सावन को कह दिया गुडबाय, अब तो बस चिकन, मटन और फिश फ्राय!!

सावन बीत गया. इस बार सावन में पांच सोमवारी का संयोग था. सावन की विदायी तो अंतिम सोमवारी के साथ दो दिन ही हो गई. भक्तों ने बड़े ही संयम से सावन का माह बिताया. पूजा—पाठ में वक्त बीता. मदिरा तो बिहार में वर्जित ही है. मांस, मछली और अंडा पर सावन की वजह से पूर्ण विराम लगा रखा था. संभव है कुछ लोगों ने अंडा पर अर्द्ध विराम तक का ही संयम बरता हो. पूरे सावन माह में मुर्गा, मटन और मछली नहीं खाने की मजबूरी थी.

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सावन भले ही सोमवार को ही बीत गया लेकिन अगले दिन मंगलवार की मजबूरी ने नॉन वेज का प्लान एक दिन आगे के लिए टाल दिया. आज बुधवार है. आज नॉनवेज की कोई वंदिश नहीं ​है. नॉन वेज प्रेमियों के चेहरे पर आज सदाबहार माह सावन से जुदा होने की पीड़ा नहीं, मुक्त होने की खुशी झलक दिखाई दे रही है.

कई घरों में तो कल से ही प्लानिंग बन चुकी है कि कल तो कुछ कट—छट ही पकेगा. कई घरों में मैडम ने पहले ही एलान कर दिया है. अजी सुनते हैं, कल तो चिकेन ही बनेगा. पड़ोस वाले शर्मा जी को मुर्गे का मांस खाने में भसभस—सा लगता है, इसलिए इनके यहां तो मटन का प्लान है. कुछ यार दोस्त भी मटन का जायका लेने आ रहे हैं. प्याज की बढ़ी कीमत से थोड़ा दु:खी हैं. लेकिन दिल को तसल्ली दे रहे हैं कि एक माह बाद खा भी तो रहे हैं मटन. थोड़ा महंगा ही सही.

झा जी मिथिलांचल के हैं. माछ प्रेमी हैं. ओझाइन जी से उन्होंने कल ही कह दिया है कि कल तो वह बड नीक माछ  लेकर आने वाले हैं. आंध्रा वाला नहीं, अप्पन दरभंगा वाला. हमारे लिए पहले ही छांटकर रख देगा मछली वाला. दु:ख है कि टमाटर महंगा है लेकिन इससे क्या? माछ में डालने के लिए एक पौवा तो खरीद ही लेंगे. चाहे कितना भी महंगा टमाटर क्यों न रहे. ओझाइन जी ने कहा है कि तनियेक धनिया का पत्तो ले आइएगा. माछ में डालने से सुआद और निम्मन हो जाएगा. झा जी तैयार हो गए हैं – कोनो दिक्कत नय है. 10 टाका का धनिया पत्तो ले आएंगे.

झाजी आज ओझाइन जी का बात काटने का जोखिम नहीं उठाना चाहते हैं. बच्चों को सुबह स्कूल जाने की मजबूरी है. नहीं जाना रहता तो चुल्हा पर माछ चढा ही रहता तो बच्चे भूना हुआ एक दो पीस खाने के लिए उछल कूद जरूर मचाते. अब स्कूल से दोपहर में लौटेंगे तो झोर वाली मछली ही खाएंगे.

आज सुबह से ही मटन, मछली और मुर्गा के बाजार में रौनक छाया हुआ है. इतनी भीड़ जितनी कि स्कूलों में साइकिल—पोशाक योजना की राशि लेने के लिए स्कूली बच्चों और गार्जियन की भीड़ भी नहीं लगती. कई जगह तो ट्रैफिक नॉर्मल नहीं रह पाया.  मटन खाने के शौकीन सुबह से ही दुकान पर लाइन में लग गए थे. टेब लिया था कि फलां खस्सी कटेगा तो उसी में से लेंगे. डर था कि खस्सी कहकर कहीं बुढिया बकरी का मीट न तौल दे. फिर खुद ही दिल को तसल्ली देते हैं कि उसके पुराने कस्टमर हैं, दुकानदार हमारे साथ कुछ गड़बड़ नहीं कर सकता है.

मीट, मछली और मुर्गे की दुकान पर कुत्ते भी आज आश्वस्त हैं. इलाके के दूसरे कुत्तों को देख भौंक नहीं रहे हैं. तसल्ली है कि उनके खाने की कमी नहीं रहेगी. अभी लेदी पचौनी और थोड़ी देर बाद हड्डी—गुड्डी. जिनके घरों में आज किसी कारण से नॉनवेज नहीं बन रहा है वह रात को डिनर बाहर ही किसी अच्छे रेस्तरां में करेंगे. नहीं..नहीं.. पनीर-वनीर नहीं. आज तो कोई चिकन मटन का कोई बढ़िया आइटम होगा या बिरयानी होगी. आखिर एक माह का संयम टूट जो रहा है. क्या आप नॉनवेज लेते हैं? तो आपका क्या प्लान है?

सभी फोटोज इंटरनेट से साभार

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