फाइनल राउंड : शकील अहमद, अखिलेश सिंह, मदन मोहन झा रेस में

नई दिल्‍ली : पंजाब के गुरुदासपुर लोक सभा क्षेत्र के उपचुनाव में आज 15 अक्‍तूबर को मिली भारी जीत से कांग्रेस हेडक्‍वार्टर में अधिक ही खुशी है. सभी पुराने दिनों की वापसी की संभावनाओं को देखने में लगे हैं. दूसरी बात है कि असली अग्नि-परीक्षा तो गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधान सभा चुनाव में है. सोनिया गांधी कह चुकी हैं कि राहुल गांधी को अब पार्टी प्रेसीडेंट बनाने का वक्‍त आ चला है.

भविष्‍य की चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार हो रही कांग्रेस जानती है कि बगैर यूपी-बिहार के देश में कोई माहौल नहीं बनता. यूपी में अभी बहुत कुछ करने को नहीं है, पर बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी को नया अध्‍यक्ष मिलना है. पिछले पखवारे कांग्रेस आलाकमान ने बिहार के अध्‍यक्ष अशोक चौधरी को हटा दिया था. चौधरी के बारे में चर्चा रही है कि बिहार में महागठबंधन की सरकार के खत्‍म होने के बाद भी वे निरंतर नीतीश कुमार के संपर्क में रहे हैं. इसके साथ यह भी कि बिहार में कांग्रेस के विधायक टूटने को तैयार थे, जिसे बड़ी मशक्‍कत से पार्टी के केन्‍द्रीय नेतृत्‍व ने बचाया है. अब अशोक चौधरी के साथ निर्णय लेने को बहुमत की संख्‍या में विधायक नहीं बचे हैं.

अशोक चौधरी को हटाने के बाद पार्टी आलाकमान ने तत्‍काल कौकब कादरी को बिहार का वर्किंग प्रेसीडेंट बना दिया था. कौकब पहले बिहार कमेटी में वाइस प्रेसीडेंट थे. वे पार्टी के अखिलेश सिंह गुट के नेता माने जाते हैं. केन्‍द्रीय नेतृत्‍व ने अब बहुत जल्‍द बिहार को पूर्णकालिक अध्‍यक्ष देने का फैसला कर लिया है.

कांग्रेस के सूत्र बताते हैं कि सेंट्रल लीडरशिप फाइनल राउंड में शकील अहमद, अखिलेश प्रसाद सिंह और मदन मोहन झा के नामों पर विचार कर निर्णय लेना चाहता है. अशोक चौधरी गुट की बची-खुची कोशिश यह बची है कि किसी भी कीमत पद अखिलेश प्रसाद सिंह नये अध्‍यक्ष नहीं बनें. अखिलेश अभी पटना में एक बड़ा शो करने जा रहे हैं, जिसमें वे अपनी शक्ति दिखायेंगे. कांग्रेस के कई नेता शामिल होने को दिल्‍ली से जा रहे हैं.

कांग्रेस का बिहार में अब भी राजद के साथ गठबंधन बना है. लालू प्रसाद गठबंधन के बड़े नेता हैं. ऐसे में, पार्टी आलाकमान उनके मूड को भी जान लेना चाहती है. अखिलेश प्रसाद सिंह पहले राजद में थे. पर रिश्‍ते की मिठास समय-समय पर बढ़ी-घटी है.

शकील अहमद पहले भी प्रदेश अध्‍यक्ष रह चुके हैं. वे खुले तौर पर अध्‍यक्ष बनने को इच्‍छुक नहीं दिख रहे, पर समर्थक दिल को जानते हैं. 2014 के चुनाव में लालू प्रसाद से समझौते के तहत शकील अहमद ने अब्‍दुल बारी सिद्दीकी को लड़ने के लिए मधुबनी की अपनी पुरानी सीट छोड़ दी थी, बदले में राज्‍य सभा में एडजस्‍टमेंट की बात हुई थी. 2018 में राज्‍य सभा का चुनाव भी होना है. कांग्रेस निश्चित तौर पर बिहार में एक सीट की दावेदारी करना चाहेगी. कांग्रेस की मर्जी के बगैर बिहार में राज्‍य सभा का निर्विरोध चुनाव चुनाव नहीं हो सकता.

मदन मोहन झा निर्विवादित फेस हैं. आलाकमान ने लंबे अर्से से भरोसा रखा है. कोई दुश्‍मन नहीं है. ब्राह्मण कार्ड है. अभी जब बिहार में पार्टी में टूट का संकट गहराया हुआ था, तब मदन मोहन झा अगली पंक्ति में अकेले ऐसे नेता थे, जो दिल्‍ली में भी कह रहे थे कि कांग्रेस से अलग होने से बेहतर राजनैतिक जीवन से मुक्ति पा लेना है.

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