कलियुग का ‘श्रवण कुमार’, 22 साल तक मां को कांवर में बैठाकर 24 धाम, 38 हजार km चला ये बेटा

लाइव सिटीज डेस्क : अपने माता पिता से अतुलनीय प्रेम के लिए जाने जाने वाले ‘श्रवण कुमार’ का नाम आप सभी ने सुना होगा. श्रवण कुमार हिन्दू धर्म ग्रंथ रामायण में उल्लेखित पात्र है. ऐसा माना जाता है कि श्रवण कुमार के माता-पिता अंधे थे. श्रवण कुमार अत्यंत श्रद्धापूर्वक उनकी सेवा करते थे. एक बार उनके माता-पिता की इच्छा तीर्थयात्रा करने की हुई. श्रवण कुमार ने कांवर बनाई और उसमें दोनों को बैठाकर कंधे पर उठाए हुए यात्रा करने लगे.

इसी कहानी को आज के कलियुग में चरितार्थ कर रहे हैं मध्य प्रदेश के रहने वाले कैलाश गिरी जो ‘श्रवण कुमार’ की तरह अपनी मां को 22 साल तक कांवर में बिठाकर 24 धामों की यात्रा कराई. 16 राज्यों में घूम कर 38 हजार किलोमीटर तक चले कैलाश की यात्रा जबलपुर में खत्म हो चुकी है. मंगलवार को आगरा पहुंचे कैलाश ने बताया कि वह कटंगी (एमपी) के पास एक ऐसा आश्रम खोलना चाहते हैं, जिसमें वृद्ध लोगों की सेवा हो सके. वह ताज नगरी में अपने मित्रों और भक्तों से मिलने आए थे.



मां ने मांगी थी मन्नत, बेटे ने ऐसे की पूरी

कैलाश गिरी मूल रूप से मध्य प्रदेश के जबलपुर के रहने वाले हैं. पिता का नाम श्रीपाल और मां का नाम कीर्ति देवी श्रीपाल है. पिता की कैलाश के बचपन में ही मौत हो गई थी, जबकि कुछ समय बाद बड़े भाई की मौत हो गई.

कैलाश बचपन से ही ब्रह्मचारी थे. आंखों की रोशन नहीं होते हुए भी मां कीर्ति ने उनका पूरा ख्याल रखा. साल 1994 में पेड़ से गिरने के बाद कैलाश की हालत बिगड़ गई और बचना मुश्किल हो गया. मां ने उनके ठीक होने पर नर्मदा परिक्रमा करने की मन्नत मांगी.

ठीक होने पर कैलाश ने अंधी मां की मन्नत पूरी कराने की सोची, लेकिन पैसे नहीं थे. कई दिन सोचने के बाद मां को कांवड़ में बिठाकर नर्मदा परिक्रमा कराने के लिए निकल गया. कैलाश ने बताया, ”मैं सिर्फ 200 रुपए लेकर घर से नि‍कला था, भगवान व्यवस्था करता चला गया और मां की इच्छा के अनुसार मैं आगे बढ़ता चला गया.”

बता दें, कैलाश अब तक नर्मद परिक्रमा, काशी, अयोध्या, इलाहाबाद, चित्रकूट, रामेश्वरम, तिरुपति, जगन्नाथपुरी, गंगासागर, तारापीठ, बैजनाथ धाम, जनकपुर, नीमसारांड, बद्रीनाथ, केदारनाथ, ऋषिकेश, हरिद्वार, पुष्कर, द्वारिका, रामेश्वरम, सोमनाथ, जूनागढ़, महाकालेश्वर, मैहर, बांदपुर की यात्रा करते हुए मथुरा, वृन्दावन करौली होते हुए
वापस जबलपुर तक गए. जबलपुर में उन्हें डीएम ने सम्मानित भी किया और आश्रम के लिए जगह देने का वादा भी किया.

22 साल तक ये रहा रूटीन

कैलाश ने बताया, ”22 साल से रोजाना सुबह सबसे पहले मां का आशीर्वाद लेना. इसके बाद प्रभु इच्छा तक कांवड़ में मां को बिठाकर चलते थे. इसके बाद खाना फि‍र आराम करते थे.

मां को आराम कराते समय उनके पैर दबाना, फि‍र धूप कम होते ही फिर चल देते थे और देर रात तक चलते थे. इस दौरान भक्त रहने-खाने की व्यवस्था करा देते थे. यात्रा के दौरान कांवर उठाने से कंधे पर गहरे घाव हो गए थे, जिस पर रोज औषधि लगानी पड़ती थी.

क्या कहती हैं मां

कैलाश की मां कीर्ति किसी के सामने बेटे को आशीर्वाद नहीं देती और न ही तारीफ करती हैं. वह सबको माता-पिता की सेवा की सीख देती हैं. कीर्ति देवी ने बताया, ”कोई ऐसी मां होगी ही नहीं, जो बेटे को दिल से आशीर्वाद न देती हो, मुझे बेटे को दिए आशीर्वाद और उसके निश्छल प्रेम की कहानी किसी को बताने की जरूरत नहीं है.”