सम्राट चौधरी के बाद भगवान सिंह कुशवाहा नये घर में प्रवेश को तैयार

पटना (महिमा सिंह) : बिहार में कुशवाहा पॉलिटिक्स अचानक बहुत तेज हो गई है. पूर्व मंत्री सम्राट चौधरी ने जीतनराम मांझी की पार्टी हम को बाय-बाय बोल दिया है. भाजपा में 11 जून को शामिल हो रहे हैं. उदाहरण कम मिलेंगे, पर बिहार में हो रहा है. वह यह कि भाजपा अपने ही सहयोगी दल मतलब मांझी की पार्टी हम के बड़े नेता की सीधी इंट्री ले रही है. किसी कुशवाहा नेता की तलाश भाजपा नेता को लंबे समय से थी. NDA में उपेंद्र कुशवाहा हैं, केंद्र में मंत्री भी हैं, पर इन्हें लेकर पोलिटिकल कॉरिडोर की चर्चाओं से भाजपा नेतृत्व बहुत सहज नहीं रह गया है.

सम्राट चौधरी के भाजपा में शामिल होने की खबर देते वेलकम होर्डिंग पटना की सड़कों पर लग गए हैं. मिलन समारोह श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में आयोजित है. सम्राट के पिता शकुनी चौधरी बिहार में कुशवाहा राजनीति के बड़े क्षत्रप रहे हैं. पर, इन दिनों अधिक उम्र के कारण स्वयं नेपथ्य में रहकर बेटे सम्राट को ही आगे बढ़ाने में लगे हैं.

राजनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि सम्राट चौधरी को भाजपा में शामिल कराया जाना निश्चित तौर पर रालोसपा प्रमुख और केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा को अच्छा नहीं लग रहा होगा. पर, वे कर भी क्या सकते हैं. अपने ही सांसद अरुण कुमार की बगावत के बाद उन्हें पार्टी के सांगठनिक स्तर पर भी कई चुनौतियां झेलनी पड़ रही हैं. अब तक ठोस विकल्प नहीं मिला है. फिर अपने कई बयान से भी वे अनेक मौकों पर भाजपा नेतृत्व को असहज कर चुके हैं.

2014 के लोकसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा का सक्सेस रेट 100 प्रतिशत था. भाजपा ने कुशवाहा की पार्टी रालोसपा को तीन सीटें दीं, मोदी लहर में सभी जीत गए. पर 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में बुरी गत हुई. हालात ऐसे हैं कि उपेंद्र कुशवाहा को खुद को मजबूत करना है. यह दिखना चाहिए कि कुशवाहा वोट बैंक बिखरा नहीं, उनके साथ है. सो, वे प्रतिद्वंदियों को भी साथ लाने के एजेंडे पर काम कर रहे हैं.

भगवान सिंह कुशवाहा पहले नीतीश कुमार की सरकार में मंत्री थे. लेकिन, 2015 के चुनाव में जदयू-राजद के गठबंधन से सूरत ऐसी बनी कि वे विधानसभा के टिकट से वंचित हो गए. तभी मधेपुरा सांसद पप्पू यादव ने अपनी पार्टी जन अधिकार पार्टी (लो) बनाई थी. वे पप्पू की पार्टी में आ गए. चुनाव में स्टार प्रचारक रहे.

चुनाव बाद पप्पू ने भगवान सिंह कुशवाहा को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया. अब भी हैं, लेकिन पिछले महीने से एक्टिव नहीं दिख रहे. बताया जा रहा है कि वे अब उपेंद्र कुशवाहा के संपर्क में आये हुए हैं. बातें फाइनल स्टेज में है. मिलन की तारीख का एलान कभी भी संभव है. भगवान सिंह कुशवाहा का प्रभाव विशेष रुप से शाहाबाद की पॉलिटिक्स में है. उपेंद्र कुशवाहा ने लोकसभा का चुनाव भी काराकाट से जीता है.

कुशवाहा पॉलिटिक्स की खबर रखने वालों की नजर नागमणि पर भी है. करीब-करीब सभी पार्टियों में रह चुके हैं. भारत सरकार में मंत्री भी बन गए थे. अंत में, अपनी पार्टी बनाई. पिछले कुछ चुनावों में लगातार हार का सामना करना पड़ा है. मूल में कुशवाहा गणित है. जानकारी के मुताबिक नागमणि वर्तमान गतिविधियों पर ध्यान रखे हैं. कॉमन प्लेटफार्म के बारे में सोचने लगे हैं. पर, अंतिम फैसला लेने में अभी थोड़ा वक़्त है.

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