अब लालू नहीं, नीतीश तय करें उन्हें क्या करना है…

लाइव सिटीज डेस्क (रुद्र प्रताप सिंह) : कहावत नहीं, बुजुर्गों की नसीहत है- बिल्ली को घेरिए. मगर, उसे सुरक्षित निकलने का मौका भी दीजिए. नहीं तो बिल्ली भी…! डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव प्रकरण अब सुरक्षा में बिल्ली के हमलावर होने की ओर बढ़ रहा है. बेशक यह मामला बिल्ली को नहीं शेर को घेरने जैसा है. एफआइआर के आधार पर इस्तीफा न देने के राजद के फैसले ने जदयू को सरकार के बचाव के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच तैयार करने के लिए मजबूर कर दिया है.

क्या है राजद की रणनीति
तीन दिन तक मुलायम रहे लालू के शुक्रवार की रात कठोर हो जाने के पीछे का राज यही है कि अब वे आर-पार की लड़ाई के मूड में आ गए हैं. सूत्रों की मानें तो राजद ने आकलन किया है कि राज्य में उसे दो दुश्मनों से लड़ना पड़ रहा है. एक भाजपा है जो खुल कर राजद से लड़ रही है. दूसरा जदयू है जो तकनीकी तौर पर राजद का दोस्त है. व्यवहार में दुश्मनी निभा रहा है. जदयू की राजद की तुलना में भाजपा से अधिक नजदीकी कई मामलों में जाहिर हो चुकी है.

दुश्मन की संख्या कम करो
इस्तीफा न देने की घोषणा कर लालू ने दुश्मनों की संख्या कम करने या कह लीजिए कि भाजपा से सीधे लड़ने की रणनीति का खुलासा कर दिया है. नये दौर में यह नीतीश के लिए संकेत है कि वह ढुलमुल रहने के बदले अपना स्टैंड स्पष्ट कर दें- महागठबंधन और भाजपा में से किसके साथ रहना पसंद करेंगे! कड़ियों को जोड़कर देखें तो राजद चाह रहा है कि नीतीश कुमार भाजपा से दोस्ती कर लें, ताकि अगली लड़ाई सीधी हो और भाजपा-राजद के बीच हो. कोई तीसरा कोण नहीं बन पाए. आकलन यह है कि जदयू-भाजपा के बीच दोस्ती होती है तो कांग्रेस खुद ब ख्रुद राजद के साथ खड़ी हो जाएगी. यह स्थिति सदन के भीतर और बाहर भी राजद के लिए फायदेमंद होगी. कोई यह तो कल्पना भी नहीं कर सकता है कि भाजपा की मदद से बननेवाली किसी सरकार में कांग्रेस पार्टनर बनना पसंद करेगी.

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हड़बड़ी में नहीं हैं तेजस्वी
सीएम बनने को लेकर तेजस्वी यादव हड़बड़ी में कतई नहीं हैं. कम से कम 2020 तक उन्होंने अपने लिए विपक्ष की भूमिका निर्धारित कर ली है. करीबी कहते हैं कि सीएम पद पर जाने के लिए वह अगले चुनाव यानी 2025 तक इत्मीनान हैं. यह लंबा वक्त है. निष्कर्ष के तौर पर आप कह सकते हैं कि इस्तीफा न देने का फैसला राजद ने सोच समझकर उठाया है. उसके समर्थक इस्तीफे की शर्त को बिहार विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी के लिए अपमानजनक मान रहे हैं. लालू पर अड़े रहने के लिए दबाव बना रहे हैं.

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उत्साह की वजह भी है
राजद बेवजह उत्सहित नहीं है. पूरे घटनाक्रम में उसका माय समीकरण पहले की तुलना में अधिक एकजुट हुआ है. मायावती को राजद कोटे से अगले साल राज्यसभा में भेजने की बात चल रही है. यह हो गया तो बिहार में मायावती के समर्थक दलित खासकर रविदास बिरादरी के वोटर राजद का साथ देंगे. इसके अलावा अगले चुनाव में एंटी इनकम्वेंसी फैक्टर का लाभ भी राजद को मिलेगा. जहां तक तेजस्वी की छवि का सवाल है, यह लालू प्रसाद की तुलना में अधिक सामाजिक समूहों में स्वीकार्य है.

एफआइआर पर इस्तीफा कैसे
इसमें कोई दो राय नहीं कि बेशुमार दौलत इकट्ठा करने के चलते लालू प्रसाद की खूब आलोचना हो रही है. उनकी गरीब वाली छवि भी बुरी तरह खंडित हो रही है. लेकिन, इन सबके बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि सिर्फ सीबीआइ के एफआइआर होने पर इस्तीफा होने लगे तो इस देश में कोई गैर-भाजपाई सरकार का सीएम तक अपनी कुर्सी बचा सकता है क्या?

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