मुंगेर में शिक्षा की अलख जगाने वाले डॉ राम प्रकाश का जाना काफी दुखद

लाइव सिटीज (राजेश ठाकुर) : मुंगेर के शिक्षा क्षितिज के एक मूर्धन्य व्यक्तित्व पंचतत्व में विलीन हो गए. यह शिक्षा जगत के लिए अपूरणीय क्षति है. जी हां, मुंगेर के JMS कॉलेज के पूर्व प्राचार्य सह संस्थापक डॉ राम प्रकाश सिंह नहीं रहे. उनका दिवंगत होना मुंगेर ही नहीं बिहार के शिक्षण जगत के लिए अपूरणीय क्षति है.

यों तो डॉ राम प्रकाश सिंह का जन्म वर्तमान में बेगूसराय के दहिया ग्राम, भगवानपुर ब्लॉक में हुआ था, पर उनके जन्म के समय वह मुंगेर जिला के अंतर्गत ही था. उनकी प्रारम्भिक शिक्षा बेगूसराय के जीडी कॉलेज में हुई, पर उन्होंने अपने स्नातक ऑनर्स की शिक्षा मुंगेर के आर डी एंड डी जे कॉलेज से प्राप्त की. बीच में कुछ समय परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण तारापुर हाईस्कूल में शिक्षक के रूप में कार्य किया. उनके अंदर की अग्रसर होने की हिलोड़ ने उन्हें वहां बहुत दिन स्थिर नहीं रहने दिया.

विभागाध्यक्ष की नौकरी छोड़कर आ गए मुंगेर

सोशल एक्टिविस्ट देव प्रकाश सिंह अपने फेसबुक वाल पर लिखते हैं- कुछ दिन शिक्षक की नौकरी के बाद राम प्रकाश बाबू ने एमए राजनीति शास्त्र पटना विश्वविद्यालय से खुद की कमाई से की. उसके बाद कुछ दिनों तक वे आरएस कॉलेज तारापुर में राजनीति शास्त्र के विभागाध्यक्ष के रूप में कार्य किये, लेकिन मुंगेर की माटी की पुकार उन्हें बहुत दिनों तक वहां रोक नही पायी. अपनी अच्छी खासी विभागाध्यक्ष की नौकरी छोड़कर आ गए मुंगेर.

मुंगेर की मिट्टी से था प्यार

एक ऐसी संस्था में प्राचार्य के रूप में साधना करने, जहां न तो मासिक वेतन का ठिकाना था, न तो विद्यार्थी था, न भूमि, न मकान. पांच बच्चों के पिता ने मौत की छलांग लगा दी. आ गए मुंगेर की धरा पर. पूर्व कॉलेज के प्राचार्य स्व दीप नारायण बाबू ने कहा, क्यों बाल बच्चों की जिंदगी से खेल रहे, प्रतिष्ठे प्राण मत गंवाइए, चलिये , तारापुर, वहां भी कुछ दिन में आप प्राचार्य बन ही जाइयेगा. डॉ राम प्रकाश सिंह ने कहा, सर अब यहीं कष्टहरनी घाट में समाधि ले लेंगे, पर लौट के अब हम तारापुर नहीं जाएंगे. ये मुंगेर की मिट्टी, जिससे मेरा अनवरत संवाद, अंतर्नाद चलता रहता है, मैं नहीं जाऊँगा.

कॉलेज सन 1979 में अंगीभूत सूची में आ गयी

इसके बाद राम प्रकाश जी लग चले जे एम एस कॉलेज के भविष्य को संवारने. दिन-रात बिन वेतन के गांव -गांव घूमने, दान की झोली भी फैलायी, कि कॉलेज को अपनी भूमि हो जाय. अंततः उनकी मेहनत रंग लायी. कॉलेज सन 1979 में अंगीभूत सूची में आ गयी.अब आ गयी भूमि की समस्या. साथ में वेतन विहीन शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारी की फौज, जो इन्होंने खुद खड़ा किया था. एन केन प्रकारेण कॉलेज के संस्थापक परिवार से लखीसराय के पूर्व विधायक कृष्णचन्द्र सिंह का असीम साथ, प्रोत्साहन एवं सम्मान मिला.

आज कॉलेज स्थापित है. सभी शिक्षकगण, शिक्षकेतर कर्मचारी गण अतिप्रतिष्टित वेतनमान एवं पेंशन से लाभान्वित हो रहे हैं. यही वजह रही कि विश्वविद्यालय में इस कॉलेज को राम प्रकाश बाबू के कॉलेज के नाम से जाना जाने लगा.

डॉ राम प्रकाश सिंह ने अपने जीवन की फाकाकसी के दिनों में कई एक किताबें लिखीं, जो उस समय के विश्वविद्यालय के सिलेबस में निर्धारित था ढेरों पी एच डी करवाई. वे जीवन श्रम, निष्ठा एवं कठोर मर्यादा का एक मिसाल बन गए. जीवनपथ एक घनघोर तपस्या ही इस महापुरुष का सदैव लक्ष्य रहा. प्राचार्य के रूप में सेवा के अंतिम दिनों में उनकी कीर्ति ” मुंगेर की मिट्टी बोलती है ” आज भी लोगों की जुबान पर है. बहरहाल उनके निधन से पूरा मुंगेर शोकाकुल है.

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