‘हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील की तो शिक्षक बिहार सरकार को माफ़ नहीं करेंगे’

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नीतीश कुमार और केदार नाथ पांडेय. फाइल फोटो

पटना : बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ बिहार सरकार से पटना हाई कोर्ट के दिए फैसले का सम्मान करते हुए नियोजित शिक्षकों के लिए अविलंब समान कार्य के लिए समान वेतनमान लागू करने का अनुरोध किया है. इस संबंध में संघ के अध्यक्ष MLC केदारनाथ पांडेय और महासचिव पूर्व सांसद शत्रुघ्न प्रसाद सिंह ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सह वित्तमंत्री सुशील कुमार मोदी को पत्र लिखा है.

मुख्यमंत्री को लिखे अपने पत्र में संघ ने बिहार सरकार को सदन के अंदर और बाहर अलग-अलग समय में दिये गए न्यायालय के निर्णय का सम्मान करने के बयान की याद दिलाई है. संघ के महासचिव शत्रुघ्न प्रसाद सिंह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और पटना हाई कोर्ट के फैसले को नकारने के दु:साहसिक स्वर सत्ता के गलियारे में गूंजने लगे हैं. यदि विधायिका और कार्यपालिका न्यायपालिका को लगातार नकारने एवं शिक्षा, शिक्षक एवं शिक्षार्थी के व्यापक हित के खिलाफ निरर्थक असंवैधनिक, अव्यावहारिक दलील देने के लिए जनता के पैसे का दुरूपयोग कर सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का निरर्थक प्रयास करती है तो शिक्षक सहित आम जनता सरकार को माफ़ नहीं करेंगे.

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शत्रुघ्न प्रसाद सिंह

उन्होंने कहा कि यह जगजाहिर है कि पिछले एक दशक से राज्य की शिक्षा व्यवस्था चरमरा गई है. इसकी बाह्य एवं आन्तरिक संरचना ध्वस्त हो गयी है. इसके बावजूद वित्तीय बोझ सिर्फ इसी क्षेत्र में बढ़ने की बयानबाजी को न्यायालय ने भी स्पष्टत: अस्वीकार कर दिया है. सिंह ने कहा कि सरकार को सोच-विचार कर संतुलित ढंग से बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रतिनिधियों के साथ विमर्श कर नौकरशाहों के द्वारा अनवरत गुमराह करने वाली गलत व्याख्याओं से बचना चाहिए. इसी से उसकी छवि भी बरकरार रह सकती है.

सिंह ने कहा कि मुख्यमंत्री की घोषणा के आलोक में माध्यमिक शिक्षकों को न्यूनतम 25 हजार और प्लस टू के लिए 29 हजार का वेतनमान नहीं देकर 19 हजार और 20 से 21 हजार का घटिया वेतनमान मनमाने ढंग से निर्धरित कर दिया. सातवें वेतन आयोग की अनुशंसा एवं वेतन निर्धारण के लिए निरूपित प्रक्रिया का उल्लंघन किया गया जिससे विसंगतियां उत्पन्न हो गयी हैं. पुन: वित्तीय आंकड़ेबाजी की जा रही है. आंकड़ों की बाजीगरी में सिद्धांतों की बलि नहीं दी जा सकती है.

वहीँ इस मामले पर संघ के अध्यक्ष केदारनाथ पांडेय ने कहा कि समान कार्य के लिए समान वेतन देने से सरकार दिवालिया नहीं हो सकती है. तमाम वेतन आयोगों ने वेतनपुनरीक्षण के साथ ही साथ राज्य की वित्तीय क्षमता का आकलन किया है. केन्द्र सरकार राज्य सरकारों को वित्तीय सहायता भी देती रही है. सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय माध्यमिक अभियान आदि परियोजनाओं में केन्द्र सरकार के विहित अनुदान राज्य को प्राप्त होते रहे हैं. उन्होंने कहा कि यह नासमझी है कि शिक्षा के क्षेत्र में किया गया व्यय निरर्थक और तुरंत फलदायी नहीं है. शिक्षा पर किया गया निवेश भविष्य निर्माण के लिए है और भारतीय संविधान के आलोक में प्रत्येक लोक कल्याणकारी राज्य के लिए अनिवार्य शर्त है कि शिक्षा को प्राथमिकता दी जाय.

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फाइल फोटो

उन्होंने कहा कि 2006 के पूर्व इस राज्य में माध्यमिक शिक्षकों की संख्या 50 हजार और प्राथमिक शिक्षकों की संख्या लगभग दो लाख थी. उनको उस समय तक छठे वेतनमान का लाभ देने में सरकारी खजाने से व्यय होने की बात स्वत: निराधार है. बढ़ती हुई महंगाई एवं सातवें वेतन आयोग द्वारा अनुशंसित आर्थिक एवं वित्तीय स्थिति पर विचार करने के बाद देश के एक करोड़ से ज्यादा शिक्षक/कर्मचारी को सातवें वेतन का लाभ देने में वित्तीय बहानेवाजी नहीं की गई हो तो दो-दो न्यायालयों के फैसलों को जानबूझकर रोकने की नीयत से सरकार राष्ट्र के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना बंद करे.

संघ ने अपील की है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी चुप्पी तोड़ें. वे लगातार सातवें वेतन का लाभ देने की बात सदन के अन्दर और बाहर व्यक्त करते रहे हैं. इसलिए अभी सरकार की प्रतिष्ठा और छवि को बनाये रखने के लिए न्यायालय द्वारा निर्देशित समान कार्य के बदले समान वेतन लागू करने संबंधी अधिसूचना निर्गत करे. यही वक्त की पुकार है और न्यायिक निर्णय का संवैधनिक सम्मान भी होगा.