US की सबसे घातक फोर्स को टक्कर देते हैं ये भारतीय कमांडोज, 10 हजार में कोई 1 बनता है मार्कोस

लाइव सिटीज डेस्क : मुंबई हमलों के वक्त पहली बार मार्कोस कमांडो देश के सामने बड़े रूप में सामने आए थे. काली वर्दी, मुंह पर काला कपड़ा और आंखों पर चश्मा पहने इन कमांडोज को देश ने तब टीवी पर देखा था. किसी भी देश को ताकतवर बनाने के पीछे उसकी स्पेशल फोर्सेस का हाथ होता है जिसके दम पर हर देश दुनिया के सामने एक नई शक्ति के रूप में उभरकर सामने आ रहा है. विशेष सैन्य और रक्षा बल ही अपने देश का सम्मान बनाने और विश्व में एक अलग पहचान बनाते हैं.

ये मार्कोस दुश्मन के लिए बेहद घातक हैं और तो और समुद्री लुटेरों के लिए इनका नाम ही कहर है. मार्कोस इंडियन नेवी की एक स्पेथशल ऑपरेशन यूनिट है.

मार्कोस कमांडोज को पहले मरीन कमांडो फोर्स यानी एमसीएफ के नाम से भी जाना जाता था. मार्कोस को 26/11 हमले के ऑपरेशन में बुलाया गया था.

भारत के मार्कोस (मरीन) कमांडो सबसे ट्रेंड और मार्डन माने जाते हैं. मार्कोस को दुनिया के बेहतरीन यूएस नेवी सील्स की तर्ज पर विकसित किया जा रहा है. मार्कोस कमांडो बनाना आसान नहीं है. इसके लिए सेलेक्‍ट होने वाले कमांडोज को कड़ी परीक्षा से गुजरना होता है.

20 साल उम्र वाले प्रति 10 हजार युवा सैनिकों में एक का सिलेक्शन मार्कोस फोर्स के लिए होता है. इसके बाद इन्हें अमेरिकी और ब्रिटिश सील्स के साथ ढाई साल की कड़ी ट्रेनिंग करनी होती है. देश के मरीन कमांडो जमीन, समुद्र और हवा में लड़ने के लिए पूरी तरह से सक्षम होते हैं.

मार्कोस हाथ पैर बंधे होने पर भी तैरने में माहिर होते हैं. ये कमांडो हमेशा सार्वजनिक होने से बचते हैं. नौसेना के सीनियर अफसर की मानें तो परिवार वालों को भी उनके कमांडो होने का पता नहीं होता है. मार्कोस का निकनेम ‘मगरमच्छ’ है.

इसकी एनिवर्सिरी वैलेंटाइन डे के दिन यानी 14 फरवरी को होती है और इसका मोटो है, ‘द फ्यू द फियरलेस.’ अप्रैल 1986 में नेवी ने एक मैरीटाइम स्पे शल फोर्स की योजना शुरू की. एक ऐसी फोर्स जो मुश्किल ऑपरेशनों और काउंटर टेररिस्टि ऑपरेशनों को अंजाम दे सकें.

भारतीय नौसेना की इस स्पेशल यूनिट का गठन 1987 में किया गया. जब ऐसा किया गया तब समुद्र में बढ़ते खतरे को देखकर एक ऐसे खास बल की आवश्यकता महसूस की जा रही थी जो समुद्री लुटेरों और आतंकवादियों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए समुद्री ऑपरेशन को अंजाम दे सके. इनका मकसद जल से जमीन पर युद्ध छेड़ना है.

इसका मकसद कांउटर टेररिज्म, डायरेक्ट र एक्शऑन, किसी जगह का खास निरीक्षण, अनकंवेंशनल वॉरफेयर, होस्टेंज रेस्यूकस, पर्सनल रिकवरी और इस तरह के खास ऑपरेशनों को पूरा करना है.

2008 में मुंबई में हुए फिदायीन हमले में जब ताज होटल को आतंकियों ने अपने कब्जे में ले लिया था तब इन कमांडो का प्रयोग किया गया था. स्पेशल कमांडो दस्ते ने कुछ घंटो में होटल ताज और नरीमन हाउस को आतंकियों से मुक्त करवा लिया था.

इन जाबांजों को परंपरागत रूप से 7.02 एमएम आसान राइफल और स्टेलिंग एमके 4, सब मशीनगन, एके-47 असाल्ट राइपफल और एमपी मशीनगन जैसे अत्याधुनिक हथियारों से लैस किया जाता है. 1999 में हुई कारगिल जंग में भी मार्कोस ने भारतीय सेना को काफी मदद की थी. कुछ कमांडो आज भी जम्‍मू-कश्‍मीर में आर्मी के साथ जुड़े हुए हैं.

वे इलाके में काउंटर टेररिज्‍म में आर्मी का साथ देते हैं।कश्‍मीर बाढ़ में मार्कोस को बुलाये जाने का कारण था ऑपरेशन रक्षक जो झेलम नदी और वूलर झील में 1990 में चलाया गया था.

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