बिहार की ट्रैक्टर लेडी, अपनी हिम्मत और लगन से सबको छोड़ा पीछे, नहीं की समाज की चिंता

लाइव सिटीज, सेंट्रल डेस्क (राजेश) : यह कहानी है मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूर गोपालगंज के कुचायकोट प्रखंड के बरनैया गोखुल गांव निवासी जैबुन्निसा की. उन्होंने न सिर्फ कड़ी मेहनत व लगन से अपनी गरीबी का डट कर सामना किया, बल्कि अन्य महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाकर लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गईं.

ट्रैक्टर लेडी के नाम से मशहूर

जैबुन्निसा ने जब ट्रैक्टर की स्टेरिंग पकड़ी तो लोगों के बीच कौतूहल का विषय बन गया. इसकी चर्चा दूर-दूर तक होने लगी. जैबुन्निसा खुद ट्रैक्टर चलाकर खेतों की जुताई करती हैं. इसीलिए लोग इस महिला को ट्रैक्टर लेडी कहते हैं. दूसरों के यहां मजदूरी करने वाली निरक्षर जैबुन्निसा के मजबूत इरादे ने आज इन्हें लाखों की मालकिन बना दिया है.

टीवी देखकर मिली थी प्रेरणा

जैबुन्निसा सारण प्रमंडल की पहली महिला हैं जो ट्रैक्टर चलाकर खेती करती हैं. वह बताती हैं कि वर्ष 1998 में अपने एक रिश्तेदार के घर हरियाणा गईं थी. वहां उन्होंने टीवी पर केरल के किसी गांव में महिला द्वारा संचालित होने वाला स्वयं सहायता समूह के बारे में जाना. टीवी देखने के बाद उन्होंने भी मन में ठानकर, अपने गांव आकर कुछ महिलाओं के साथ स्वयं सहायता समूह का गठन किया.

खुद से ट्रैक्टर चलाना सीखा

गोपालगंज की जैबुन्निसा ने बैंक में खाता खुलवाया और महिलाओं को पैसे जमा करने को प्रेरित करती रहीं और खुद भी पैसा जमा करने लगीं. कुछ दिन बाद उन्होंने ग्रामीण बैंक सिमरा से कर्ज लेकर ट्रैक्टर खरीद ली. जैबुन्निसा ने खुद से ट्रैक्टर चलाना सीखा और खेतों में काम करने लगीं. आज जैबुन्निसा अपने कड़े परिश्रम के बल पर अपने परिवार के खुशहाल जीवन के साथ सैकड़ों परिवारों में खुशहाली लाने में जुटी हुई हैं.

250 महिलाओं को किया आत्मनिर्भर

10 महिलाओं तथा छोटी सी पूंजी से स्वयं सहायता समूह का गठन कर कार्य प्रारंभ करने वाली इस महिला ने अब तक बीस से ज्यादा समूहों का गठन कराया है. आज जैबुन्निसा के प्रयासों का ही नतीजा है कि 250 से ज्यादा महिलाएं आत्मनिर्भर होकर अपने परिवार को संबद्ध बनाने में जुटी हैं.

9 साल की उम्र में हुई थी शादी

जैबुन्निसा की कहानी कड़े परिश्रम से सफलता पाने की एक मिसाल है. इनकी शादी नौ वर्ष की उम्र में ही बरनैया गोखुल गांव के हिदायत मियां के साथ वर्ष 1967 में हुई. शादी के बाद से ही जैबुन खेतिहर मजदूर के रूप में कार्य करने लगीं. मजदूरी से मिले पैसों से अपने परिवार की परवरिश करना मुश्किल था.

नहीं देखा स्कूल का मुंह

जैबुन्निसा ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा और न ही घर पर पढ़ाई हो सकी. इसके बावजूद हमेशा कुछ नया सीखने की ललक से वह अपना नाम लिखना तथा कुछ शब्दों की पहचान सीख गयीं. आज प्रखंड की सैकड़ों महिला जैबुन की प्रेरणा से समूहों का निर्माण कर एक खुशहाल तथा आत्मनिर्भर जीवन जीने के प्रयास में आगे बढ़ रही हैं.

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