विशेष : सरदार पटेल न होते तो राजेंद्र बाबू नहीं बन पाते देश के पहले राष्ट्रपति

लाइव सिटीज डेस्क : भारत के लौह पुरुष माने जाने वाले सरदार वल्लभभाई पटेल की आज जंयती है. इस दिन को देशभर में राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जा रहा है. आज उनके जन्मदिन पर ‘रन फॉर यूनिटी’ का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें लोग देश की एकता के लिए दौड़ रहे हैं. स्वतंत्रता संग्राम से लेकर मजबूत और एकीकृत भारत के निर्माण में सरदार वल्लभभाई पटेल का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता. उनका जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व सदैव प्रेरणा के रूप में देश के सामने रहेगा. उन्होंने युवावस्था में ही राष्ट्र और समाज के लिए अपना जीवन समर्पित करने का निर्णय लिया था. इस ध्येय पथ पर वह नि:स्वार्थ भाव से लगे रहे.

डॉ. राजेंद्र प्रसाद को बनवाया राष्ट्रपति
वैसे तो पूरा देश सरदार पटेल के व्यक्तित्व को मानता है लेकिन बिहार को जो उन्होंने दिया उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता. आजादी के बाद देश को पहला राष्ट्रपति देने के लिए बिहार आज जो गर्व का अनुभव करता है, इसका श्रेय सरदार बल्लभ भाई पटेल को जाता है. पं. जवाहरलाल नेहरू चक्रवर्ती सी राजगोपालाचारी को राष्ट्रपति बनवाना चाहते थे, लेकिन पटले ने तो ठान लिया था कि जैसे भी डॉ. राजेंद्र प्रसाद को ही राष्ट्रपति बनाना है.

सीवान के जीरादेई निवासी बच्चा सिंह तथा जेपी सेनानी महात्मा भाई ने बताया कि राजेंद्र बाबू को जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रपति नहीं बनाना चाहते थे. जब औपबंधिक राष्ट्रपति नियुक्त करने की बात चल रही थी, तब नेहरू ने सी राजगोपालाचारी का नाम प्रस्तावित कर दिया था. इस प्रस्ताव का अनुमोदन खुद डॉ.राजेंद्र प्रसाद करने के लिए उठ गए थे, लेकिन सरदार पटेल द्वारा डांटकर बैठाने के बाद राजेंद्र बाबू चुप हो गए. सभा को समाप्त कर दिया गया.

इस घटना के बाद राजेंद्र बाबू जीरादेई चले गए. उधर, पटेल जी ने देश भर के सभी बड़े नेताओं का हस्ताक्षर राजेंद्र बाबू को राष्ट्रपति बनाए जाने के पक्ष में कराया. 20 दिनों तक यह काम होता रहा. फिर राजेंद्र बाबू को खोजते-खोजते दिल्ली से अनुग्रह बाबू के साथ कुछ लोग जीरादेई गए और उनको मनाकर दिल्ली ले गए. वहां पर 26 जनवरी 1950 को उन्हें औपबंधिक राष्ट्रपति बनाया गया.

क्षमता के साथ दायित्व का निर्वाह
सरदार पटेल के लौहपुरुष होने के एक नहीं कई उदहारण हैं. ऐसा नहीं कि इसका परिचय आजादी के बाद उनके कार्यों से मिला, बल्कि उनके व्यक्तित्व की और भी कई बड़ी विशेषता थी. इसका प्रभाव उनके प्रत्येक कार्य में दिखाई देता था. गीता में भगवान कृष्ण ने कर्म कौशल को योग रूप में समझाया है. अर्थात अपनी पूरी कुशलता, क्षमता के साथ दायित्व का निर्वाह करना चाहिए.

सरदार पटेल ने आजीवन इसी आदर्श पर अमल किया. जब वह वकील के दायित्व का निर्वाह कर रहे थे, तब उसमें भी मिसाल कायम की. जब वह जज के सामने जिरह कर रहे थे, तभी उन्हें एक टेलीग्राम मिला, जिसे उन्होंने देखा और जेब में रख लिया. उन्होंने पहले अपने वकील धर्म का पालन किया, उसके बाद घर जाने का फैसला लिया. तार में उनकी पत्नी के निधन की सूचना थी.

गांधी भी मानते थे लौह पुरुष का लोहा
महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह के साथ ही कांग्रेस में एक बड़ा बदलाव आया था. इसकी गतिविधियों का विस्तार सुदूर गांव तक हुआ था. लेकिन इस विचार को व्यापकता के साथ आगे बढ़ाने का श्रेय सरदार पटेल को दिया जा सकता है. उन्हें भारतीय सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था की भी गहरी समझ थी. वह जानते थे कि गांवों को शामिल किए बिना स्वतंत्रता संग्राम को पर्याप्त मजबूती नहीं दी जा सकती.

वारदोली सत्याग्रह के माध्यम से उन्होंने पूरे देश को इसी बात का संदेश दिया था. इसके बाद भारत के गांवों में भी अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद होने लगी थी. देश में हुए इस जनजागरण में सरदार पटेल की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी. इस बात को महात्मा गांधी भी स्वीकार करते थे. सरदार पटेल के विचारों का बहुत सम्मान किया जाता था. उनकी लोकप्रियता भी बहुत थी. स्वतंत्रता के पहले ही उन्होंने भारत को शक्तिशाली बनाने की कल्पना कर ली थी.

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