सीएम के मुंगेर आगमन के पूर्व बिहार केसरी पुस्तकालय के ट्रस्ट को भंग करने की साजिश

लाइव सिटीज डेस्क: बिहार को बौद्धिकों और क्रान्ति की भूमि माना जाता है. जिस भूमि पर बुद्ध को ज्ञान मिला हो, उस भूमि की महिमा का वर्णन शायद ही किसी कलम से लिखा जा सके. इस भूमि पर आजादी से पहले और बाद में भी अनेकानेक विद्वान जन्म लेते रहे हैं. बिहार केसरी बाबू श्री कृष्ण सिंह आजादी से पहले और बाद के विद्वानों में भी अग्रणी गिने जाते रहे हैं. बाबू श्री कृष्ण सिंह के नाम पर ही मुंगेर में गौरवपूर्ण श्री कृष्ण सेवा सदन पुस्तकालय की स्थापना की गई थी. श्री बाबू ने इस पुस्तकालय में अपनी निजी 18000 पुस्तकों का सहयोग दिया था. लेकिन आज यह पुस्तकालय न सिर्फ अव्यवस्था बल्कि साजिशों का भी शिकार है.

बिहार के सबसे समृद्ध पुस्तकालयों की बात करें तो पटना की खुदाबक्श लाइब्रेरी के बाद अगर किसी पुस्तकालय का नाम आता है तो वह निस्संदेह मुंगेर का श्री कृष्ण सेवा सदन पुस्तकालय ही है. 69307 ग्रंथों के विशद संग्रह से लैस इस पुस्तकालय में हिन्दी, अंग्रेजी, बांग्ला, फारसी, अरबी और उर्दू के तमाम ग्रंथों, पाण्डुलिपियों और हस्तलिखित पुस्तकों का संग्रह है. लेकिन फिलहाल यह पुस्तकालय बदहाली और साजिशों के दौर से गुजर रहा है.

विकास के लिए उदासीन है प्रशासन

ट्रस्ट के सदस्य लगातार प्रशासन पर पुस्तकालय की बेहतरी के लिए मौखिक और लिखित दबाव बनाते रहे हैं. लेकिन ट्रस्ट और सरकार के बीच हुए करार के उल्लंघन के प्रयास का आरोप जिला प्रशासन पर है. आरोप यह भी है कि स्थानीय विधायक के साथ मिलकर प्रशासन लाइब्रेरी पर कब्जा करने की फिराक में है. इससे पहले भी इसी विधायक के पंजे से तत्कालीन जिलाधिकारी, मुंगेर कुलदीप नारायण ने शाह जुबैर के मकान को मुक्त करवाया था.

क्या कहता है एग्रीमेंट

श्री कृष्ण सेवा सदन पुस्तकालय का उदघाटन 31—10—1953 को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने किया था. सन् 1966 को ट्रस्ट और सरकार के बीच करार किया गया था. करार में तय किया गया था कि ट्रस्ट इमारत, पुस्तक और उसकी सभी अचल सम्पति की देख—रेख करेगा और उस पर नज़र रखेगा. ट्रस्ट ही पुस्तकालय के मामले में सरकार को रखरखाव की सलाह देगा. सरकार के अधीन सारे कर्मचारी रहेंगे और सरकार लाइब्रेरी को चलाएगी.

सरकार लाइब्रेरी के प्रबंधन के लिए एक प्रबंध समिति बनाती है, समिति में ट्रस्ट के अध्यक्ष और सचिव पदेन सदस्य होते हैं और तीन सदस्यों का मनोनयन ट्र्रस्ट द्वारा किया जाता है. बाकी इस समिति में सरकार द्वारा शामिल लोग होते हैं. समिति हर 3 साल में बदली जाती है. 2011 में इस समिति ने नया सुझाव पास किया था, जिसके तहत पुस्तकालय के जीर्णोद्धार के लिए जमा पैसों को लाइब्रेरी के रखरखाव के लिए ही इस्तेमाल किया जाए.

बाद में क्या हुआ

जिलाधिकारी ने प्रस्ताव भेजकर सरकार के द्वारा नई समिति का गठन कर दिया. समिति में ट्रस्ट के सदस्यों को स्थान ही नहीं दिया गया. जबकि यह एग्रीमेंट का उल्लंघन है. इसके बाद उन्होंने ट्रस्ट को भंग करने की अनुशंसा कर दी. जबकि यह अनुशंसा ट्रस्ट के सदस्यों के अलावा कोई नहीं कर सकता था. ट्रस्ट के सदस्यों का आरोप है कि लोक निधि में हेरफेर के लिए जिला प्रशासन ट्रस्ट ख़त्म करना चाहता है.

सूत्र बताते हैं…

जिलाधिकारी ने ट्रस्ट को भंग करने के लिए ही यह सारी साजिश रची है. सारे पैसे संविदा पर बहाल लोगों के व्यक्तिगत अकाउंट में डाले जा रहे हैं. जबकि एक लाख से ऊपर के सभी काम बिना टेंडर के नहीं करवाए जा सकते हैं लेकिन जिलाधिकारी ने इस पूरी प्रक्रिया में निविदा मंगाने की जहमत नहीं उठाई है. अब सभी काम राजनीतिक कार्यकर्ताओं को उपकृत करने के लिए व्यक्तिगत तौर पर रेवड़ी की तरह पैसे बांटकर करवाए जा रहे हैं.

कब्जे की साजिश गहरी है !

आगामी 30 मई को मुख्यमंत्री मुंगेर के दौरे पर आ रहे हैं. उनका कार्यक्रम संभवत: श्री कृष्ण सेवा सदन पुस्तकालय में आने का भी हो. आरोप है कि इस समय ट्रस्ट के अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद वली रहमानी हैं, जो अमीर—ए—शरीयत, इमारते शरिया,(जनरल सेक्रेटरी, आॅल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड) हैं, जबकि प्रभात कुमार ट्रस्ट सचिव हैं.

मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव का बोर्ड उखाड़ा जा रहा है, जबकि जिला प्रशासन कमरे के ताले की चाभी सचिव से मांग रहा है. जबकि मोहम्मद वली रहमानी की नेम प्लेट को उखाड़ने की साजिश रची जा रही है. ट्रस्ट की मांग भी रही है कि ट्रस्ट की अनुशंसा पर सारे खर्चों की जांच होनी चाहिए तथा एग्रीमेंट के नियमों का सम्मान दोनों ही पक्ष करें.

मुख्यमंत्री का नाम आगे कर जिला प्रशासन स्थानीय विधायक को कब्ज़ा करवाने का प्रयास न करे.