नहीं रहे अजीत अंजुम के पिता राम सागर, पूर्व जज को बेगूसराय दे रहा है श्रद्धांजलि

लाइव सिटीज, सेंट्रल डेस्क : बिहार के बेगूसराय के रहने वाले देश के जानेमाने पत्रकार अजीत अंजुम के पिता राम सागर का निधन हो गया है. उनके पिता पटना हाईकोर्ट में जिला जज रह चुके हैं. रिटायरमेंट के बाद अब वे बेगूसराय में ही अपने परिवार के साथ रहते थे. उनके निधन पर बिहार से लेकर दिल्ली तक के मीडिया जगत के लोगों ने शोक व्यक्त किया है. अजीत अंजुम को सांत्वना दी जा रही है. अंजुम खुद भी आज बेगूसराय पहुंचे हैं और अपने पिता को कंधा दिया.

अजीत अंजुम के साथ ही बेगूसराय में उनके जानने वालों ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से उन्हें श्रद्धांजलि दी है और अंजुम को सांत्वना दी है. आगे तस्वीरों के साथ हम आपको पढ़ा रहे हैं खुद अजीत अंजुम का लिखा फेसबुक पोस्ट. यह फेसबुक पोस्ट उन्होंने तब लिखा है, जब वे पिता की मृत्यु की खबर मिलने के बाद रास्ते में ही हैं…

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अपने पिता के साथ अजीत अंजुम (फोटो : फेसबुक पर साझा की गई)

‘बाबू जी हम सबको छोड़कर चुपके से चले गए . हम सबके लिए हीरो की तरह थे बाबूजी . हमारा संबल , हमारी ताक़त . हम पर अगाध भरोसा करने वाले पिता .

यक़ीन ही नहीं हो रहा कि बाबूजी ऐसे चुपचाप बग़ैर किसी हलचल के यूँ चले जाएँगे .

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राम सागर का पार्थिव शरीर

अभी तो हम उनके साथ चार दिन बिताकर लौटे थे . कितने खुश थे , हम चारों भाई -बहन को एक साथ देखकर . बेगूसराय जाने के लिए जैसे ही हम दिल्ली से निकलते , उनकी बेचैनी शुरु हो जाती थी . हर थोड़ी -थोड़ी देर में फ़ोन करते कि अब कहाँ पहुँचे ..पटना पहुँचते ही फिर फ़ोन आना शुरु हो जाता . बहुत प्यार भरी आतुरता से पूछते कि अजीत ? अब कितनी देर ?

मैं बताता कि रास्ते में हूँ . दो घंटे और लगेंगे .

थोड़ी ही देर बाद फिर फ़ोन आता – कहाँ पहुँचे बाबू ? बेगूसराय पहुँचने तक में कम से कम पाँच – सात बार उनका फ़ोन आ जाता था . अगर हम कहीं जाम में फँसते तो बाबूजी इंतज़ार में छटपटाने लगते थे . जैसे ही गाड़ी घर के पास बाबूजी बाहर ही इंतज़ार करते हुए मिलते . हम सबको देखते ही उनकी आँखों में चमक आ जाती .

आज फिर बेगूसराय जा रहा हूँ . माँ रो -रोकर निढाल होगी और बाबू जी का अब कोई फ़ोन नहीं आएगा …

ram-sagar11अपने पिता के पार्थिव शरीर को कंधा देते अजीत अंजुम और अन्य लोग

उफ़्फ़ बाबू जी , अभी तो आपको नहीं जाना था …आपके जाने का ग़म झेला नहीं जा रहा है बाबूजी ..हम तो कुछ दिनों में अपने आपको संभाल लेंगे लेकिन मेरी मां ? मैं बेगूसराय से 100 किलोमीटर दूर रास्ते में हूं लेकिन ऐसा लग रहा है जैसे मां के बिलखने की आवाज मेरे कानों में गूंज रही है ..मां तो टूट गयी होगी न बाबूजी जी , आपके जाने के बाद ..उसको कैसे संभालूंगा बाबूजी ?

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ये सब लिखते समय ऊँगलियाँ काँप रही है . आँखें डबडबाई हुई है . भागता हुआ आ तो रहा हूँ लेकिन आपके बेजान जिस्म को कैसे देख पाऊँगा बाबूजी ?’

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