मकर संक्रांति को लेकर बहू-बेटियों के घर भेजी जा रही खिचड़ी, जानें कब से शुरू हुई यह परंपरा

मकर संक्रांति को लेकर चुड़ा, तिलवा, तिलकुट की मार्केटिंग करती हुई महिलाएं

लाइव सिटीज, सेंट्रल डेस्क : मकर संक्रांति को लेकर बहू-बेटियों के घर खिचड़ी भेजी जाने लगी है. यह परंपरा काफी प्राचीन है, जिसका निर्वहन आज भी अधिकांश घरों के परिजन कर रहे हैं. खिचड़ी के रूप में साड़ी, शृंगार सामग्री, चूड़ा, तिलकूट, तिलवा, लाई आदि सामग्री भेजे जाने की परंपरा है. मायके व ससुराल से खिचड़ी आने का बहू व बेटियों को बेसब्री से इंतजार रहता है. इसी बहाने खिचड़ी लेकर आनेवाले लोगों से घर-परिवार व गांव के लोगों का हाल समाचार भी मिल जाता है.

पूस मास में जब सूर्य मकर राशि पर आता है तब इस पर्व को मनाया जाता है. यह त्योहार जनवरी माह के चौदहवें या पंद्रहवें दिन ही पड़ता है. इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है. एक दिन का अंतर लौंद वर्ष के 366 दिन का होने की वजह से होता है. बिहार में मकर संक्रांति को खिचड़ी के नाम से जाता है. इस दिन उड़द, चावल, तिल, चिवड़ा, गौ, स्वर्ण, ऊनी वस्त्र, कंबल आदि दान करने का अपना अलग महत्व है.

शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि अर्थात नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है. इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है. मकर संक्रांति पर गंगा स्नान एवं गंगा तट पर दान को अत्यंत शुभ माना गया है. इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गयी है. सामान्यत: सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं. किन्तु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायक है.

ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उनके घर जाते हैं. चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं. इसलिए इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है. महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिये मकर संक्रांति का ही चयन किया था. मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिलमुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं.

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