इंदिरा की हत्‍या के बाद पटना सिटी में भी शुरु हो गया था दंगा, गुरुद्वारा ने बचाया था  

ज्ञानवर्द्धन मिश्र. 33 वर्ष बीत चुके हैं. दुखते जख्म को खुरचना ठीक नहीं. लेकिन परिस्थितियां पुराने पन्ने को पलटने को मजबूर कर देती है. सन 1984 के सिख विरोधी दंगे की याद आती है तो सिहर उठता  हूं. आंखन देखी को झुठला भी नहीं सकता. जब सत्ता में बैठे हमारे नुमाइन्दे ही चुप्पी साध लें तो रक्षक को भक्षक बनने में तनिक भी देर नहीं लगती. 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद न केवल पटना बल्कि पूरे देश में एक ऐसा जलजला आया कि हर आम व खास कांप उठा. घरों में चूल्हे नहीं जले, स्कूल-कालेज बंद, सड़कों पर सन्नाटा, परिवहन रोड से गायब. एक-दूसरे को अविश्‍वसनीय नजर से देखते लोग. अजीब सा दृश्‍य था तबका. बिलकुल टीवी सिरियल ‘तपस’ सा.

31 अक्टूबर 1984 की सुबह मैं एक मित्र की मां को लेकर सासाराम के लिए निकला था एक वैवाहिक आयोजन में शामिल होने के लिए. पटना जंक्‍शन गोलम्बर पहुंचा ही था कि कार्यालय का एक स्टाफ बेसब्री से प्रतीक्षा करता हुआ मेरे टेम्पू के पहुंचते मिला. कहा, दादा ने तुरन्त बुलाया है और घटना की थोड़ी बहुत जानकारी भी दी. उस वक्त मैं ‘आज’ ,पटना में कार्यरत था. जिम्मेवारी वाले पद पर था सो मित्र की मां को अकेले हार्डिंग पार्क के सामने बस स्टैंड में सासाराम की बस में बिठा चला आया आफिस. दिन के 12 बज रहे थे पूरे शहर में अजीब सी दहशत.

तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की 9.20 मिनट पर उनके दो सुरक्षा गार्डों द्वारा गोली मारे जाने और 10.00 बजकर 50 मिनट पर उनकी मृत्यु की घोषणा से पूरा देश स्तब्ध था. 11 बजे दिन में आकाशवाणी की इस सूचना ने पूरे देष में धमाल मचा दिया कि हत्यारे दोनों सुरक्षा गार्ड सिख थे. बस इतनी-सी खबर पर शुरू हो गया मार-काट, लूट का तांडव. एक ओर दिन में अखबार का विशेष बुलेटिन निकालने की जिम्मेवारी तो दूसरी ओर अपने अन्य सहकर्मियों को घर से बुलाने का प्रबंध. सूर्यास्त होते-होते पटना में हिंसा की छिटफुट दौर की शुरूआत. न कहीं कोई सतर्कता, न पुलिस की बंदोबस्ती और न ही सिखों के धार्मिक स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था, सब भगवान भरोसे.

सिखों के दसवें और अंतिम गुरू श्री गुरूगोविन्द सिंह जी महाराज की जन्मस्थली होने के कारण पटना साहिब स्थित तख्त श्री हरिमंदिर जी का देश-विदेश में विषिष्ट स्थान है. दंगे की आग यहां तक पहुंची. गुरूजी के ‘मानस की जाति सभै एकै पहिचानवों……’ के परखच्चे उड़ने लगे. बलवाइयों के निशाने पर सिर्फ और सिर्फ सिखों की मकान-दुकानें रहीं. चाहे वह फ्रेजर रोड (पटना) के चांदनी चौक का मार्केट हो या डाकबंगला चैराहा के आसपास की दुकानें. अशोक राज पथ पर या न्यू डाक बंगला रोड की वे दुकानें हों या एक्जीविशन रोड की. चुन-चुन कर लूट का निशाना बनाया गया. पटना सिटी में दो दिनों तक लूटपाट का तांडव तो चलता रहा. लेकिन प्रबुद्ध नागरिकों की जागरूकता ने रंग दिखाया और बलवाइयों का सामना करने मैदान में उतरे.

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तख़्त श्री पटना साहिब

सिखों ने अपना घर छोड़ गुरूद्वारा में शरण लेना उचित समझा. जिन्हें अपने पड़ोसियों पर भरोसा रहा वे उनके घर में कई दिनों तक छिपे रहे. कालीस्थान (पटना सिटी) के मुहाने पर जहाजी कोठी नामक विशाल इमारत हुआ करती थी जिसे लाहौर जेनरल स्टोर के मालिक और समाजसेवी सरदार दिलीप सिंह ने बनवाया था. दंगाइयों की उस पर भी नजर थी लेकिन सरदार साहब सपरिवार पहले ही तख्त साहेब में शरण ले चुके थे. बाद में वह कोठी एनआरआई भवन में तब्दील हुआ.

जहां तक मुझे स्मरण है तख्त साहब की सुरक्षा के लिए तीन बार्डर बना दिये गये. पहला गुरूद्वारा के दक्षिण गांधी सरोवर से पूरब की ओर काली स्थान तक जाने वाली सड़क (आज के बाल लीला गुरूद्वारा), दूसरा उत्तर में अशोक राज पथ पर चमडोरिया से चौक तक तथा तीसरा गुरूद्वारा के चारो ओर. खतरा उत्तर में गंगा नदी से टप कर आने और लूट ले जाने का था तो दक्षिण में रेलवे लाइन पार से उत्पात मचाने वाले असामाजिक तत्वों को कंट्रोल में रखना था.

तबके पटना के डीएम राजकुमार सिंह (अब केन्द्रीय बिजली राज्य मंत्री) और पटना सिटी के एसडीपीओ लक्ष्मण प्रसाद सिंह ने काफी काम किया. आधी रात के बाद तक सड़कों पर पेट्रोलिंग करते नजर आते थे (क्योंकि मैं खुद आधी रात के बाद ही कार्यालय से घर लौटता था). तख्त साहेब के ठीक पीछे मेरा आवास होने के कारण पड़ोसी सिखों की मुझ से उम्मीद अधिक रहती थी. जहां तक बन पड़ा किया भी. लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में श्री राजीव गांधी के – ‘जब कोई बड़ा वृक्ष गिरता है तो धरती कांपती ही है’ के कथन ने विस्फोट ही कर दिया था. दंगाइयों की आड़ में कौन लोग रहे यह सब जानते हैं.

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पटना के तत्कालीन DM आरके सिंह

मेरे लिये ‘आज’ अखबार को चमकाने का भी मौका अच्छा मिला. संवाददाताओं के मजबूत नेटवर्क के जरिये जमीनी खबरों से पाठकों को रूबरू कराकर सर्कुलेशन को सवा लाख तक पहुंचा दिया. यह सब सहयोगियों की टीम भावना का फल रहा. तब के ‘आज’ के नौजवानों की टीम ने न केवल संवाद संकलन किया और अखबार छापा बल्कि सुबह होते-होते प्रमुख चौक-चैराहे पर स्‍टॉल खड़ा कर अखबार बेचा भी. कालोनियों में भी घर-घर जाकर अखबार बेचा.

तब के अविभाजित बिहार में हिंसा की सबसे अधिक घटनाओं का गवाह बना बोकारो. तब वह धनबाद जिले का एक अनुमंडल था. सिख विरोधी दंगे में मारे गये लोगों में पूरे देश में बोकारो तीसरे नम्बर पर था. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बोकारो में सिख समुदाय के 63 लोग मौत के शिकार हुए जबकि गैर सरकारी आंकड़ा यह 150 का रहा. प्रथम स्थान पर दिल्ली रही जहां बलवाइयों के हाथों सरकारी आंकड़ों ने 21 सौ के मरने की रिपोर्ट दर्ज की. हालांकि गैर सरकारी आंकड़ा 3 हजार से अधिक का था. दूसरे स्थान पर कानपुर रहा जहां 127 लोग मारे गये थे. यहां भी गैर सरकारी आंकड़ा 300 के पार रहा. यह तो हुई पूरे देश में हिंसा में मृत फर्स्‍ट, सेकेंड और थर्ड नंबर की बात. तब के दक्षिण बिहार का रांची, हजारीबाग, रामगढ़, जमशेदपुर में बलवाइयों ने जमकर बबाल काटा.

दंगा के बाद मृतकों के परिजनों को मुआवजा देने में भी हीला-हवाली हुई. घोषणा लाख दो लाख की हुई तो मिला 20-40 हजार. सन 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद श्री नरेन्द्र मोदी ने अनुदान की राशि बढ़ाकर पांच लाख रूपया करने की घोषणा की.

दंगे की जांच के लिए सन 1985 में जस्टिस रंगनाथ मिश्र की अध्यक्षता में गठित जांच आयोग ने भी अपनी पहली बैठक बिहार के बोकारो में ही 13 दिसम्बर 1985 को की थी. दूसरी बैठक भी बोकारो में ही 11 फरवरी 1986 को हुई. तीसरी बैठक 13 फरवरी 1986 को पटना के मुख्य सचिवालय में हुई. आयोग ने पीड़ित सिखों को पुनर्वासित करने और उन्हें मुआवजा देने संबंधी कई गाइड लाइन सरकार को दिया. लेकिन इस गाइडलाइंस का भी वही हश्र हुआ जो अन्य आयोग की सिफारिशों का होता रहा है.

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वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानवर्धन मिश्रा

(लेखक ज्ञानवर्द्धन मिश्रा बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं. डिस्‍क्‍लेमर : इस आलेख में व्‍यक्‍त किये गये विचार और तथ्‍य लेखक के हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्‍यावहारिकता अथवा सच्‍चाई के प्रति LiveCities उत्‍तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्‍यों की त्‍यों प्रस्‍तुत की गई है. कोई भी सूचना अथवा व्‍यक्‍त किये गये विचार LiveCities के नहीं हैं तथा LiveCities उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्‍तरदायी नहीं है.)

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