Breaking News

कल्पवास त्याग और तपस्या का पर्व

लाइव सिटीज डेस्क: एक माह के धार्मिक जमावड़े का मुख्य पर्व कल्पवास पौष पूर्णिमा के स्नान से शुरू हो जाता है. कल्पवासियों को इस दिन का साल भर से इंतजार रहता है. इसे एक माह तक चलने वाला व्रत भी कहा जाता है. मान्यताओं के अनुसार कुछ लोग पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा और कुछ लोग मकर संक्रांति से कुंभ संक्रांति तक कल्पवास करते हैं.

‘मोक्ष’ की आस में श्रद्धालु संगम तट पर एक माह तक कल्पवास करने के लिए आते हैं. मान्यता है कि माघ महीने में प्रयाग में न सिर्फ मानव कल्पवास के लिए आते हैं बल्कि करोड़ों देवी-देवता भी मौजूद रहते हैं. जो किसी न किसी रूप में कल्पवास करने वालों को दर्शन देते हैं. यही कारण है कि लोग यहां घर-गृहस्थी, मोह-माया से दूर रहकर एक माह तक धार्मिक कार्यो में लीन रहते हैं. भजन, पूजन, व्रत, धर्म चर्चा यही कल्पवासियों की दिनचर्या होती है. इसके माध्यम से वह परमात्मा को हासिल करने का प्रयत्न करते हैं. ये पाठ के साथ-साथ संत महात्माओं के प्रवचन सुनते हैं.

कल्पवास त्याग और तपस्या का पर्व है. पहले की अपेक्षा आज का कल्पवास काफी बदल गया है. आज का कल्पवास काफी बदल चुका है. लोगों की हर जरूरत आसानी से पूरी हो जाती है. इसके बाद भी अधिकतर लोग एक माह तक त्याग का जीवन जीते हैं जो बड़ी बात है. प्रयाग की इस पावन धरती पर प्रवेश करते ही मन में एक ही बात रहती है कि वह है अधिक से अधिक त्याग करना.

एक माह तक संतों के सानिध्य में रहकर भजन-पूजन करना काफी पुण्यकारी होता है. लोगों के नजर में इसके बराबर दूसरी कोई तपस्या नहीं है, यही कारण है कि कई लोग कई वर्षो से आ रहे हैं. आज कल्पवास के दौरान मोबाइल फोन के जरिए घर परिवार से तो जुड़े रहते हैं.

यह भी पढ़ें- सबसे अधिक सकारात्मक ऊर्जा होती है मंदिर के गर्भगृह में

एक माह तक कल्पवास करके लोग पुण्य अर्जित करना चाहते हैं. शास्त्रों में इससे बड़ी दूसरी कोई तपस्या नहीं बताई गई है. यह ऐसी तपस्या है जो हमें ईश्र्वर के करीब ले जाती है. यह एक योग की तरह ही है. लोग ईश्र्वर को पाने के लिए पूरे जीवन भटकते रहते हैं. इसके बाद भी किसी को उनका दर्शन नहीं हो पाता. जबकि कल्पवास से हम अपने आराध्य से सीधे मिलते हैं. यह एक अलग तरह की अराधना है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *