खुल गया है राज, जयंती में जाकर भी श्रीबाबू के बारे में आखिर क्यों नहीं बोल पाए लालू प्रसाद?

पटना : शनिवार को कांग्रेस ने पटना में बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की 130वीं जयंती मनाई. यह आयोजन मुख्य रूप से कांग्रेस के नेता और भारत सरकार के पूर्व मंत्री अखिलेश प्रसाद सिंह का था. बिहार कांग्रेस को नया प्रदेश अध्यक्ष मिलना है. अखिलेश सिंह भी सशक्त दावेदार हैं. इस दावेदारी के कारण ही कइयों ने श्रीबाबू की जयंती को भी शक्ति प्रदर्शन माना. जाहिर तौर पर इस समारोह में सर्वाधिक संख्या में भूमिहार समाज के लोग थे.

समारोह का बहिष्कार कांग्रेस के हटाये गए प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी गुट ने किया. इसके साथ ही जदयू ने भी वार किया कि कांग्रेस लालू प्रसाद के पास गिरवी रख दी गई क्या? भूरा बाल तक की चर्चा हो गई. कहा गया कि भूरा बाल साफ़ करो का नारा देने वाले लालू प्रसाद कैसे श्रीबाबू की जयंती में मुख्य अतिथि बन गए. जवाब अखिलेश सिंह ने दिया. बोले – कांग्रेस के समारोह में लालू प्रसाद नहीं तो क्या आरएसएस के नेता बुलाये जाते. स्वयं श्रीबाबू पिछड़ों के साथ आगे बढ़ने की बात करते थे और इन पिछड़ों की जमात के सबसे बड़े नेता तो लालू प्रसाद ही हैं.

खैर इस बहस-मुबाहिसे के बीच लोगों ने यह बात भी नोटिस कर ली कि लालू प्रसाद ने जयंती समारोह में श्रीबाबू के बारे में तो विशेष बोला ही नहीं, वे बोलते रह गए नरेंद्र मोदी-अमित शाह-नीतीश कुमार और सुशील कुमार मोदी के बारे में. आखिर ऐसा क्यों हुआ, आज संडे की रात इसकी विवेचना बिहार के वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र किशोर ने अपने फेसबुक के वाल पर की है. उन्होंने क्या लिखा है, आगे उनके ही शब्दों में हुबहू पढ़ें –

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सुरेन्द्र किशोर

हमारे जागरूक फेसबुक मित्र अनिल सिंहा ने आज लिखा है कि पटना में आयोजित समारोह में मुख्य अतिथि श्रीबाबू पर कुछ कहने के बजाए अपने विरोधियों के खिलाफ बोलने में ही लगे रहे. अनिल जी ने ठीक ही कहा. पर क्या कीजिएगा !

आजकल ऐसे अवसरों पर ऐसा ही होता है.सिद्धांतवादी स्वतंत्रता सेनानियों की जयंती मनाने का उद्देश्य ही कुछ दूसरा होता है. गांधी युग के वैसे महापुरूषों के बारे में आज के अवसरवादी नेता आखिर बोलें तो बोलें क्या ?

यह तो बोल नहीं सकते कि श्रीबाबू ने अपने पुत्र को अपने जीवनकाल में विधायक तक नहीं बनने दिया तो मैं भी उनके ही रास्ते पर चलूंगा !
यह भी नहीं बोल सकते कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद श्रीबाबू ने अपना एक मकान तक पटना में नहीं बनवाया तो मैं भी नहीं बनाऊंगा. श्रीबाबू ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को व्यक्तिगत दुश्मन नहीं माना तो मैं भी नहीं मानूंगा, आज के नेता यह बात किस मुंह से बोलेंगे?

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श्रीकृष्ण सिंह

यह कैसे बोलेंगे कि चुनाव के समय श्रीबाबू अपने चुनाव क्षेत्र में नहीं जाते थे तो मैं भी नहीं जाऊंगा क्योंकि मैं बाकी के पौने पांच साल तो अपने क्षेत्र की जनता की सेवा करता ही हूं ! इस बात की चर्चा आज के कितने नेता कर सकेंगे कि श्री बाबू के निधन के बाद उनके पास कुछ ही हजार रुपए मिले थे जो उनके मित्रों और समर्थकों के लिए रखे हुए थे .यह सब बोलने में शर्म नहीं आएगी !

उनके गुणों की चर्चा करने और उनसे सीख लेने की लोगों से अपील करने में आज के अधिकतर नेताओं के सामने कठिनाइयां हैं ! क्योंकि, वे खुद उस तरह की जीवन शैली से काफी दूर हैं. इसीलिए ऐसे अवसरों पर भी आज के अधिकतर नेता अपने ताजा राजनीतिक एजेंडे को ही आगे रखते हैं. बेचारों पर दया कीजिए अनिल बाबू !

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