स्वच्छता सर्वे रिपोर्ट पर उठ रहे सवाल, अब CSE ने भी जताई रैंकिंग सिस्टम पर आपत्ति

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लाइव सिटीज डेस्क : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही भारत में स्वच्छता अभियान की शुरूआत की थी. इस अभियान को स्वच्छ भारत अभियान का नाम दिया गया था. इसके तहत स्वच्छता सर्वे की भी बात कही गई थी. लेकिन स्वच्छता सर्वे अब दागदार हो चुका है. चारों तरफ से उसकी शुचिता और ईमानदारी पर सवाल उठ रहे हैं. सवाल सिर्फ राजनीतिक दल ही नहीं तमाम गैर सरकारी संगठन भी उठा रहे हैं. राजनीतिक दल जहां शहरों को जानबूझकर निचली रैंकिंग देने की तोहमत मढ़ रहे हैं तो गैर सरकारी संगठन सर्वे के मापदण्डों और काम करने के तरीके पर ही आपत्ति जता रहे हैं.

क्या पटना से स्वच्छ है काशी?

स्वच्छता सर्वे में इस बार प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी को 36वां स्थान मिला है. जबकि देश का सबसे स्वच्छ शहर मध्य प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी माने जाने वाले इंदौर को चुना गया है. दूसरे नंबर पर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल को चुना गया है. बिहार की राजधानी पटना को इस रैंकिंग में 262वें नंबर पर रखा गया है. इंदौर भारत का सबसे साफ शहर कैसे हो सकता है? क्या वाकई वाराणसी भुवनेश्वर से ज्यादा साफ है? लेह गंगटोक से ज्यादा गंदा कैसे हो सकता है? मुंबई और नवी मुंबई के बीच 20 पायदानों का फर्क क्यों है? ये कुछ एेसे सवाल हैं जो इस वक्त नरेंद्र मोदी सरकार के आगे उठ रहे हैं. सरकार ने देश के 434 शहरों में स्वच्छता सर्वेक्षण कराया था, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट स्वच्छ भारत अभियान से प्रेरित है.

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जदयू ने जताई आपत्ति

जदयू के मुख्य प्रवक्ता संजय सिंह ने सर्वे पर न सिर्फ जमकर हमला बोला बल्कि मोदी सरकार की नीयत पर भी सवाल खड़े किए. संजय सिंह ने कहा कि अभी हाल ही में हुए गुरु गोविन्द सिंह जी के प्रकाशोत्सव के मौके पर पूरी दुनिया से लोग पटना आए थे. तब पटना की साफ—सफाई की तारीफ पूरी दुनिया में हुई थी. लेकिन अचानक ऐसा क्या हो गया कि पटना 72वें स्थान से अचानक 262वें स्थान पर पहुंच गया. केंद्र सरकार बदले की भावना से काम कर रही है.

वह राजधानी पटना को स्मार्ट सिटी नहीं बनने देना चाहती है. सफाई के मामले में बनारस की स्थिति किसी से छुपी नहीं है. फिर मोदी जी ने अपने संसदीय क्षेत्र में ऐसी कौन सी जादू की छड़ी घुमाई कि बनारस 200 से उपर स्थान से सीधे 36वें स्थान पर आ गया. स्पष्ट है कि राजनीतिक फायदा उठाने के लिए यह रैंकिंग हुई है. केंद्र बिहार के साथ भेदभाव न करे. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि बिहार सरकार इस मामले में केन्द्र से पत्राचार के माध्यम से भी बात करेगी.

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इन मापदण्डों पर हुआ है सर्वे

सर्वे के मुताबिक शहरों को पांच पैरामीटर्स की तर्ज पर रैंक दी गई है, ये हैं-साफ-सफाई, ठोस कचरे के निपटान, शौचालयों का निर्माण और खुले में शौच को रोकना और लोगों का बर्ताव बदलने के लिए जागरूकता अभियान चलाना. शहरों की निकाय संस्थाओं ने इन पैरामीटर्स पर अपनी तैयारियों का डेटा सर्वेक्षण में दिया था. निकाय संस्थाओं के दावों की जांच करने के सर्वेयर्स को तैनात किया गया था, जो खुद अपना भी निजी सर्वे कर रहे थे. फोन कॉल्स, सोशल मीडिया और डिजिटल एेप्स के जरिए आम नागरिकों की राय ली गई. इस सर्वे का 45 प्रतिशत हिस्सा निकाय संस्थाओं को दावों पर, 25 प्रतिशत हिस्सा सर्वेयर्स के सर्वे और 30 प्रतिशत नागरिकों के फीडबैक पर आधारित था.

‘बिहार के साथ राजनीतिक साजिश, दुनियाभर की तारीफ़ के बाद भी पटना की रैंकिंग 262 क्यों?’

मापदण्डों पर भी है आपत्ति

पर्यावरण पर काम करने वाले संगठन सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट (सीएसई) का कहना है कि केंद्र द्वारा स्वच्छ शहरों को चुने जाने की प्रक्रिया को बदलने की ज़रूरत है. संगठन का कहना है कि हाल ही में जारी की गई इस सूची के तीन शीर्ष शहरों ने कचरा प्रबंधन के जिन तरीकों को अपनाया है वह लंबे समय तक पर्यावरण के अनुकूल नहीं है. यही नहीं, जो शहर पर्यावरण के अनुकूल कचरा प्रबंधन के तरीकों का इस्तेमाल करते हैं उन्हें स्वच्छता सूची में बहुत नीचे स्थान दिया गया है. स्रोत से कचरा अलग करने और उसे पुन: इस्तेमाल में लाने जैसे पर्यावरण के अनुकूल तरीकों को बढ़ावा देने के लिए स्वच्छता सर्वेक्षण की कार्यप्रणाली को तुरंत बदलने की ज़रूरत है.

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फाइल फोटो

सीएसई की आपत्ति का यह है आधार

‘द वायर’ वेबसाइट की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि सीएसई के मुताबिक स्वच्छता सर्वेक्षण के शीर्ष तीन शहर- इंदौर, भोपाल और विशाखापत्तनम कचरे को उठाकर सीधे मलबा स्थल (लैंडफिल) पर ले जाते हैं. यानी ये शहर कचरे के निपटान के जिन तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं वह पर्यावरण के अनुकूल नहीं है. सीएसई का दावा है कि ये शहर कचरे को इकट्ठा करने और उसे लैंडफिल में ले जाने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, पर यहां कचरे को पुन: इस्तेमाल ने लाने लायक बनाने पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है. मतलब कि ये शहर म्यूनिसिपल सॉलिड वेस्ट (एमएसडब्लू) रूल, 2016 का पालन भी नहीं कर रहे हैं.

यह तो गलत बात है

सीएसई के अनुसार, इसके विपरीत घरेलू स्तर पर कचरे को अलग करने वाले और इसके पुन: उपयोग के लिए काम करने वाले शहरों को सर्वेक्षण में खराब रैंकिंग दी गई है. केरल के अलाप्पुझा शहर में कचरा प्रबंधन के विकेंद्रीकृत मॉडल का इस्तेमाल होता है. उसे सर्वेक्षण में 380वां स्थान दिया गया है. इसी तरह गोवा में पणजी शहर 90वें स्थान पर है, जिसने कचरा प्रबंधन के लिए सबसे बेहतर नीति अपनाई है. फिलहाल अलाप्पुझा और पणजी में कोई भी लैंडफिल साइट नहीं है.

साथ ही इन शहरों में कचरे से ऊर्जा पैदा करने वाले संयंत्र भी नहीं लगे हैं. इन शहरों के ज्यादातर कचरे का इस्तेमाल कम्पोस्ट खाद या फिर बायोगैस बनाने में होता है. इसके अलावा प्लास्टिक, धातु और पेपर आदि को रिसाइक्लिंग के लिए भेज दिया जाता है. ये शहर कचरे से पैसा बना रहे हैं जबकि दूसरे शहर कचरे को इकट्ठा करने और लैंडफिल तक ले जाने के लिए करोड़ो रुपये खर्च कर रहे हैं, फिर भी इन शहरों को स्वच्छता सर्वेक्षण में बहुत नीचे स्थान दिया गया है.

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