बिहार लोकायुक्त को मिली सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार की शिकायतें, सुनवाई में रह गया पीछे

लाइव सिटीज, सेंट्रल डेस्क: सरकारी तंत्र में उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार के मामलों पर नरज रखने को लेकर साल 2013 में ‘लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक’ को देश की संसद ने पारित किया था. समाजसेवी अन्ना हजारें के बड़े आंदोलन के बाद तब की यूपीए सरकार ने इस विधेयक को पारित किया था. इसके अनुसार केन्द्र और राज्य सरकारों को लोकपाल की नियुक्ती करनी थी. लेकिन 4 साल पूरे होने बाद जहां केन्द्र की मोदी सरकार लोकपाल की नियुक्ति नहीं कर सकी हे तो वहीं, बिहार जैसे कई राज्यों का हाल ये है कि यहां लोकापाल होते हुए भी मामलों का निपटारा नहीं होता है.

हाल ही में भ्रष्टाचार और पारदर्शिता के मुद्दे पर काम करने वाली एक गैर सरकारी संस्था जिसका नाम ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया है ने सूचना का अधिकार आवेदन के अनुसार यह खुलासा किया है कि 12 राज्यों में अभी भी लोकायुक्त के पद ख़ाली हैं. वही इसी आरटीआई में बिहार के लोकायुक्त को लेकर भी कई सारी बाते सामने आई हैं. इस बारे में एक निजी न्यूज साईट ‘द वायर न्यूज’ ने एक रिपोर्ट छापी हैं.

केन्द्र सहीत कई राज्यों में नहीं हुई लोकपाल की नियुक्ती

लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक, 2013 की धारा 63 में इस बात को कहा गया है कि संसद से इस क़ानून को पारित किए जाने के एक साल के भीतर सभी राज्य लोकायुक्त की नियुक्ति करेंगे. लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक 16 जनवरी 2014 को लागू हुआ था.  हालांकि कई सारे राज्यों ने इस नियम का उल्लंघन किया.  वहीं बिहार जैसे राज्य जहां इस अधिनियम के तहत सबसे पहले एक्शन लेते हुए लोकायुक्त का गठन तो किया लेकिन इसके बाद भी मामलों के निपटारे में इनकी रफ्तार इतनी धीमी रही की इनका होना भी न होने सा लगता है. बता दें कि इस समय दिल्ली समेत सिर्फ़ 18 राज्यों में लोकायुक्त हैंं.

(ये ग्राफिक्स ‘द वायर न्यूज’ से लिए गए हैं)

इस आरअीआई में देश के कई राज्यों मे लोकपाल नहीं होने से लेकर लोकायुक्त की बेबसाइट नही होने तक की बात सामने आई है. लेकिन बिहार इन राज्यों से इन सीाी मामलों में बेहतर होते हुए भी पीछ लगता है. 29 राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली में दायर की गई आरटीआई से इस बारे में कई बाते सामने आई हैं.

कैसा है बिहार में लोकायुक्त का प्रदर्शन

इस आरटीआई में इस सवाल को पूछा गया था कि साल 2012 से लेकर 2017 तक में लोकायुक्त के पास भ्रष्टाचार की कुल कितने मामले आए और इनमें से कितनी शिकायतों का हल लोकपाल के द्वारा किया गया. लेकिन बहुत से राज्य 2017 तक का आंकड़ा नहीं दे पाए, इन राज्यों की ओर से साल 2012-2015 तक के आंकड़े उपलब्ध राए गए ​हैं.

(ये ग्राफिक्स ‘द वायर न्यूज’ से लिए गए हैं)

इस आरटीआई में बात सामने आई की देश भर के उन राज्यों में जहां लोकायुक्त हैं, उन सभी में बिहार के लोकायुक्त के पास भ्रष्टाचार को लेकर सबसे ज्यादा शिकायतें आईं. वहीं इन मामलों के निपटारे करने में भी बिहार का फरफॉर्मेंस ज्यादा बेहतर नहीं है. इस आरटीआई  का जो जवाब आया है उसमें बताया गया कि साल 2012 से लेकर 2015 के बीच बिहार के लोकायुक्त के पास 40,119 मामले आए. जिसमें से बिहार के लोकायुक्त द्वारा 14,317 मामलों का निस्तारण किया गया है.

निस्तारण करने में महाराष्ट्र सबसे आगे

मामलो के निस्तारण करने में जहां महाराष्ट्र सबसे आगे है तो वहीं बिहार का नंबर कर्नाटक, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश के बाद पांचवा है. केरल का स्थान बिहार के बाद है. बात अगर वेसे मामलों की करें जो लोकायुक्त के पास विचाराधीन पड़े हैं या जिनपर कोई निर्णय नहीं हुआ है तो ऐसे मामलों के की संख्या सबसे ज्यादा बिहार के लोकायुक्त के पास हीं हैं.

(ये ग्राफिक्स ‘द वायर न्यूज’ से लिए गए हैं)

चवचाराधीन मामले बिहार के लोकायुक्त के पास 30,175 हैं, तो वही बिहार के बाद कर्नाटक दूसरे नंबर पर है जहां 28,529 मामले विचाराधीन हैं. जहां एक ओर बिहार में सबसे ज़्यादा मामले सामने आए हैं तो दूसरी ओर सुनवाई के लिए सबसे ज़्यादा मामले बिहार में ही लंबित पड़े हैं. यानी कि केस को हल करने के मामले में बिहार सबसे पीछे है. साल 2012-15 के बीच में सबसे ज़्यादा मामले महाराष्ट्र द्वारा हल किए गए हैं.

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