ये तस्‍वीर है वायरल, पॉलिटिकल कंट्रास्‍ट को तेज समझाती है, आप भी समझ लें

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पटना : स्‍टोरी को आगे पढ़ने के पहले तस्‍वीर को देख ले . ठीक से देख लें . बहुत कुछ समझना है आपको . बिहार का पॉलिटिकल कंट्रास्‍ट जान जायेंगे आप . यह तस्‍वीर 22 साल पुरानी है . 3 जुलाई 1995 की . तब ब्‍लैक एंड व्‍हाइट अखबार ही पटना से छपा करते थे .

तस्‍वीर राजधानी पटना के वीआईपी इलाके स्‍ट्रैंड रोड में फोटो जर्नलिस्‍ट ने ली थी . वाकया बड़ा था . सरकारी बंगले पर शाम को मशरख (छपरा) के जनता दल के विधायक अशोक सिंह की बम मारकर हत्‍या कर दी गई थी . कोहराम मचा था .

पास में ही 1,अणे मार्ग में लालू प्रसाद मुख्‍यमंत्री निवास में रहा करते थे . बम की आवाज वहां तक गई थी . अशोक सिंह पहली बार विधायक बने थे . कुछ दिनों पहले ही इस बंगले में रहने को आये थे .

अपने विधायक की हत्‍या की खबर मिलते ही लालू प्रसाद पहुंचे थे . डीजीपी पहले से आये हुए थे . अब तस्‍वीर को फिर से देख लीजिए .

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मुख्‍यमंत्री लालू प्रसाद मार दिये गये विधायक अशोक सिंह की पत्‍नी चांदनी सिंह को ढ़ांढस बंधाते दिख रहे हैं . हत्‍या के कारण स्‍पष्‍ट थे . सभी जान रहे थे कि इसके पीछे प्रभुनाथ सिंह हैं . प्रभुनाथ सिंह को ही अशोक सिंह ने हराया था . तभी एलान हो गया था कि अशोक सिंह जिंदा नहीं बचेंगे .

90 दिनों का डेडलाइन तय होने की बात सामने आ गई थी . तस्‍वीर में लालू प्रसाद शोकाकुल दहाड़ मारकर रोती चांदनी सिंह को कह रहे हैं – नहीं छोड़ेंगे किसी को . जाहिर तौर पर वे प्रभुनाथ सिंह व अन्‍य के बारे में ही कह रहे थे .

प्रभुनाथ सारण में पहले से दबंग थे . मशरख में हार जायेंगे,कभी सोचा न था . लालू प्रसाद से पंगा ले चुके थे . पहले वे लालू प्रसाद के साथ ही थे . 1990 में प्रभुनाथ सिंह जनता दल के विधायक बने थे और लालू प्रसाद मुख्‍य मंत्री .

1990 के विधान सभा चुनाव में मशरख में अशोक सिंह कहीं तस्‍वीर में नहीं थे . तब 27 फरवरी 1990 को हुए चुनाव में प्रभुनाथ सिंह ने कांग्रेस के हरेन्‍द्र सिंह को हराया था . प्रभुनाथ को 71536 और हरेन्‍द्र को 12498 वोट मिले थे .

आगे बिहार की पालिटिक्‍स में आनंद मोहन का उभार तेजी से हुआ . बिहार पीपुल्‍स पार्टी (बिपीपा) का जन्‍म हुआ . शोर इतना था कि पूछिए मत . प्रभुनाथ सिंह ने लालू प्रसाद का साथ छोड़ दिया .

बिहार की बड़ी जातियां आनंद मोहन की ओर अग्रेसिव होती दिख रही थी . छपरा-सिवान में शहाबुद्दीन का कद तेजी से बढ़ रहा था . प्रभुनाथ सिंह से 36 का रिश्‍ता था . लालू प्रसाद किसी कीमत पर जिला छपरा को नियंत्रण से बाहर नहीं जाने देना चाहते थे .

प्रभुनाथ सिंह ने लालू प्रसाद को आनंद मोहन के साथ मिलकर बिहार भर में ललकारना शुरु कर दिया था . लालू कैसे यह सब हजम कर लेते . 1995 का विधान सभा चुनाव करीब आने को था . तब बूथ कब्‍जे का दौर भी था .

लालू ने मशरख में ही प्रभुनाथ सिंह को घेरने की चाल तैयार कर दी . जवाब में अशोक सिंह को लड़ने को तैयार किया . बहुत मुश्किल लड़ाई थी . पर,लालू प्रसाद के साथ एम वाई समीकरण के साथ तब सभी पिछड़ी जातियां भी थी .

11 मार्च 1995 को बिहार विधान सभा का चुनाव मशरख में होना था . अशोक सिंह जनता दल के प्रत्‍याशी बन प्रभुनाथ सिंह के मुकाबले खड़े हो गये थे . प्रभुनाथ बिपीपा से चुनाव लड़ रहे थे . लालू प्रसाद ने प्रभुनाथ सिंह को हराने के लिए जबर्दस्‍त कंपेनिंग की .

परिणाम,प्रभुनाथ सिंह हार गये . आरोप लगा कि एडमिनिस्‍ट्रेशन ने भी खासी भूमिका अदा की . नतीजे में विजयी अशोक सिंह को 50437 और हारे प्रभुनाथ सिंह को 31963 वोट मिले .

प्रभुनाथ के लिए मशरख की हार बर्दाश्‍त के बाहर थी . उनके समर्थक कहने लगे कि लालू प्रसाद की मदद से जीते विधायक अशोक सिंह की जिंदगी बस 90 दिन . खैर,90 दिनों में तो कुछ भी नहीं हुआ . पर 3 जुलाई 1995 को मार ही दिए गए .

अशोक सिंह की हत्‍या को तब लालू प्रसाद ने प्रभुनाथ सिंह का चैलेंज माना . उनके पीछे पटना के बेहद खतरनाक माने जाने वाले एसपी (सिटी) राजविंदर सिंह भट्टी को लगा दिया . भट्टी प्रभुनाथ सिंह से निपटने को अपनी पसंद के अफसर इनकाउंटर स्‍पेशलिस्‍ट माने जाने वाले शशिभूषण शर्मा को पटना लेकर आ गए .

फिर भट्टी ने प्रभुनाथ सिंह का ऐसा पीछा शुरु किया,लगने लगा कि बड़ी मुठभेड़ होने वाली है . प्रभुनाथ के सभी खास पुलिस के ऑपरेशन से तबाह हो गए . भट्टी ने जीना ऐसा हराम किया कि प्रभुनाथ सिंह के लिए पटना आकर कोर्ट में सरेंडर कर देना भी आसान नहीं रह गया था .

बहुत बचते-बचाते प्रभुनाथ ने छपरा में ही शाम को किसी जज के आवास पर जाकर सरेंडर बोला . पटना में भट्टी को जब प्रभुनाथ सिंह के सरेंडर की खबर मिली तो वे छपरा पहुंच गये . जिस थाने में प्रभुनाथ को रखा गया था,वह थाना तो भट्टी की धमक से हिल ही गया .

लेकिन कुछ साल बाद ही बिहार की सियासत का रंग फिर से बदलना शुरु हो गया . आनंद मोहन बिहार की पॉलिटिक्‍स में गौण हो गये थे . नीतीश कुमार उभरे थे . साथ में,भारतीय जनता पार्टी थी .

नीतीश वैसे तमाम नेताओं को अपने साथ जोड़ते चले जा रहे थे,जो लालू प्रसाद के धुर विरोधी थे . तब कोई हिस्‍ट्रीशीट नहीं देखी जाती थी . मकसद सिर्फ लालू प्रसाद को परास्‍त करना था . कहा जाता था कि शेर से लड़ने को शेर ही उतारेंगे,गीदड़ से कोई थोड़े न हारेगा .

प्रभुनाथ सिंह अब नीतीश कुमार की जमात में शामिल हो गये थे . साथ देने को भाजपा की ताकत थी . अब प्रभुनाथ सिंह संसद का चुनाव लड़ने लगे . महाराजगंज से नीतीश कुमार की टिकट पर जीते और लोक सभा पहुंच गये . बाद में हारे भी . स्‍वभाव से प्रभुनाथ सिंह को अक्‍खड़ माना जाता है . सो,बाद में नीतीश कुमार से भी तन गई . विरोध में पटना में किसान रैली की .

उधर,अपने पति अशोक सिंह की हत्‍या का मुकदमा लड़ रही चांदनी सिंह बिलकुल अकेले पड़ चुकी थी . कोई मदद को आगे नहीं आ रहा था . अकेले घरवालों के साथ धमकियों की परवाह किये बिना लड़ रही थी .

प्रभुनाथ जब नीतीश कुमार से झगड़ लिए,तो लालू प्रसाद ने फिर से उनके लिए दरवाजा खोल दिया . पुरानी बातों और अशोक सिंह के मर्डर को भी भूल गए,जोकि हजारीबाग कोर्ट में चल ही रहा था .

महाराजगंज के सांसद उमाशंकर सिंह के निधन से हुए उपचुनाव में नीतीश कुमार के जदयू को हराने के लिए लालू प्रसाद ने महाराजगंज में 2013 में प्रभुनाथ सिंह को राजद का प्रत्‍याशी बना दिया . वे नीतीश कुमार के प्रत्‍याशी और बिहार के शिक्षा मंत्री पी के शाही को हराकर फिर से लोक सभा पहुंच गये .

अब 2014 में लोक सभा का आम चुनाव आया . नीतीश कुमार और लालू प्रसाद अब भी नहीं मिले मिले थे . देश में मोदी लहर थी . बिहार में सभी संसदीय क्षेत्रों में त्रिकोणीय लड़ाई थी . सो,महाराजगंज में भाजपा के जनार्दन सिंह सिग्रीवाल के हाथों राजद के प्रभुनाथ सिंह हार गये . जदयू तीसरे स्‍थान पर रही .

महाराजगंज में मिली हार के बाद भी प्रभुनाथ राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के बहुत करीब जा चुके थे . इनके बेटे को भी लालू प्रसाद ने चुनाव लड़वाया . लेकिन,अब 23 मई 2017 की तारीख आ गई . अशोक सिंह हत्‍या-कांड में दोषी करार दिये गये प्रभुनाथ सिंह को हजारीबाग में कोर्ट ने उम्र कैद की सजा सुना दी . इस तरह थम गया प्रभुनाथ सिंह का पोलिटिकल सफर,जो टाइम टू टाइम सबों के साथ चलता आ रहा था .

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