सोता रहा प्रशासन, परिजनों ने कंधे पर ढोई जवान लाडले की लाश

जहानाबाद (मुकेश कुमार) : बिहार के स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही कहें या फिर इंसानी हृदय में जज्बातों की कमी. लेकिन इस घटना से व्यवस्था पर सवाल जरूर खड़े होते हैं, फिर भले ही कोई उन सवालों का संज्ञान ले या न ले. कुछ ऐसा ही दिल को झकझोरने वाला वाकया हुआ है जहानाबाद के सदर अस्पताल में. सदर अस्पताल में ठनका गिरने से हुई मौत के बाद युवक के शव को अस्पताल लाया गया था. पोस्टमार्टम के तीन घंटे बाद भी जब एंबुलेंस नसीब नहीं हुई तो मृतक के गरीब परिजनों ने शव को खुद ही कंधे पर उठा लिया और घर की ओर चल दिए. इस घटना ने बिहार की छवि को फिर से धक्का पहुंचाया है.

ठनका गिरने से हुई थी मौत

मामला जहानाबाद के सदर अस्पताल का बताया जा रहा है. जहानाबाद के काको थानाक्षेत्र के नोन्ही गांव में गुरुवार रात ठनका गिर पड़ा था. इस हादसे में अति गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले 15 वर्षीय गुड्डू पण्डित पुत्र स्व. रामप्रवेश पण्डित की मौत हो गई थी. इस हादसे से उनके परिवार में हाहाकार मच गया था. गरीब पिता ने जब शव के अंतिम संस्कार की कोशिश की तो पुलिस ने कहा कि शव का पोस्टमार्टम होना जरूरी है. इसलिए परिजन और गांव वाले शव को लेकर सदर अस्पताल पोस्टमार्टम के लिए ले आए.

खूब लगे नारे , लेकिन सोते रहे डॉक्टर

पोस्टमार्टम के बाद शव को ले जाने के लिए परिजन गुहार लगाने लगे. लेकिन किसी ने उनकी एक नहीं सुनी. तकरीबन तीन घंटे तक इंतजार करने के बाद परिजनों का धैर्य जवाब दे गया. उन्होंने जमकर प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की और उम्मीद करते रहे कि शायद अस्पताल के किसी अधिकारी के अंदर का इंसान जाग जाए. लेकिन उम्मीद और गुहार में वक्त बरबाद होते देखकर परिजन संजय शर्मा और पंकज कुमार ने शव को कंधे पर ही उठा लिया. वह शव को पैदल ही लेकर गांव चले गए.

ड्यूटी का वक़्त पूरा हुआ, ड्यूटी नहीं…

बता दें के काको थाना क्षेत्र का नोन्ही गांव सदर अस्पताल से करीब 8 किमी दूर है. लेकिन जानकारी और हंगामा होने के बाद कोई भी डॉक्टर निकलकर बाहर नहीं आया. जब कारणों की पड़ताल की गई तो पता चला कि घटना के वक्त डयूटी आॅफिसर डॉ. संजय कुमार थे. पोस्टमार्टम के बाद ही उनकी ड्यूटी का वक्त पूरा हो चुका था. इसलिए एंबुलेंस होने के बाद भी शव लेकर रवाना नहीं की जा सकी. बाद में जब घटना की सूचना वरीय अधिकारियों को मिली तो ​हड़कंप मच गया. आनन—फानन में एंबुलेंस भेजी गई. बताया गया कि जब शवयात्रा गांव से तीन किमी दूर ही बची थी, तब जाकर एंबुलेंस में शव को जबरन रखवा दिया गया.

न कोई जिम्मेदार, न ही कोई शर्मिंदा…

यहां बताते चलें कि जहानाबाद सदर अस्पताल के नाकारेपन का यह कोई पहला वाकया नहीं है. इससे पहले भी हाल ही में खबर मीडिया में आई थी कि मरीजों का इलाज उनका एकलव्य जैसा शिष्य कर रहा था, जिसके पास मेडिकल की डिग्री तक नहीं थी. जब वह इलाज कर र​हा था तब डॉक्टर साहब भीतर नींद ले रहे थे. इस घटना के बाद भी अस्पताल प्रशासन ने न तो घटना की सुध ली है और न ही किसी अधिकारी ने मृतक के परिजनों से घटना के लिए माफी मांगी है.

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