उपेंद्र के लिए NDA में हो न हो, लालू के दिल में तो वैकेंसी है ही

लाइव सिटीज डेस्क (रुद्रप्रताप सिंह) : रालोसपा अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा बिहार के अगले सीएम होंगे. गांधी मैदान में रविवार को आयोजित एक सम्मेलन में यह सदिच्छा जाहिर की गई. सम्मेलन रालोसपा का था. इसे संबोधित करने वाले सभी नेताओं ने एक या एक से अधिक बार इसका जिक्र किया कि राज्य को बेहतर रास्ते पर ले जाने की क्षमता उपेंद्र कुशवाहा में ही है. सो, वे अगले सीएम हैं. वक्ताओं ने इस विषय को टच नहीं किया कि कुशवाहा किस समीकरण से सीएम बनेंगे. राज्य में कोई एक दल अपने दम पर सरकार बनाने का दावा नहीं कर रहा है. मूल रूप से दो गठबंधन है-एनडीए और यूपीए. इनके अलावा वाम दल भी हैं. ये सरकार बनाने का दावा नहीं करते.

NDA में नो वैकेंसी की तख्ती
आज की तारीख में बात करें तो अगले विधानसभा चुनाव तक एनडीए में सीएम पोस्ट की वैकेंसी नहीं होने जा रही है. नीतीश कुमार ही एनडीए के अगले दावेदार हैं. समीकरण में बहुत अधिक बदलाव हुआ. 2019 में केंद्र में फिर से भाजपा की अगुआई में सरकार बनी. उस समय हो सकता है कि नीतीश के लिए केंद्र में कोई नई और असरदार भूमिका तय हो. उस हालत में भी भाजपा या जदयू के ही किसी नेता को सीएम की कुर्सी मिल सकती है. इन दोनों दलों के इतर एनडीए के दूसरे घटक दलों के लिए कोई गुंजाइश बनती नजर नहीं आ रही है. लोजपा के साथ रालोसपा और हम का दावा भी नहीं बनता है.

 

UPA में है उम्मीद की किरण
उपेंद्र के लिए एनडीए में भले ही सीएम पद की गुंजाइश नहीं हो, पर इससे उन्हें निराश होेने की जरूरत नहीं है. यूपीए में उन्हें इस पद पद जगह मिल सकती है. यूपीए के सबसे बड़े घटक दल राजद को उपेंद्र कुशवाहा से कभी परहेज नहीं रहा है. राजद में इस पद के स्वाभाविक उम्मीदवार तेजस्वी यादव हैं. लेकिन, वह फिलहाज जल्दबाजी में नहीं हैं. तेजस्वी सीएम बनने के लिए 2025 तक का इंतजार कर लेंगे. वैसे भी राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद की बदली हुई प्राथमिकता सूची में बेटे को सीएम बनाना नहीं है. नीतीश कुमार को इस पद से हटाना है. राजद आज भी अकेले में सबसे बड़ी ताकत है. उसके वोटरों को इस बात से अधिक फर्क नहीं पड़ता है कि कौन सीएम बनेगा. उनके लिए लालू प्रसाद का संकेत ही सबकुछ होता है. इसका प्रमाण विधानसभा के पिछले चुनाव में भी मिला. तब नीतीश कुमार महागठबंधन की ओर से प्रस्तावित सीएम थे. इसके बावजूद राजद के वोटरों ने एकमुश्त वोट किया.

 

Lalu-yadav
फाइल फोटो

वोटों का समीकरण हक में है
मोटे तौर पर राजद के पक्ष में माय समीकरण का वोट एकजुट है. यह एकजुटता पहले की तुलना में अधिक मजबूत हुई है. दलितों के एक हिस्से में आज भी लालू प्रसाद असरदार हैं. बसपा सुप्रीमो मायावती अगर लालू प्रसाद के साथ आती हैं तो रविदास बिरादरी का वोट एकजुट हो जाएगा. इसमें अगर उपेंद्र की साझीदारी से कुशवाहा का वोट जुड़ जाता है तो 40-42 फीसदी के वोट शेयर के चलते यह गठबंधन अजेय बनकर उभर सकता है. यह स्थिति उपेंद्र कुशवाहा के सीएम बनने की संभावना को प्रबल बनाता है. और यह भी एक कारक बन सकता है कि अगले विधानसभा चुनाव में जब नीतीश कुमार जनता के बीच होंगे, उनके पास सत्ता की किसी कमी के लिए किसी और को कोसने का बहाना नहीं रहेगा. सत्ताजनित विक्षोभ कितना भी कम हो, वह वोटों का क्षरण तो करता ही है.

 

कोई समीकरण असंभव नहीं
राज्य में अब किसी समीकरण को असंभव नहीं माना जा सकता है. नीतीश और लालू गले मिल सकते हैं. भाजपा और जदयू का भारी फजीहत के बाद दोबारा मिलन हो सकता है. इस हालत में लालू अगर उपेंद्र कुशवाहा को भावी सीएम घोषित कर दें और उपेंद्र और उनकी बिरादरी इसे राजी खुशी स्वीकार भी कर लें तो यह ताज्जुब की बात नहीं होगी. कुछ कहिए, इस सच से इनकार नहीं कर सकते हैं कि कुछ अपरिहार्य कारणों से उपेंद्र अब नीतीश कुमार को दिल से नेता नहीं स्वीकार पाते हैं.