13 सितंबर को गणेश चतुर्थी का त्योहार मनाया जाएगा बड़ी धूम-धाम के साथ

लाइव सिटी डेस्क: विनायक वरद चतुर्थी व्रत भगवान श्री गणेश के जन्म का उत्सव का दिन है. यह दिन गणेशोत्सव के रूप में सारे विश्व में बड़े ही हर्ष और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. इस वर्ष 13 सितंबर को यह पवित्र पर्व मनाया जाएगा. उक्त बातें ज्योतिषाचार्य श्रीपति त्रिपाठी ने कहा. उन्होंने कहा कि इस दिन गुरुवार का दिन रहेगा. चतुर्थी तिथि 12 तारीख को सायं कालीन 18:36 से 13 तारीख को सायं कालीन 17:41 तक रहेगा. इस दिन स्वाति नक्षत्र, ब्रह्म योग व वव करण रहेगा. भगवान श्री गणेश जीवन की विघ्न-बाधाएं दूर कर सभी प्रकार की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं.

गणेशजी को सभी देवों में सबसे अधिक महत्व दिया गया है. गणेश चतुर्थी विघ्नराज मंगल कारक प्रथम पूज्य एकदंत भगवान गणपति के प्रकाश का पर्व है. आज के युग में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मानव जाति को गणेश जी के मार्गदर्शन की हमें सर्वाधिक आवश्यकता है. आज हर व्यक्ति का सपना है कि रिद्धि-सिद्धि,शुभ-लाभ उसे निरंतर प्राप्त होता रहे.

13 सितंबर को गणेश चतुर्थी का त्योहार बड़ी धूम-धाम के साथ मनाया जाएगा. भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को सभी देवताओं में सबसे पहले पूजे जाने वाले देवता भगवान गणेश का जन्म मध्यकाल में हुआ था. इस दिन हर साल गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है. मध्यकाल में जन्म लेने के कारण इनकी स्थापना इसी काल में होनी चाहिए.

भगवान गणेश विघ्नहर्ता और विघ्नकर्ता दोनों हैं. एक तरफ जहां भक्तों के लिए वे विध्न विनाशक है तो दूसरी ओर विघ्नकर्ता भी है. भगवान गणेश बुद्धि के देवता हैं. भगवान गणेश की उपासना से जहॉं कार्यों में सफलता मिलती है, अवरोध हटते हैं और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है.

श्री गणेश सभी सिद्धियों के प्रदाता और विघ्न विनाशक हैं. शास्त्रों के मुताबिक भगवान श्री गणेश की दो पत्नियां ऋद्धि-सिद्धि व पुत्र लाभ व क्षेम बताए गए हैं. जिनको लोक पंरपराओं में शुभ-लाभ भी कहा जाता है. जहां भगवान गणेश विघ्रहर्ता हैं तो उनकी पत्नियां ऋद्धि-सिद्धि यशस्वी, वैभवशाली व प्रतिष्ठित बनाने वाली होती है. वहीं शुभ-लाभ हर सुख-सौभाग्य देने के साथ उसे स्थायी और सुरक्षित रखते हैं. शास्त्रों में ऐसे ही सुख-सौभाग्य की चाहत पूरी करने के लिए बुधवार व चतुर्थी को गणेश पूजन में श्री गणेश के साथ ऋद्धि-सिद्धि व लाभ-क्षेम का विशेष मंत्रों से स्मरण बहुत ही शुभ माना गया है. सर्वमंगल की कामना करने वालों के लिए सिंदूरी रंग के गणपति की आराधना अनुकूल रहती है. इससे शीघ्र फल की प्राप्ति होती है.

13 सितंबर से 23 सितंबर तक चलेगा गणेश चतुर्थी उत्सव

इस बार गणेश उत्सव 13 से 23 सितंबर तक चलेगा. इस बार चतुर्थी वाले दिन काफी अच्छे संयोग बन रहे है. गणेश चतुर्थी के दिन सुबह-सुबह साधक को उपवास पर रहना चाहिए और दोपहर में गणेशजी की प्रतिमा पर सिंदूर चढ़ाकर विधिविधान से पूजा करनी चाहिए.

गणेश चतुर्थी पूजा का शुभ मुहूर्त

13 सितंबर मध्याह्न गणेश पूजा का समय – 11:03 से 13:30

अवधि – 2 घण्टे 27 मिनट

12 सितंबर को, चन्द्रमा को नहीं देखने का समय – 16:07 से 20:33

अवधि – 4 घण्टे 26 मिनट

13 सितंबर को, चन्द्रमा को नहीं देखने का समय – 9:31 से 21:12

अवधि – 11 घण्टे 40 मिनट

चतुर्थी तिथि प्रारम्भ -12सितम्बर 2018 को 16: 07 बजे

चतुर्थी तिथि समाप्त – 13 सितम्बर 2018 को 14 :51 बजे

भाद्रपद मास की चतुर्थी से चतुर्दशी (चार तारीख से चौदह तारीख तक) तक दस दिनों तक चलता है. भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी भी कहते हैं.

कथा-

शिवपुराणके अन्तर्गत रुद्रसंहिताके चतुर्थ (कुमार) खण्ड में यह वर्णन है कि माता पार्वती ने स्नान करने से पूर्व अपनी मैल से एक बालक को उत्पन्न करके उसे अपना द्वारपालबना दिया. शिवजी ने जब प्रवेश करना चाहा तब बालक ने उन्हें रोक दिया. इस पर शिवगणों ने बालक से भयंकर युद्ध किया परंतु संग्राम में उसे कोई पराजित नहीं कर सका. अन्ततोगत्वा भगवान शंकर ने क्रोधित होकर अपने त्रिशूल से उस बालक का सर काट दिया. इससे भगवती शिवा क्रुद्ध हो उठीं और उन्होंने प्रलय करने की ठान ली. भयभीत देवताओं ने देवर्षिनारद की सलाह पर जगदम्बा की स्तुति करके उन्हें शांत किया. शिवजी के निर्देश पर विष्णुजी उत्तर दिशा में सबसे पहले मिले. जीव (हाथी) का सिर काटकर ले आए. मृत्युंजय रुद्र ने गज के उस मस्तक को बालक के धड पर रखकर उसे पुनर्जीवित कर दिया. माता पार्वती ने हर्षातिरेक से उस गजमुखबालक को अपने हृदय से लगा लिया और देवताओं में अग्रणी होने का आशीर्वाद दिया. ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने उस बालक को सर्वाध्यक्ष घोषित करके अग्रपूज्यहोने का वरदान दिया.

अन्य कथा-

उत्सव में एक गणेश प्रतिमा विसर्जन के लिए ले जाते हुए.

एक बार महादेवजी पार्वती सहित नर्मदा के तट पर गए. वहाँ एक सुंदर स्थान पर पार्वती जी ने महादेवजी के साथ चौपड़ खेलने की इच्छा व्यक्त की. तब शिवजी ने कहा- हमारी हार-जीत का साक्षी कौन होगा? पार्वती ने तत्काल वहाँ की घास के तिनके बटोरकर एक पुतला बनाया और उसमें प्राण-प्रतिष्ठा करके उससे कहा- बेटा! हम चौपड़ खेलना चाहते हैं, किन्तु यहाँ हार-जीत का साक्षी कोई नहीं है. अतः खेल के अन्त में तुम हमारी हार-जीत के साक्षी होकर बताना कि हममें से कौन जीता, कौन हारा?

खेल आरंभ हुआ. दैवयोग से तीनों बार पार्वती जी ही जीतीं. जब अंत में बालक से हार-जीत का निर्णय कराया गया तो उसने महादेवजी को विजयी बताया. परिणामतः पार्वती जी ने क्रुद्ध होकर उसे एक पाँव से लंगड़ा होने और वहाँ के कीचड़ में पड़ा रहकर दुःख भोगने का शाप दे दिया.

बालक ने विनम्रतापूर्वक कहा- माँ! मुझसे अज्ञानवश ऐसा हो गया है. मैंने किसी कुटिलता या द्वेष के कारण ऐसा नहीं किया. मुझे क्षमा करें तथा शाप से मुक्ति का उपाय बताएँ. तब ममतारूपी माँ को उस पर दया आ गई और वे बोलीं- यहाँ नाग-कन्याएँ गणेश-पूजन करने आएँगी. उनके उपदेश से तुम गणेश व्रत करके मुझे प्राप्त करोगे. इतना कहकर वे कैलाश पर्वत चली गईं.

एक वर्ष बाद वहाँ श्रावण में नाग-कन्याएँ गणेश पूजन के लिए आईं. नाग-कन्याओं ने गणेश व्रत करके उस बालक को भी व्रत की विधि बताई. तत्पश्चात बालक ने 12 दिन तक श्रीगणेशजी का व्रत किया. तब गणेशजी ने उसे दर्शन देकर कहा- मैं तुम्हारे व्रत से प्रसन्न हूँ. मनोवांछित वर माँगो. बालक बोला- भगवन! मेरे पाँव में इतनी शक्ति दे दो कि मैं कैलाश पर्वत पर अपने माता-पिता के पास पहुँच सकूं और वे मुझ पर प्रसन्न हो जाएँ.

गणेशजी ‘तथास्तु’ कहकर अंतर्धान हो गए. बालक भगवान शिव के चरणों में पहुँच गया. शिवजी ने उससे वहाँ तक पहुँचने के साधन के बारे में पूछा.

तब बालक ने सारी कथा शिवजी को सुना दी. उधर उसी दिन से अप्रसन्न होकर पार्वती शिवजी से भी विमुख हो गई थीं. तदुपरांत भगवान शंकर ने भी बालक की तरह २१ दिन पर्यन्त श्रीगणेश का व्रत किया, जिसके प्रभाव से पार्वती के मन में स्वयं महादेवजी से मिलने की इच्छा जाग्रत हुई.

वे शीघ्र ही कैलाश पर्वत पर आ पहुँची. वहाँ पहुँचकर पार्वतीजी ने शिवजी से पूछा- भगवन! आपने ऐसा कौन-सा उपाय किया जिसके फलस्वरूप मैं आपके पास भागी-भागी आ गई हूँ. शिवजी ने ‘गणेश व्रत’ का इतिहास उनसे कह दिया.

तब पार्वतीजी ने अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा से 21 दिन पर्यन्त 21-21 की संख्या में दूर्वा, पुष्प तथा लड्डुओं से गणेशजी का पूजन किया. 21वें दिन कार्तिकेय स्वयं ही पार्वतीजी से आ मिले. उन्होंने भी माँ के मुख से इस व्रत का माहात्म्य सुनकर व्रत किया.

कार्तिकेय ने यही व्रत विश्वामित्रजी को बताया. विश्वामित्रजी ने व्रत करके गणेशजी से जन्म से मुक्त होकर ‘ब्रह्म-ऋषि’ होने का वर माँगा. गणेशजी ने उनकी मनोकामना पूर्ण की. ऐसे हैं श्री गणेशजी, जो सबकी कामनाएँ पूर्ण करते हैं.

तीसरी कथा-

एक बार महादेवजी स्नान करने के लिए भोगावती गए. उनके जाने के पश्चात पार्वती ने अपने तन के मैल से एक पुतला बनाया और उसका नाम ‘गणेश’ रखा. पार्वती ने उससे कहा- हे पुत्र! तुम एक मुगदल लेकर द्वार पर बैठ जाओ. मैं भीतर जाकर स्नान कर रही हूँ. जब तक मैं स्नान न कर लूं, तब तक तुम किसी भी पुरुष को भीतर मत आने देना.

भोगावती में स्नान करने के बाद जब भगवान शिवजी आए तो गणेशजी ने उन्हें द्वार पर रोक लिया. इसे शिवजी ने अपना अपमान समझा और क्रोधित होकर उनका सिर धड़ से अलग करके भीतर चले गए. पार्वती ने उन्हें नाराज देखकर समझा कि भोजन में विलंब होने के कारण महादेवजी नाराज हैं. इसलिए उन्होंने तत्काल दो थालियों में भोजन परोसकर शिवजी को बुलाया.

तब दूसरा थाल देखकर तनिक आश्चर्यचकित होकर शिवजी ने पूछा- यह दूसरा थाल किसके लिए हैं? पार्वती जी बोलीं- पुत्र गणेश के लिए हैं, जो बाहर द्वार पर पहरा दे रहा है.

यह सुनकर शिवजी और अधिक आश्चर्यचकित हुए. तुम्हारा पुत्र पहरा दे रहा है? हाँ नाथ! क्या आपने उसे देखा नहीं? देखा तो था, किन्तु मैंने तो अपने रोके जाने पर उसे कोई उद्दण्ड बालक समझकर उसका सिर काट दिया. यह सुनकर पार्वती जी बहुत दुःखी हुईं. वे विलाप करने लगीं. तब पार्वती जी को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड़ से जोड़ दिया. पार्वती जी इस प्रकार पुत्र गणेश को पाकर बहुत प्रसन्न हुई. उन्होंने पति तथा पुत्र को प्रीतिपूर्वक भोजन कराकर बाद में स्वयं भोजन किया. यह घटना भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुई थी. इसीलिए यह तिथि पुण्य पर्व के रूप में मनाई जाती है.

प्रभावशाली उपाय :-

 

  1. प्रातःकाल गणेश जी को श्वेत दूर्वा अर्पित करके घर से बाहर जायें. इससे आपको कार्यों में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होगी.
  2. घर के मुखय द्वार के ऊपर गणेश जी का चित्र या प्रतिमा इस प्रकार लगाएं कि उनका मुंह घर के भीतर की ओर रहे. इससे धन लाभ होगा.
  3. गणपति को दूर्वा और मोतीचूर के लड्डू का भोग लगाकर श्री लक्ष्मी के चित्र के सामने शुद्ध घी का दीपक जलाएं कभी धनाभाव नहीं होगा.
  4. दुकान या व्ववसाय स्थल के उद्घाटन के समय चांदी की एक कटोरी में धनिया डालकर उसमें चांदी के लक्ष्मी गणेश की मूर्ति रख दें. फिर इस कटोरी को पूर्व दिशा में स्थापित करें. दुकान खोलते ही पांच अगरबत्ती से पूजन करने से व्यवसाय में उन्नति होती है.
  5. नित्य श्री गणेश जी की पूजा करके उनके मंत्र ‘श्री गं गणपतये नमः’ का जप करने से सभी प्रकार की परीक्षा में सफलता प्राप्त होती है.
  6. छात्रों को जो विषय कठिन लगता हो उस विषय की पुस्तक में गणेश जी का चित्र तथा दूर्वा रखने से वह विषय सरल लगने लगेगा.
  7. बुधवार का व्रत रखकर बुध स्तोत्र का पाठ करने से, गणेश जी को मूंग के लड्डू चढ़ाने से आजीविका की प्राप्ति शीघ्र होती है.
  8. रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र में श्वेत आक की जड़ लाकर उससे श्री गणेश जी की प्रतिमा बनायें. फिर उस पर सिंदूर और देशी घी के मिश्रण का लेप करके एक जनेऊ पहनाकर पूजा घर में स्थापित कर दें. तत्पश्चात इसके समक्ष श्री गणेश मंत्र की 11 माला का जप करें. आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी.
  9. बुधवार के दिन श्री गणेश का पूजन करके गाय को घास खिलाने से सास के प्रति बहू का कटु व्यवहार दूर होता है.
  10. बुधवार के दिन श्री गणेश साधना करने से बुध ग्रह के दोष दूर होते हैं.
  11. गणेश चतुर्थी के दिन से श्री गणेश स्तोत्र का पाठ शुरू करके भगवान से प्रार्थना करने पर पिता-पुत्र के संबंधों में मधुरता आती है.
  12. एक सुपारी पर मौली लपेटकर उसे गणपति के रूप में स्थापित कर तत्पश्चात उसका पूजन करके घर से बाहर जायें. कार्यों में सफलता प्राप्त होगी.
  13. भगवान गणेश को नित्य प्रातःकाल लड्डू का भोग लगाने से धन लाभ का मार्ग प्रशस्त होता है.
  14. भगवान गणपति जी को बेसन के लड्डू का भोग लगाकर व्यवसाय स्थल पर जायें और कोई मीठा फल किसी मंदिर में चढ़ाएं. इससे धन-धान्य व सुख-समृद्धि की प्राप्ति होगी.
  15. धनतेरस से दीपावली तक लगातार तीन दिन सायंकाल श्री गणेश स्तोत्र का पाठ करके गाय को हरा चारा (सब्जी-साग आदि) खिलायें. बाधायें -रूकावटें दूर होंगी.
  16. परीक्षा देने से पूर्व श्री गणेश मंत्र का 108 बार जप करें और गणपति को सफेद दूर्वा चढ़ायें. परीक्षा में निश्चय ही सफलता मिलेगी.
  17. घर में गणेश जी के प्रतिमा के सामने नित्य पूजन करने से धन मान और सुख की प्राप्ति होती है.
  18. प्रातः काल गणपति जी मंत्र का 21 दिनों में सवा लाख बार जप करने से सभी मनोकामना पूर्ण होंगी. इसीलिए गणपत्यऽथर्वशीर्ष में कहा गया है कि श्री गणेश भगवान आप ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव हो। आप ही अग्नि, वायु, सूर्य, चंद्र हो. समस्त देवता, पंचतत्व, नवग्रह आदि सब कुछ आपका स्वरूप हैं. गणेश पुराण में वर्णित गणेशाष्टक को सिद्धि प्रदायक कहा गया है. निश्चित ही ऋद्धि-सिद्धि की सहजता से उपलब्धि गणेश तत्व से ही संभव है. ऋिद्धि-सिद्धि की प्राप्ति कामनापूर्ति, संकटनाश, प्रेम प्राप्ति, मधुर दांपत्य जीवन, विघ्ननाश, आरोग्य आदि कोई भी ऐसी कामना नहीं है जो कि गणेशकृपा से पूर्ण न हो.

श्री गणेश मंत्र – ॐ गं गणपतये नम:.

ऋद्धि – ॐ हेमवर्णायै ऋद्धये नम:.

सिद्धि – ॐ सर्वज्ञानभूषितायै नम:.

लाभ – ॐ सौभाग्य प्रदाय धन-धान्ययुक्ताय लाभाय नम:.

शुभ – ॐ पूर्णाय पूर्णमदाय शुभाय नम:.

पूजा व मंत्र स्मरण के बाद लड्डू का भोग लगाएं. इसके बाद धूप व घी के दीप जलाकर गणेश जी की आरती करें, प्रसाद बांटे व ग्रहण करे.