पाठक के अभाव में इतिहास बन रहा पुस्तकालय – Live Madhepura

पाठक के अभाव में इतिहास बन रहा पुस्तकालय

मधेपुरा : जिले के अधिकांश पुस्तकालय की स्थिति बदहाल है. मधेपुरा का जिला केंद्रीय पुस्तकालय बिहार सरकार द्वारा संचालित है, लेकिन न तो वहां लोग जाते हैं और न कर्मियों को कोई सुविधा मिलती है. निजी पुस्तकालय अगर चल भी रहे हैं तो कोई-न-कोई संचालक बस इसे ढो रहे हैं.

जिला केन्द्रीय पुस्तकालय, मधेपुरा

सरकारी भूमि और भवन के साथ किताबें भी है, लेकिन नाइट गार्ड को बीस माह से वेतन नहीं मिला है और सचिव की नौकरी ही चली गई है, सो वे पटना में ही हैं. यहां पुस्तकालय को नाइट गार्ड खोलते-बन्द करते हैं लेकिन उन्हें किताबों के बारे में कुछ पता नहीं है. कहते हैं- साहब, कब तक उधार का खाकर यहां रह पाएंगे. कोई देखने वाला ही नहीं है.

गौतम शारदा पुस्तकालय, मुरलीगंज

इस पुस्तकालय को स्थानीय लोगों ने संवारने की पुरी कोशिश की है. इसके परिसर में बच्चे खेलते भी हैं, लेकिन अन्दर जाकर पढ़ना उन्हें रास नहीं आता. संचालक सूरज पंसारी बताते हैं कि हमलोग पूरी तरह देखभाल करते हैं. लेकिन यह सही है अब पहले की भांति लोग यहां स्वाध्याय के लिए नहीं आते हैं. परिसर के सामने दुकान है जिसके भाड़े से किसी प्रकार देखभाल होती है.

शारदा पुस्तकालय, आलमनगर

इस पुस्तकालय के पास दो एकड़ भूमि भी है. पूर्व मंत्री विद्याधर कवि ने इसे भव्य रूप भी दिया था. लेकिन अब इस पुस्तकालय के भवन में एक निजी कोचिंग संस्थान चलती है. कौन किराया ले रहा है या फिर किसने पुस्तकालय को हटाया कोई नहीं बताता. अतिक्रमण का शिकार इस पुस्तकालय की किताबें भी गायब है.

गांधी पुस्तकालय, चौसा

जनता द्वारा संचालित इस पुस्तकालय को अपनी जमीन और अपना भवन है. विधायक और मंत्री नरेन्द्र नारायण यादव ने यहां सारी सुविधाएं उपलब्ध करा दिया है. लेकिन यहां पुस्तकों की संख्या कम है. पुस्तकालय में आकर अध्ययन करने वालों की संख्या अन्य पुस्तकालयों के सामन ही निरंतर कम होती जा रही है. इसके अतिरिक्त शेष अन्य पुस्तकालयों की भी स्थिति बदहाल है. पुराने उच्च विद्यालयों में स्थित पुस्तकालयों की स्थिति पुस्तकाध्यक्षों के नियोजन के बाद सुधरी जरूर है. इस बदहाली का एक प्रमुख कारण इस क्षेत्र में 1990 से व्याप्त शैक्षणिक बदहाली के साथ साथ टीवी और मोबाइल की सर्व व्यापकता को भी माना जाता है.

absence-of-history-in-the-library-reader

लंबे समय तक पुस्तकाध्यक्ष रहे पृथ्वीराज यदुवंशी बताते हैं कि एक ओर जहां समाज, जन प्रतिनिधि और सरकार पुस्तकालयों की उपेक्षा कर रही है. समिधा ग्रुप के निदेश संदीप शांडिल्य कहते हैं कि अगर सुविधाएं बढ़ायी जाय और पुस्तकालयों में आधुनिक संचार साधनों से लैश किया जाय तो फिर इसका महत्व और लोकप्रियता पुर्नस्थापित हो सकता है.छात्र हर्षव‌र्द्धन सिंह राठौर कहते हैं कि पुस्तकालयों में पुस्तकों और कुर्सी, टेबुल, रौशनी की व्यवस्था परमावश्यक है.इस संबंध में जिलाधिकारी मो. सोहैल ने कहा कि पुस्तकालयों की स्थिति में सुधार के लिए समाज को भी आगे आना होगा. केन्द्रीय जिला पुस्तकालय की बेहतरी के लिए हमलोग शीघ्र ही कार्रवाई होगी. अन्य पुस्तकालयों के लिए भी अब संचालक रूचि दिखाएंगे तो प्रशासन मदद करेगी.

 

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