महिलाओं की आर्थिक उन्नति का जरिया बन रहा है महिला उद्योग

लाइव सिटीज डेस्क : आधी आबादी भी आर्थिक उन्नति की राह पर है. कोई भी समाज तरक्की के शिखर पर तब तक नहीं पहुंच सकता, जब तक उस समाज की महिलाएं कंधे से कंधा मिलाकर न चलें. वह वक़्त गया जब यह कहा जाता था कि औरतें के जिम्मे तो बस घर का कामकाज है या बाल—बच्चों की देखभाल है. औरतों ने इस दकियानूसी सोच को गलत साबित किया है. अब वह सबल बनने की राह पर हैं और इसकी शुरुआत उन्होंने खुद भी की है और उनकी मदद के लिए हाथ भी आगे बढ़े हैं. पटना में भी ऐसी महिलाओं को सशक्त व सबल और आर्थिक रूप से सक्षम बनाने की पहल दो महिलाओं ने की. मेनका सिन्हा और शशि नारायण ने बोरिंग रोड, एसके पुरी से ऐसी ही मुहिम शुरू की थी. आइए उनकी कहानी जानते हैं.

मेनका सिन्हा और शशि नारायण ने पहले खुद को सशक्त किया और उसके बाद आसपास की गरीब महिलाओं को रोजी—रोजगार दे रही हैं. अब उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद कर रही हैं. इन दोनों महिलाओं ने मिलकर महिला उद्योग की शुरूआत की.

मेनका सिन्हा एक ब्यूटीशियन हैं, जबकि शशि नारायण एक हाउस वाइफ. इनका कहना है कि स्त्रियों को खुद ही आगे बढ़ना होगा. अगर वे ऐसा कर पाईं तो उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्द ही हालात बदलेंगे और वक्त करवट लेगा. हमारी एक छोटी—सी कोशिश यही है कि किसी स्त्री के चेहरे पर शिकन न रहे.

क्या काम करता है महिला उद्योग

महिला उद्योग में गरीब लाचार जरूरतमंद महिलाओं को सबसे पहले गृह उद्योग जैसे कि पापड़, आचार, तिलोरी, साबूदाना के पापड़, चिप्स और भी अन्य प्रकार के स्वादिष्ट व पौष्टिक खाद्य पदार्थों के निर्माण की ट्रेनिंग दी जाती है. उसके बाद इन महिलाओं द्वारा ही इसे तैयार किया जाता है, तैयार माल की पैकिंग की जाती है. उद्योग इन सामग्रियों की बिक्री का भी प्रबंध करती है.

तैयार माल की बिक्री के लिए जगह—जगह पर EXHIBITION लगाया जाता है. उसके बाद इसके लाभ को महिलाओं के बीच मापदंड के अनुसार बांटा जाता है. इस बारे में मेनका रानी बताती हैं कि बिना हर हाथ को काम सुलभ कराए महिला का सशक्तिकरण संभव नहीं है. जब तक महिला स्वावलंबी नहीं होंगी, तब तक उनका सशक्त होना मुश्किल है.

देशी स्वाद और पैसे कम

सबसे खास बात इस महिला उद्योग कि यह है कि यहां 50-75 रुपये में देशी स्वाद की खाद्य सामग्री जैसे आचार, पापड़, चिप्स आदि उपलब्ध हो जाती है. स्वाद और शुद्धता दोनों घर जैसी. महिला उद्योग अन्य कार्यों को भी अंजाम देने की कोशिश कर रहा है. शशि नारायण बताती हैं कि हमने एडल्ट को EDUCATION देने की एक मुहिम भी शुरू कि थी लेकिन कुछ समय बाद लोगों ने यह कह कर आना बंद कर दिया कि अब हमलोग पढ़ कर क्या करेंगे. हालांकि इसकी कोशिश अभी भी जारी है. इस महिला उद्योग कि तरफ से पिछले शनिवार से गरीबों में खिचड़ी वितरण का भी सिलसिला शुरू हुआ है. कोशिश यह की जा रही है कि इसको आगे भी जारी रखें. महिलों को और सशक्त करने के लिए महिला उद्योग समय—समय पर विभिन्न कार्यक्रम का आयोजन भी करती रहती है.