं.

डॉ. नरसिंह

वहीं जरूरत से ज्यादा सेल्फी लेना बॉडी को ‘डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर’ नाम की बीमारी का भी शिकार बना रही है. अपनी फोटो बार-बार खींचना और डिलीट करते रहने की आदत एक तरह से मनोविकार है. लाइक, कमेंट्स भी इसकी एक वजह है.

साइकोलॉजिस्ट मंगलम कुमार का मानना है कि यदि यूथ कहीं बाहर जाते हैं तब डेंजर जोन में सेल्फी लेते हैं. ताकि सेल्फी सबसे अच्छी हो. इसी एडवेंचर के जुनून की हद में खुद को संकरी जगह, पहाड़ के किनारे, नदी के डेंजर जोन पर, किसी खंडहर या जर्जर इमारत को सेल्फी लेने के लिए चुनते हैं. फिर क्लिक किये गए सेल्फी को यूथ फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम या अन्य सोशल साइट्स पर शेयर करते हैं. इस दौरान लाइक्स और कमेंट पर निगाह लगाए रहने से ही बीमारी की शुरुआत होती है. मन मुताबिक लाइक्स नहीं मिलने से नर्वसनेस होती है. फिर वह इससे भी ज्यादा कुछ कर गुजरने लगते हैं, जो घातक होता है.

मंगलम के मुताबिक सेल्फ़ी नाम की बीमारी के शिकार होने वाले के कुछ लक्षण हैं –

– दिनचर्या के प्रत्येक मूमेंट को क्लिक करना

– पेशेंट में खुद को सेल्फ प्रमोट करने की आदत

– मोबाइल कैमरे को शार्टकट सेलेक्शन में रखना

– खुद की बेहतर सेल्फी लेने के लिए बेचैन होना

– चिंता से पीड़ित होना, डिप्रेशन का बढ़ना

– समाज, परिवार, फ्रेंड्स से जलन और दूरी

– खुद के लिए खुद ही खतरा बन जाना.

स्मृति

सायकोलॉजी स्टूडेंट स्मृति कहती हैं कि सेल्फी नहीं क्लिक करने पर बेचैनी होती है. लोगों ने टोकना शुरू किया तो खुद से छोड़ने की कोशिश की. पर सफल नहीं हो पाई. ये फैशन है.

संदीप

PhD स्कॉलर संदीप ने खुद का एक्सपीरियंस बताते हुए कहा – कई बार खुद ही फील हुआ कि अनचाहे ही सेल्फी ले रहा हूं. रूम में अकेले बैठे रहने पर कोई काम नहीं होता तो सेल्फ़ी ले लेता हूं. एक अच्छी नहीं आती तो गुस्सा आता है.10-20 ले लेता हूं. प्रॉब्लम को सायकोलॉजिस्ट से शेयर किया तो उन्होंने काउंसलिंग के लिए बुलाया है.

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