सोनपुर मेले का 19 दिन पार, पशु मेले में अबतक सिर्फ 3 हाथी पहुंचे, ग्राहक नाखुश

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छपरा: हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेले में बिहार के अलावा उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल आदि प्रदेशों के डेढ़ हजार से अधिक व्यवसायी मेले में है. 32 दिनों के इस मेले के 19 दिन पार कर चुके हैं और इस अवधि में 35 लाख लोग आए-गए पर किसी को खरोंच तक नहीं आयी. मेले की यह विशेषता बिहार की ऊंचाई दिखा रही है. देश का यह पहला मेला है जहां कभी कोई बड़ी वारदात नहीं हुई. कहीं तनाव नहीं. हर जगह लगाव का माहौल कायम है.

मेले में अभी लगभग एक लाख लोग रोज आ रहे हैं. मेले में पटना से सपरिवार आए मो.खालिद नखास की खूबसूरत प्रदर्शनियों व भारी भीड़ का हिस्सा बनते हुए कह उठते हैं- लाजवाब है यह मेला.

इतनी बड़ी भीड़ फिर भी सभी एक-दूसरे को सहयोग करते हुए अनुशासित. धक्का-मुक्की की कौन करे, सबकी कोशिश यह कि किसी के शरीर से टकराएं भी नहीं. कैसा लग रहा है मेला? यह सिर्फ मेला ही नहीं, मिल-जुल कर रहने का ट्रेनिंग स्थल जैसा भी है. समाज और देश को इसी तरह के सहयोग व मिल्लत की जरूरत है.

पूरा भारत यहां दिख रहा हैं. उधर, बलिया के राम प्रसाद शर्मा अपने परिवार के साथ घूम रहे हैं. दस साल पहले भी आए थे. एक खरगोश और एक विदेशी नस्ल का कुत्ता खरीद कर ले गए थे. सवाल करने लगे- कुत्ता तो पालतू है. वह प्रतिबंध से बाहर है.

लेकिन हाथियों की जलक्रीड़ा नहीं होने से मायूसी :

सीतामढ़ी से आए जनार्दन प्रसाद, गोपालगंज के मो.आलम, अवताननगर के वीरेन्द्र सिंह, वैशाली के आनंद कुमार, मुजफ्फरपुर के सदानंद आदि सैकड़ों दर्शकों का कहना है कि हरिहर क्षेत्र गजेन्द्र मोक्ष की भूमि पर इस बार हाथियों की जलक्रीड़ा नहीं देख सके. हाथियों की खरीद-बिक्री पर रोक है पर हाथीवाले यहां इसलिए भी आते रहे हैं कि जब हाथी पालते हैं तो गजेन्द्र मोक्ष स्थल पर हाथियों के साथ आने से पुण्य लाभ होता है. यही गंडक नदी में गज-ग्राह का युद्ध हुआ और जब गज हारने लगा तो उसने रक्षा के लिए भगवान को पुकारा- हे गोविंद राख्यो शरण, अब तो जीवन हारे….

संगीत का आनंद उठा रही महिलाएं :                                                                                                                                                         मेले के मीना बाजार, मुंबई बाजार, अपना बाजार आदि में महिलाओं की संख्या अधिक है. एक से बढ़कर एक आकर्षक वस्तुओं के साथ ये बाजार सजे हुए है. इन बाजारों में दूसरे प्रदेशों के दो सौ से अधिक व्यवसायी कारोबार कर रहे हैं तो उधर मेले के पर्यटन विभाग के मुख्य सांस्कृतिक मंच पर कई प्रदेशों की लोक संस्कृतियां नृत्य-संगीत के माध्यम से अभिव्यक्ति पा रही हैं. महिलाएं जब मेला घूमते थक जा रही हैं तो पंडाल में बैठकर झूमर, सोहर, कजरी, बारहमासा और नृत्य नाटिकाओं का आनंद लेने से चूक नहीं रही.

पहले शाम के बाद मेले में महिलाओं के मनोरंजन का कोई साधन नहीं हुआ करता लेकिन अब वे देर रात तक यहां बैठकर लोक संगीत का आनंद ले रही है. छपरा की अनुराधा कहती है, जिन गीतों को हम गांवों में विभिन्न अवसरों पर गाया करती हैं, उन्हें कलाकारों से सुनना अच्छा लगता है.

 

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