जिंदगी से भर देगी बिहार की महिमा की कहानी, जिसने जाना है, कैसे हारता है पैरालिसिस

महिमा : हर साल 13 अक्‍तूबर को ‘वर्ल्ड थ्रोम्बोसिस डे’ मनाया जाता है. मुझे इस दिन का महत्व अब काफी अच्छे तरीके से पता चल गया है . बता दूँ कि मैं अपने टवेंटिएस में हूँ और मुझे पता है कि थर्मोबायोसिस की स्थिति से निकलने का अहसास कैसा होता है .

मुझे याद है 24 अप्रैल 2017 की सुबह , वह दिन नई दिल्‍ली में मेरी जिन्दगी के किसी दूसरे सोमवार के जैसा ही था. उत्साह और ऊर्जा से भरपूर ज़िन्दगी जी रही थी मैं. मैं सुबह करीब सात बजे सोकर उठी. मेरी दूसरी नौकरी का ठीक दो महीना पूरा हुआ ही था , और अगर तीन महीने पूरे कर लेती तो मेरा कन्फर्मेशन तय था . मैं अपने रोजमर्रा के कामों के लिए उठने ही वाली थी. लेकिन मुझे हल्का सिर दर्द और झनझनाहट महसूस हो रहा था . मुझे लगा कि मुझे एक पावर नैप और ले लेना चाहिए.

10 मिनट के बाद मैंने बुझे मन से बिस्तर छोड़ने की हिम्मत जुटाई. लेकिन उस दिन मेरा हल्का सा सिरदर्द कुछ ज्यादा ही भारी हो रहा था. मैं बाकी किसी भी दिन की तुलना में ज्यादा बोझिल महसूस कर रही थी.

अब मेरी जिन्दगी में 24 अप्रैल, 2017 की उस सुबह का अपना ही महत्व है. मैं कभी उस दिन को नहीं भूल सकती. उस सुबह, ऑफिस के लिए तैयार होना मेरे लिए उस हल्के सिरदर्द से कई ज्यादा तकलीफदेह होने वाला था. बेड से उठना मुझे किसी पेड़ पर चढ़ने जैसा मुश्किल लग रहा था. जल्दी ही मुझे हर चीज धुंधली दिखने लगी चाहे वो मेरी दिमाग की झुनझुनाहट हो या मेरी आंखों की धुंधलाहट . मुझे ऐसा लग रहा था,मानो मेरा जीवन ओझल होने वाला है .

मेरी आदतों से चाचा अच्छी तरह वाकिफ थे. वह जानते थे कि आफिस जाने के लिए ज़्यादा हीला—हवाली और बहानेबाजी, मेरी आदतों में से नहीं है. उन्होंने मुझे नॉर्मल करने की हरसंभव कोशिश की. उन्हें लगा कि ये बदलते मौसम और गर्मी के आगमन का असर है. उन्होंने मेरे लिए आम पना, सत्तू , नींबू पानी से लेकर हर चीज बनाकर पिलाई. लेकिन अफसोस, मैं जो भी पी रही थी, उल्टी उसे बाहर निकाल दे रही थी. अब मुझमें उल्टी करने के लिए उठने की भी हिम्मत नहीं बची थी . बेड से उठकर उल्टी के लिए जाने पर भी मेरे शरीर के कई हिस्सों में अब तक चोट लग चुकी थी.

आखिरकार मैंने अपनी सारी ताकत बटोरकर खड़े होने का फैसला किया. लेकिन हर बार की तरह मैं फिर गिर पड़ी . मैं एक छोटी बच्ची की तरह हिम्मत हार कर रो पड़ी. मैं इस सिरदर्द को बर्दाश्त नहीं पा रही थी दर्द किसी नश्तर की तरह मेरे पूरे शरीर में पैठता जा रहा था . जल्दी ही मैंने महसूस किया कि मेरे शरीर का पूरा दाहिना हिस्सा सुन्न हो चुका था . अब बेसिन तक जाना खतरे से खाली नहीं था . मैं बार—बार जमीन पर गिर रही थी, अलमारी से टकरा रही थी और भी बहुत कुछ हो रहा था, जो इससे पहले मेरी ज़िन्दगी में कभी नहीं हुआ था. मेरे शरीर का न सिर्फ दाहिना हिस्सा सुन्न हो चुका था, बल्कि बायें हिस्से ने भी बुरी तरह कांपना शुरू कर दिया था .

चाचा और मुझे जल्दी ही महसूस होने लगा कि शायद ये हिटस्ट्रोक नहीं है. चाचा ने हिटस्ट्रोक से ज्यादा भयानक स्थिति का अंदाजा लगते हुए तुरंत एम्बुलेंस बुलवा लिया . आधे घंटे से भी कम वक्त में मैं ग्लूकोज की बोतल के साथ स्ट्रेचर पर लेटी थी. मैं लगभग बेसुध हो चुकी थी. फिर भी मैं अपने आसपास हलचल महसूस कर पा रही थी. मुझे अहसास हो रहा था कि मैं अस्पताल में हूँ .

मैं तीन दिन तक ICU में भर्ती रही. डॉक्टरों ने बता दिया कि ये सेरेब्रल थ्रोमबोसिस है. उस दिन से मेरा दाहिना हिस्सा चार महीने तक बेजान रहा . हमें आईसीयू से वार्ड में शिफ्ट करने के बाद पापा ने बताया कि मुझे क्या हुआ था . मुझे समझाया गया था कि इस बीमारी का इलाज कुछ और नहीं, बल्कि संतुलित एवं पौष्टिक खुराक, खुशनुमा माहौल और मेरी मजबूत इच्छाशक्ति है और साथ ही लगातार फीजियोथैरेपी से ही मैं वापिस ठीक हो सकती हूँ . लेकिन उन दिनों जब मैं खुद का काम नहीं कर पाती थी – जैसे नहाना , खाना और वाशरुम जाना; तब परिस्थिति मुझे निराशा और खीझ से भर देती थी.

नहीं थी मोबाइल उठाने की ताक़त

कमज़ोरी इतनीं कि मैं खुद अपना मोबाइल भी नहीं उठा सकती थी. मुझे अपने शरीर की कमजोरियों का अहसास पल-पल सता रहा था . प्रयास करते-करते मैंने आखिरकार मोबाइल उठाने का प्रयास किया और गूगल के माध्यम से जानने की पूरी कोशिश की कि मुझे हुआ क्या है . उस वक्त मेरा मोबाइल फोन मुझे 50 किलो के भार उठाने का एहसास दिलाता था. मेरी अपनी मांसपेशियां अब भी कमजोरी से जूझ रही है . उसकी सुस्त रफ्तार को मैं आज भी सुधार करने में लगी हुई हूँ . मेरे डॉक्टर कहते हैं कि इस हादसे से उबरने में मुझे पूरा साल लग जाएगा.

पिछले छह महीनों से मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मैंने जिन्दगी को फिर से शुरू किया है . फिर से सीखना पड़ा कि मुझे बिस्तर से कैसे खड़ा होना है . मुझे खुद अपना खाना कैसे खाना है. खट्टा—मीठा अनुभव था. मैंने अपने परिवार को अपनी रिकवरी पर खुश होते हुए देखा है . जब पहली बार मैं अपने बिस्तर से उठकर खड़ी हुई, बिल्कुल वैसा ही माहौल घर का बन गया था, जैसा किसी घर में छह महीने का बच्चा खुद से उठना सीखता है. दूसरी तरफ, मेरे दिल में लगातार ये मलाल था, जो मुझे याद दिलाता था कि ये कभी नहीं होता अगर मैंने अपने छोटे—छोटे सिरदर्द और थकान को इग्नोर न किया होता जिसे मैं अपनी जिन्दगी में रोज महसूस किया करती थी.

किस्मत से मुझे अच्छे फीजियोथैरिपिस्ट मिले थे और ऐसा परिवार मिला जिसने मुझे प्रेरणा दी. मेरे परिवार को यकीन था कि पैरालिसिस ठीक हो सकता है. हालांकि ये इस उम्र में होना एक दुर्लभ मामला था. इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि मैंने सीखा कि मेरी जिन्दगी कितनी महत्वपूर्ण है मेरे खुद के लिए और मेरे परिवार वालों के लिए. अब मैं यह गर्व से कह सकती हूं कि ये दौर सिर्फ छह महीने के नहीं थे, इस दौर में मैंने कुछ नहीं से बहुत कुछ सीखा है . सीखा है लर्न -अनलर्न – रीलर्न का मंत्र .

( यह आपबीती LiveCities के लिए महिमा ने लिखी है . महिमा मूल रुप से पटना की रहने वाली है . नोट्रेडेम कॉन्‍वेंट,पटना की स्‍टूडेंट रही है . बाद में जादवपुर यूनिवर्सिटी,कोलकाता और आईआईएमसी,दिल्‍ली से जर्नलिज्‍म और मीडिया की विभिन्‍न विधाओं में पढ़ाई की है . स्‍टडी के बाद कई संस्‍थाओं के लिए काम करती रही है . )

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