दरभंगा का पेंच फंस गया है, अब क्‍या करेंगे कीर्ति आजाद?

पटना : दरभंगा के सांसद कीर्ति झा आजाद की मुश्किलें बढ़ती दिखाई दे रही है. परेशानी 2019 के लोक सभा चुनाव को लेकर है. महागठबंधन की सरकार बिहार में खत्‍म होने और भाजपा के साथ नई सरकार बनने के बाद कीर्ति आजाद निश्चित तौर पर इस असमंजस में फंसे हैं कि 2019 में लोक सभा का चुनाव वे किसके सिंबल पर लड़ेंगे.

2009 और 2014 में कीर्ति आजाद दरभंगा में भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़े और जीते. केन्‍द्र में नरेन्‍द्र मोदी की सरकार बनी. सरकार में चुनाव हारने के बाद भी अरुण जेटली वित्‍त मंत्री बनाये गये. फिर कुछ महीने बाद क्रिकेट पॉलिटिक्‍स को लेकर कीर्ति आजाद का पंगा अरुण जेटली से फंस गया. जेटली के खिलाफ आजाद ने भ्रष्‍टाचार के बहुत संगीन आरोप लगाये. पर कोई सुनवाई नहीं हुई.

अमित शाह ने आजाद को सुनने के बदले जेटली के खिलाफ लगाये गये आरोपों को वापस लेने को कहा. लेकिन कीर्ति आजाद नहीं माने. परिणाम,भाजपा ने बाहर का रास्‍ता दिखा दिया. कीर्ति आज भी अरुण जेटली पर लगाये गये आरोपों पर अडिग हैं.

लेकिन बिहार में नई सरकार ने कीर्ति आजाद के लिए दरभंगा में फिर से चुनाव लड़ने के रास्‍ते को बहुत संकरा कर दिया है. विकल्‍प दिख नहीं रहे. भाजपा से टिकट नहीं मिलेगा,तय है. विकल्‍पों पर कीर्ति ने विचार पहले से शुरु कर दिया था. पत्‍नी पूनम झा आजाद पहले आम आदमी पार्टी में गईं और फिर दिल्‍ली में एमसीडी के चुनाव के वक्‍त कांग्रेस में आ गईं.

दरभंगा की सूरत अब ऐसी बनती दिख रही है कि महागठबंधन की ओर से अली अशरफ फातमी पहले से दरभंगा से राजद के टिकट पर चुनाव लड़ते आ रहे हैं. टिकट कटने की कोई सूरत नहीं दिखती. जदयू में संजय कुमार झा हैं. 2014 का चुनाव भी लड़ा था. संजय कुमार झा को भाजपा का भी बेहद करीब माना जाता है. दरभंगा भाजपा की सिटिंग सीट है,पर अब गठबंधन में जदयू साथ है. ऐसे में,दरभंगा में संजय कुमार झा की मजबूत दावेदारी होगी. आखिर में,बड़ा सवाल फिर से खड़ा होता है कि ऐसी सूरत में कीर्ति आजाद की दरभंगा से दावेदारी किधर से बनेगी.