बगहा बाजार की उपेक्षा कर ‘’विकसित बगहा-विकसित बिहार” नहीं बन सकता

बगहा: विकसित बिहार बनाने के लिए विकसित बगहा भी बनाना पडेगा. लेकिन नगर परिषद और स्थानीय प्रशासन बगहा बाजार को उपेक्षित करके बगहा का विकास करना चाह रहा है, जो सम्भव नहीं लगता. मुख्यमंत्री ने बिहार के विकास के लिए नालंदा विश्वविद्यालय के विकास को अनिवार्य माना. पर यहां का नगर परिषद, स्थानीय प्रशासन और जन प्रतिनिधि बगहा के विकास के लिए बगहा बाजार को अनिवार्य नहीं मान रहे. विकास के नाम पर लाखों करोड़ों रूपया अन्य जगहों पर खर्च कर डाला गया, जिसका कोई विशेष मायने नहीं.

   लोगों के अनुसार जितने पैसे विकास के नाम पर फिजूल में खर्च किए गये, उससे कम खर्च में बगहा को विकसित किया जा सकता है. जैसे बगहा बाजार में ऐतिहासिक धरोहर पक्की बॉली है. इसे कम खर्च में पार्किंग का काम करके बॉली में मोटरबोट, छोटा नौकायन मनोरंजन के लिए चलायी जाय तो राजस्व की प्राप्ति सरकार और नगर परिषद को हो सकती है. इसके अलावा कई की रोजी-रोटी का एक जरिया भी पर्यटन स्थल से बन सकता है. एक ऐतिहासिक  कांग्रेसी मंदिर है.

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जिसकी महत्ता सरकार, जन प्रतिनिधि और प्रशासन के लोग समझ नहीं सके और नहीं समझने के लिए तैयार है, यह वह जगह है जहां भगत सिंह जैसे सरीखे क्रांतिकारी रहकर आजादी का यहाँ से संचालन कर चुके हैं. इन सबसे अलग हटकर एक और भूमि है, जो पूरे बगहा के लिए सामूहिक मनोरंजन और आकर्षण का केन्द्र बन सकता है. पर यह वर्षों से उपेक्षित है. यह मारवाडी धर्मशाला के पूर्व दिशा में बहुत बडा तालाब है, जो अभी चारों दिशा से अतिक्रमण का शिकार है.

तालाब  के अगल-बगल चारों दिशा से इसकी मिट्टी भराई कराकर पक्कीकरण कर दी जाय, साथ ही चारों दिशा में बच्चे, बूढ़े, सयाने के उठने-बैठने, टहलने और खेलने के लिए पार्किंग व्यवस्था कर दी जाय, तालाब का पानी साफ कराकर मोटर बोटिंग या नौकायन की व्यवस्था कराई जाय तो सुंदर बगहा-विकसित बगहा अभियान आगे बढ़ सकता है. ऐसे बहुत सारे जगह उपेक्षित पड़े हैं, जिसे कम खर्च में विकसित बिहार के साथ विकसित बिहार बनाया जा सकता है, बस जररूरत है सही की.

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