देवी विसर्जन अब उपासना नहीं मनोरंजन

बगहा (अनुमण्डल) : प्रतिमा विसर्जन अब विसर्जन नहीं मनोरंजन का साधन बनता जा रहा है. अगर सीधे मायने में कहा जाय तो लोग “विसर्जन” की परम्परा का या तो अर्थ भूलते जा रहे हैं या विसर्जन उनके लिये कोई मायने नहीं रखता. प्रतिमा विसर्जन के दौरान युवा पीढ़ी द्वारा जिस प्रकार अश्लील गानों पर भौंडा नृत्य प्रस्तुत किया जा रहा है, इसे देखते हुए आदमी सोचने पर मजबूर होता जा रहा है कि हमारे युवा किस धारा की ओर जा रहे हैं?

अभी सरस्वती पूजा प्रतिमा विसर्जन के दौरान जो युवाओं द्वारा अश्लील गानों पर अश्लील डांस करते जो देखा गया तो ये विश्वास ही नहीं हो रहा था कि क्या ये वहीं छात्र हैं जो कल विद्या की देवी माँ सरस्वती के सामने पूरी भक्ति भाव से हाँथ जोड़े बुद्धि और विद्या हेतु प्रार्थना कर रहे थे.

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कुछ देर पहले जिस माँ के सामने छात्र बुद्धि, विवेक हेतु याचना कर रहा था, वही छात्र उसी माँ के सामने, उसी पंडाल में, उसी श्रेष्ठजनों और भाई बहनों के सामने “होठ लाली से रोटी बोर के” और “पलानी में जवानी रोआ ता” जैसो गानों पर ठुमका लगा रहा है.

इतना ही नहीं हम और आप उसका साथ भी दे रहे है. विसर्जन अर्थात विदाई, तो क्या विदाई का माहौल इतना आनन्द सा भरा होता है कि हम मान सम्मान, संस्कार और संस्कृति सब को भूलते जा रहे हैं. आप माने या ना माने पर यह कटु सत्य है कि इसके पीछे समाज और उक्त संस्थान दोनों दोषी हैं. जो दोनों इस युवा पीढ़ी को सही मार्ग नहीं दिखाना चाहती है. हालांकि विसर्जन के नाम पर युवाओं के इस अश्लील हरकत पर नाराजगी है. विसर्जन के नाम पर होने वाले इस अश्लील हरकत पर रोक लगाते हुए इसे परम्परागत तरीके से मनाने पर जोर देने की आवश्यकता है.

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