बिहार की बहु-बेटियों ने छठ को बनाया ग्लोबल

कटिहार (प्रो दिलीप वत्स) : कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को मनाया जाने वाले यह महापर्व आज देश ही नही बल्कि कई अन्य देश मे मनाये जाता है. भारत में वैसे तो कई तरह के पर्व प्रचलित है. छठ महापर्व बिहार औऱ उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में लोकप्रिय होने के साथ आज यह पूरे देश में यह लोकआस्था का प्रतीक बन गया है.

दिवाली के छह दिनों के बाद छठ मनाया जाता है. आज यह नेपाल के तराई क्षेत्रों में भी बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है. सच यह कि बिहार की बहु-बेटियों शादी करके जिस जगह रहने लगती है, वहीं पर इस पर्व को मनाने लगती हैं. यही बजह है कि यह पर्व पटना घाट से लेकर राजधानी दिल्ली के यमुना घाट तक धूम मचा है.

क्या है छठ महापर्व का मुंगेर से पौराणिक कनेक्शन

वनवास के शुरुआती दिन मे श्री राम तथा माता सीता मुंगेर (बिहार) स्थित मुग्दल ऋषि के आश्रम मे रूके थे. माता सीता के मन मे चौदह वर्ष के वनवास को लेकर अपनी चिंता से ऋषि मुग्दल को अवगत कराया. मुग्दल ऋषि के सुझाव पर माता सीता ने मुंगेर के गंगा तट पर पहली बार छठ पूजा की शुरुआत की थी.

वनवास खत्म होने पर जब प्रभु राम अयोध्या लौटे तो रामराज्य के लिए राजसूर्य यज्ञ करने का निर्णय लिया गया. तब बाल्मीकि ऋषि ने माता सीता से बताया कि मुग्दलऋषि के बिना यह यज्ञ सफल नही हो पायेगा. तब प्रभु राम और सीता माता मुग्दल ऋषि को निमन्त्रण देने गए तो उन्होंने उन्हें छठ का व्रत रखने की सलाह दी थी.

भगवान सूर्यदेव की बहन है छठी मैया

छठ पूजा में सूर्य की पूजा की जाती है और यह पर्व पूरी तरह से सूर्य देव की उपासना पर आधारित है. विज्ञान भी सूर्य को विश्व के लिए शक्ति और ऊर्जा का स्त्रोत मानता है. माना जाता है कि छठ माता सूर्य देव की बहन है. छठी मैया को खुश करने के लिए सूर्य की आराधना करना काफी जरूरी होता है. इसके लिए शाम औऱ सुबह के समय सूर्य देव को जल चढ़ाते हैं.

छठ महापर्व को लेकर और भी है कई मान्यताएं

इतना ही नहीं हम आपको बता दें कि विज्ञान ने भी सूर्य को ऊर्जा का स्त्रोत माना है, छठ पूजा के रूप में सूर्य की पूजा करने से आप भी ऊर्जावान भाव और मन में शांति को महसूस होता है.पौराणिक मान्यता के अनुसार महाभारत में कुंती ने भी सूर्य की अराधना के लिए छठ व्रत किया था. साथ ही सावित्री के द्वारा सत्यवान के लिए छठ पर्व मनाये जाने की कहानी भी चर्चा है. एक अन्य मान्यता के अनुसार राजा प्रियंवद ने पुत्र इच्छा के कारण देवी षष्ठी की व्रत किया और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई थी. कहते हैं ये पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी. तभी से छठ पूजा होती है.

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