शिक्षा आंदोलन के पुरोधा विनय कंठ नहीं रहे, बिहार से था गहरा लगाव

विनय कंठ का फाइल फोटो

लाइव सिटीज पटना : बिहार के प्रसिद्ध शिक्षाविद् विनय कंठ नहीं रहे. उनका निधन दिल्ली में हो गया. वे पटना यूनिवर्सिटी में गणित के प्रोफेसर थे और पटना के बीएन कॉलेज से रिटायर हुए थे. वे कई दिनों से बीमार चल रहे थे. उनके निधन से बिहार में शोक की लहर है. उन्होंने आईएएस की तैयारी करने वालों स्टूडेंट्स के लिए अभिभावक के रूप में थे. सोमवार को दिल्ली के लोदी रोड स्थित शव दाह गृह में उनकी अंत्येष्टि की गयी. पुत्र गौरांग कंठ ने मुखाग्नि दी. दिल्ली के लोदी रोड में हुई अंत्येष्टि के मौके पर परिजनों समेत पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा, केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा व पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दुबे आदि मौजूद रहे.

प्रो विनय कंठ देश और समाज के गंभीर मसलों पर हमेशा हस्तक्षेप करते थे. साथ ही सामाजिक सरोकार से जुड़े कार्यक्रमों में बढ़ चढ़ कर भाग लेते थे. उनकी बिहार, खासकर पटना के बुद्धिजीवियों के बीच गहरी पैठ थी. प्रोफेसर विनय कंठ शिक्षा जगत में सक्रिय होने से पहले भारतीय रेल यातायात सेवा में थे और कुछ वर्षों की सेवा के बाद उन्होंने रेलवे से रिजाइन कर दिया था. फिर वे भारतीय पुलिस सेवा के लिए भी चयनित हुए थे, लेकिन वे अपरिहार्य कारणाों से पुलिस में नहीं गये.



दिल्ली में अंतिम संस्कार के लिए पार्थिव शरीर ले जाते परिजन

इसके बाद विनय कंठ शिक्षा से जुड़ गये. वे एक कुशल शिक्षक, समाज के प्रति समर्पित व्यक्ति थे. उन्होंने समय-समय पर सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय रखी तथा समाज को जागृत करने का प्रयास किया. पटना विवि के भीतर और बाहर लोकतंत्र की रक्षा के लिए सिविल लिबर्टीज, नागरिक अधिकारों के लिए और शिक्षा के लिए उन्होंने काम किया. उनके निधन पर उनके मित्र रहे नेता शिवानंद तिवारी, पटना विवि के वरिष्ठ अर्थशास्त्री नवल किशोर चौधरी, वरिष्ठ गांधीवादी डॉ. रजी अहमद, प्रो. अजय कुमार झा ने दुख प्रकट किया है. साथ ही कहा है कि कंठ एक अच्छे सोशल एक्टिविस्ट थे. साथ ही एक शिक्षाविद भी थे. वे सार्वजनिक मसलों पर हमेशा बोलते थे.

उधर बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष सह विधान पार्षद केदार नाथ पाण्डेय और महासचिव सह पूर्व सांसद शत्रुघ्न प्रसाद सिंह सांसद ने कहा कि कि प्रोफेसर विनय कंठ न केवल बिहार बल्कि देश के शिक्षा आन्दोलन के एक पुरोधा थे. उनके नेतृत्व में बिहार में प्रतिवर्ष शिक्षा सम्मेलन आयोजित होते थे, जिसमें राज्य की शिक्षा व्यवस्था और देश की शिक्षा नीति में एक नया आयाम देने के संबंध में चिंतन मनन होता था.