राकेश यादव अकेले नहीं हैं पटना के थानों की बोली लगाने वाले, लिस्‍ट बहुत लंबी है

पटनाः थाना बेच देने वाले थानेदारों की प्रजाति के सदस्‍य राकेश यादव ने गुरुवार 29 जून को बिहार पुलिस का एक नया रिकार्ड बना दिया. राकेश पटना के बेऊर थाना के थानेदार थे. अब अपने ही थाने के बेऊर जेल में बंदी रहेंगे. राकेश यादव को तब तक याद किया जाएगा,जब तक थाना बेचने वाला और कोई थानेदार नया रिकार्ड गढ़ते वक्‍त न पकड़ लिया जाए. राकेश कुछ माह पहले ही पटना पुलिस बल में आये थे.

राकेश यादव का रिकार्ड बड़ा इसलिए है, क्‍योंकि केस को फरियाने के लिए नहीं, केस दर्ज करने के लिए वे 1.25 लाख की कीमत वसूल रहे थे. एफआईआर दर्ज करने को यह रिकार्ड वसूली पहले कभी नहीं सुनी गई थी. विजिलेंस ने घूस लेते रंगे हाथ न पकड़ा होता,तो पता नहीं,राकेश यादव अपने प्‍लान के हिसाब से अकेले इस मामले में और कितनी वसूली कर लेते.

पटना में अकेले राकेश यादव नहीं हैं. दरअसल, पटना में पदस्‍थापित हर थानेदार का कोई न कोई दूसरा माय-बाप भी होता है. अपवाद बहुत मुश्किल से मिलेंगे. गिनती करेंगे,तो दो-चार-पांच के आगे की संख्‍या आप भूलने लगेंगे. पटना पुलिस बल में आने के लिए कोई न कोई माय-बाप की अनिवार्यता जरुरी है. ऐसे माय-बाप पालिटिकल ही अधिक होते हैं. काम लेने वाले अधिकारियों की पसंद की सुनवाई की प्रायोरिटी बाद में देखी जाती है.

फिर, जब ताकतवर दूसरे माय-बाप के बूते ये पटना में चले आते हैं, तो नशा और चढ़ जाता है. मनु महाराज जैसे साफ-सुथरे एसएसपी के समक्ष परेशानी यह होती है कि उन्‍हें उपलब्‍ध आफिसर्स के बीच से ही थानेदारी देनी होती है. ऑप्‍शन कम होते हैं, कंट्रोलिंग का टास्‍क अधिक टफ हो जाता है. पिछले कई वर्षों में पटना ने थानेदारों की पोस्टिंग को बिकते नहीं देखा है. कुछ साल पहले एक साहब थे, जिनके बारे में लोग कहा करते थे. अभी वो बात नहीं है. पर,पोस्टिंग के पैमाने के कुछ एलीमेंट्स ऐसे हैं,जो सदैव एक्टिव रहते हैं. बिहार है तो कास्‍ट फैक्‍टर को आप कभी इग्‍नोर नहीं कर सकते. कास्‍ट की ताकत पोस्टिंग के प्‍वाइंट्स को प्‍लस-माइनस करती है.

केस लिखने को जब थानेदार 1.25 लाख रुपया मांगे,तो समझ सकते हैं कि पटना के थानों में एफआईआर दर्ज करा लेना बहुत मुश्किल टास्‍क हो गया है. इसमें भी सोर्स-सिफारिश की जरुरत पड़ने लगी है. केस न दर्ज कर ‘ऑल इज वेल’ कह देने का ट्रेंड देश में पंजाब-हरियाणा पुलिस ने शुरु किया था,पर इसके प्रभाव क्षेत्र में अब संपूर्ण देश शामिल है. विकास वैभव जैसे आईपीएस कम ही मिलेंगे,जो एफआईआर दर्ज न किये जाने की शिकायत पर थानेदार को तुरंत सस्‍पेंड कर देते हैं.

पटना के थानेदारों को होश में रखना सबों के लिए बड़ी चुनौती रही है. अभी हाल में कई उदाहरण सामने आए. राकेश यादव जिस बेऊर थाने में बतौर थानेदार घूस लेते पकड़े गए, उसी थाने को तो पूरा का पूरा शराब के धंधे में शामिल होने के आरोप में लाइनहाजिर किया गया था. अविनाश यादव पटना आते ही कोतवाली के थानेदार बन गये थे. लेकिन कुछ माह में ही हटाना पड़ा,क्‍योंकि पुलिसिंग के प्रति वे कभी सीरियस दिखे ही नहीं. सीनियर आफिसर्स की बात भी कम ही सुनते थे. पर कुछ माह बाद फिर फतुहा थाने में पोस्टिंग मिल गई. यहां भी वे बेकाबू रहे. मनमानी पार कर गये, तो डीआईजी राजेश कुमार को एक्‍शन लेकर पैदल करना पड़ा.

पटना की पुलिसिंग को करीब से जानने वाले लोग कहेंगे कि हर थानेदार का माय-बाप फिक्‍स्‍ड है. वह उसे सभी खबरें पहुंचाता है. कई तो ऐसे हैं, जो अपने सीनियर्स का भी कॉल रिकार्ड कर माय-बाप को सुनाते हैं. इन थानेदारों के बीच पटना को मनु महाराज कैसे चलाते हैं,यह तो सिर्फ और सिर्फ उनका मन ही जानता है. सक्‍सेस रेट मनु महाराज का बस इसलिए बना रहता है, क्‍योंकि हर बड़े कांड के अनुसंधान में कूदने को तैयार उनके पास खुद की तैयार की हुई स्‍पेशल डेडिकेटेड टीम है. हाल देखें तो समझ जायेंगे कि मोर्चे पर मनु महाराज लड़ रहे होते हैं और इनकी व्‍यस्‍तता को जान इधर राकेश यादव जैसे अनेकों थानेदार प्रत्‍येक काम के लिए थानों की बोली लगा रहे होते हैं.

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