बेगूसराय: जयमंगला महोत्सव ने दिखाई काबर समस्या के निदान की राह

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बेगूसराय: अभी हाल ही में मंझौल में सम्पन्न हुए जयमंगला महोत्सव से काबर झील की समस्या के निदान की राह निकलती हुई दिखाई पड़ने लगी है. जयमंगला महोत्सव 2018 के उद्घाटनकर्ता एसएस अहलूवालिया और समापन समारोह के मुख्य अतिथि सुशील कुमार मोदी के प्रयास से काबर झील पक्षी आश्रयणी की अधिसूचना में विसंगतियों का मामला अब दिल्ली पहुंच गया है. राज्य के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने समारोह में ये भरोसा दिलाया था कि साल के अंत तक काबर समस्या का निदान निकाल लिया जाएगा, जबकि एसएस अहलूवालिया ने समस्या के निदान के लिए कानून में बदलाव की बात कही थी.

केंद्रीय मंत्री के पहल, कानून में संशोधन संभव  

जयमंगला काबर फाउंडेशन के अध्यक्ष राजेश राज ने दिल्ली में केन्द्रीय मंत्री एसएस अहलूवालिया को काबर झील पक्षी आश्रयणी से संबंधित कागजात की फाईल सौंप दी है. जिसमें बिहार गजट 1989 और जिला गजट 1986 के अलावा जमीन के रकबा को छोटा करने की अनुशंसा वाला सरकार का पत्र भी शामिल है. राजेश राज ने बताया कि एसएस अहलूवालिया से बिहार के वन एवं पयार्वरण मंत्री सुशील मोदी और केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन से एक राउंड की वार्ता हुई है. डा. हर्षवर्धन ने उन्हें संबंधित अधिसूचना की कॉपी और समस्या के निदान के लिए एक अनुरोध पत्र भेजने की बात कही है.

 

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केन्द्रीय मंत्री अहलूवालिया ने बताया कि फिलहाल काबर से संबंधित अधिसूचना में विसंगतियों के निष्पादन के लिए अध्ययन किया जा रहा है. बहुत जल्द पूरे कागजात के साथ केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री डॉ हर्षवर्धन के साथ मीटिंग की जाएगी. तमाम तरह की अड़चनों को दूर करने के प्रयास किये जाएंगे. अहलूवालिया ने कहा कि पीएम मोदी छोटे छोटे कानूनों में बदलाव के पक्षधर हैं. ताकि जनहित के मुद्दे पीछे न छूटें. काबर झील का मुद्दा भी उन्हीं में एक है. उम्मीद है कि तमाम तरह की अड़चनों को बातचीत के जरिये निबटाकर काबर के किसानों और मछुआरों के लिए राहत का पिटारा खुलेगा.

जमीन की सीमांकन का काम 24 वर्षों से है लटका  

गौरतलब है कि काबर झील पक्षी आश्रयणी को 1989 में अधिसूचित क्षेत्र घोषित किया गया. जिसमें 15 हजार 7 सौ 80 एकड़ जमीन को चिन्हित किया गया. मंझौल, एकंबा, परोड़ा, नारायणपीपड़, कुंभी समेत चेरियाबरियारपुर और बखरी के 16 गांव की आबादी और खेती वाली जमीन भी इस दायरे में आ गए. फिर भी किसान खेती करते रहे और मुछुआरों के द्वारा मछलीपालन का काम जारी रहा. 24 साल तक सरकार जमीन का सीमांकन कराने में विफल रही कि कौन सी जमीन सरकारी है और कौन सी किसानों की. 2012 में बेगूसराय के जिलाधिकारी मनोज कुमार ने वन्य जीव संरक्षण अधिनियम का हवाला देते हुए ज़मीन की खरीद बिक्री पर रोक लगा दी. फिर क्या था, किसान आंदोलित हो गए. कुछ दिनों तक आंदोलन चला लेकिन बाद में मामला थम गया.

काबर समस्या दूर करने को लेकर कमेटी गठित

पिछले साल जयमंगला काबर फाउंडेशन ने मंझौल अनुमंडल की सिल्बर जुबली के मौके पर जब जयमंगला काबर महोत्सव का आयोजन किया. तब मंझौल के कुछेक लोगों ने महोत्सव में काबर शब्द जोड़े जाने का विरोध शुरू कर दिया. 18 मई 2017 को मंझौल के शताब्दी मैदान में जब बिहार के तत्कालीन राज्यपाल (अब राष्ट्रपति) रामनाथ कोविन्द जयमंगला महोत्सव के शुभारंभ के लिए पहंचे, तो मंच से काबर समस्या के निदान की मांग जयमंगला काबर फाउंडेशन ने उठाई. अगले ही दिन मुख्यमंत्री से राज्यपाल ने बातचीत की और समस्या के निदान की पहल शुरू हो गई. मुख्यमंत्री ने विकास आयुक्त शिशिर सिन्हा की अध्यक्षता में गठित कमेटी को काबर झील का दौरा कर संबंधित पक्षकारों से वार्ता के बाद स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिया. कमेटी का दौरा एक बार हो चुका है. अभी कई दौर की वार्ता किसानों और मछुआरों से अपेक्षित है.

बदल सकती है इलाके की तस्वीर 

इस साल 29 और 30 मार्च को जयमंगला महोत्सव का सरकारी आयोजन कला और संस्कृति विभाग ने किया था. जिसमें पहले दिन केन्द्रीय मंत्री एस.एस अहलूवालिया और रामकृपाल यादव तो दूसरे दिन बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी और बिहार विधानसभा के अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी ने शिरकत की. सभी नेताओं ने भरोसा दिलाया कि काबर समस्या का निदान निकलेगा और किसान अपनी जमीन को खरीद बेच सकेंगे. वायदे पर अमल करते हुए पहल शुरू हो गई है और जयमंगला महोत्सव कई दशकों से लंबित काबर समस्या के निदान के लिए कड़ी का काम रहा है. अगर इस समस्या का निदान निकलता है तो किसानों और मछुआरों के दिन तो बदलेंगे ही, इलाके की तस्वीर भी बदल जाएगी.

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