आगे ‘कत्ल’ की एक नहीं, दो-दो रातें हैं बिहार के हिस्से

लाइव सिटीज डेस्क (रुद्र प्रताप सिंह) : कत्ल की रात एक होती है. बिहार की राजनीति के संदर्भ में देखें तो एक नहीं, दो रातें हैं. एक रविवार की. दूसरी सोमवार की. बेशक इन रातों में सत्ता के साझीदारों की आंखों में नींद नहीं होगी. वजह कुछ और नहीं. यह डर कि कहीं सुबह नींद खुले और पता चले कि सत्ता चली गई है. यह खौफ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को है, तो सबसे बड़े पार्टनर राजद सुप्रीमों लालू प्रसाद भी इत्मीनान नहीं हैं. सो, माना जा रहा है कि सत्ता के लिए सोमवार-मंगलवार का दिन काफी अहम है. जय या क्षय-इन दो दिनों में होना है.

तूफान से पहले की शांति

सीएम नीतीश कुमार राजगीर से लौट गए हैं. चुप हैं. उनकी चुप्पी मंगलवार को पार्टी पदाधिकारियों की बैठक में टूटेगी. वह सोमवार को भी बोल सकते थे. साप्ताहिक कार्यक्रम संवाद के बाद वे मीडिया के साथ अपनी बात साझा करते रहे हैं. लेकिन, तबीयत खराब होने के नाम पर संवाद कार्यक्रम रद कर दिया गया. मंगलवार को पार्टी पदाधिकारियों की बैठक में ही वे अपनी राय देंगे. उनकी चुप्पी को तूफान से पहले वाली शांति के तौर पर देखा जा रहा है. अगर उनके मन के मुताबिक डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने कैबिनेट से इस्तीफा नहीं दिया तो सीएम मन की बात करेंगे.

क्यों है इंतजार

बेनामी संपत्ति के मामले में सीबीआइ की ओर से नामजद किए जाने के बाद राजद के विधायकों, सांसदों और प्रमुख नेताओं की बैठक सोमवार को हो रही है. अधिक उम्मीद इस बात की है कि तेजस्वी के पक्ष में प्रस्ताव पारित होगा कि एफआइआर में नाम आने के चलते वे अपने पद से इस्तीफा न दें. बचाव के लिए केंद्रीय मंत्री उमा भारती की नजीर दी जा सकती है. भारती चार्जशीटेड हैं और उनके खिलाफ ट्रायल भी चल रहा है. सीधा हिसाब यह कि अगर केंद्रीय मंत्री चार्जशीटेड होने के बाद पद पर बनी रह सकती हैं तो महज एफआइआर में नाम दर्ज होने के नाम पर तेजस्वी क्यों इस्तीफा दें.

तो नीतीश इस्तीफा देंगे

जदयू के रणनीतिकार बता रहे हैं कि नीतीश दुविधा में हैं. तो उनके सामने इससे निकलने का सबसे आसान रास्ता यह है कि वह खुद पद से इस्तीफा देकर चुनाव मैदान में जाने के विकल्प का चुनाव करें. एक विकल्प यह भी बताया जा रहा है कि खुद इस्तीफा देने के बदले तेजस्वी को कैबिनेट से बाहर कर दें. सूत्रों का दावा है कि नीतीश दूसरे के बदले पहले विकल्प पर अमल करना पसंद करेंगे.

मध्यावधि चुनाव का रास्ता

अगर तेजस्वी खुद इस्तीफा नहीं देते हैं तो राज्य मध्यावधि चुनाव की राह पर जा सकता है. जदयू के लोग इस संभावना को पूरी तरह खारिज कर रहे हैं कि भाजपा के सहयोग से नीतीश सरकार चला लेंगे. यह संभावना दो महीने पहले तक थी. आज की तारीख में भाजपा भी इसके लिए तैयार नहीं है. हां, चुनाव के समय में नए गठबंधन की किसी संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता है. क्योंकि भाजपा का आत्मविश्वास इस स्तर तक नहीं पहुंचा है कि वह अपने दम पर या रालोसपा, लोजपा और हम जैसे सहयोगियों के सहारे चुनाव जीतने के बारे में सोच सके.

तो लालू चुप बैठेंगे क्या?

यह ठीक है कि नीतीश कुमार विधानसभा भंग कर मध्यावधि चुनाव की सिफारिश कर सकते हैं. सवाल यह है कि ऐसी नौबत आने पर लालू प्रसाद चुप बैठ जाएंगे क्या? लालू की प्रवृति को समझने वाले लोग इस सवाल का जवाब ना में देते हैं. तर्क यह है कि सबसे बड़े दल के नाते लालू प्रसाद राजद की अगुआई में सरकार गठन का दावा राज्यपाल के पास करेंगे. उस समय उनके पास कांग्रेस के 27 विधायकों का समर्थन रहेगा. 243 सदस्यीय विधान सभा में सरकार को कामचलाऊ बहुमत के लिए 122 विधायकों का समर्थन चाहिए. राजद-कांग्रेस का आंकड़ा इससे 15 कम होगा. इसकी जरूरत विश्वासमत जीतने के समय होगी. जोड़तोड़ के उस्ताद लालू इसका जुगाड़ नहीं कर सकते हैं, उनकी क्षमता को देखते हुए इसे असंभव नहीं कहा जा सकता है.

कौन बनेगा सीएम

अगला सवाल यह है कि ऐसी स्थिति में कौन सीएम बनेगा? लालू कुनबे का कोई आदमी सीएम बनने के रेस में नहीं है. एहतियात के तौर पर जदयू के भीतर से ही एक अदद जीतनराम मांझी की खोज हो रही है. राजद के दावे पर भरोसा करें तो यह खोज पूरी हो चुकी है. हां, मांझी नहीं, यादव बिरादरी के होंगे. बुजुर्ग और ईमानदार छवि के एक सज्जन सीएम बनाए जा सकते हैं.

बेशक, वे पद छोड़ने की नौबत आने पर मांझी की तरह जिद नहीं करेंगे.