लाइव सिटीज डेस्क : बिहार का नाम आते ही लोगों के मन में एक अच्छी छवी तो एक खराब छवी उभर कर आती है. एक तो IAS और IPS के बारे में और दूसरा बाहुबलियों के बारे में. लेकिन आज हम आपको एक ऐसे जेल के बारे में बताने जा रहे हैं जो बिहार के बक्सर जिले में है और यहां कैदियों को मिले हैं रहने के लिए वन बीएचके फ्लैट. जी हां, आप सही पढ़ रहे हैं.

अक्सर हमारे दिमाग में जेल का ख्याल आते ही ऐसी जगह का दृश्य कौंधता है, जहां कैदियों को भेड़-बकरी की तरह ठूंस-ठूंस कर रखा जाता हो अथवा कैदी के रसूख के हिसाब से उन्हें सुविधाएं दी जाती हों. लेकिन, जेलों की इन्हीं परिकल्पनाओं के बीच ऐतिहासिक-धार्मिक नगरी बक्सर में एक जेल ऐसी है, जहां कैदियों को कभी अहसास नहीं होता कि वे जेल में हैं. जेल में न सिर्फ उन्हें अपने परिजनों के साथ रहने के लिए फ्लैट दिए जाते हैं, बल्कि यहां उन्हें सभी सुविधाएं मिलती हैं, जो एक आम आदमी जेल के बाहर पाता है.

चयनित कैदियों को दी जाती है परिजनों के साथ रहने की छूट

दरअसल, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण पूरे बिहार के जेलों में बंद उन कैदियों का चुनाव मुक्त कारागार में रहने के लिए करता है, जो पेशेवर अपराधी ना हों. साथ ही, किसी संगीन जुर्म में सजा नहीं काट रहे हों. प्राधिकरण द्वारा गठित बोर्ड गहनता से सभी बिंदुओं पर जांच करने के बाद कैदियों का चुनाव करता है. सबसे आखिर में पुलिस अधीक्षक की अनुशंसा के बाद ये कैदी अपने परिवार के चार सदस्यों के साथ मुक्त कारागार में बने फ्लैट में रह सकते हैं.

कैदियों के लिए बनाए गए हैं 102 वन बीएचके फ्लैट

बक्सर मुक्त कारागार में कैदियों के रहने के लिए 102 फ्लैट बनाए गए हैं. हालांकि, वर्तमान में केवल 50 कैदी ही मुक्त कारागार में अपने चार परिजनों के साथ रह रहे हैं. इस दौरान उन्हें अहसास ही नहीं होता कि वे जेल में हैं. बताया जा रहा है कि पिछले 2 वर्षों में बहुत सारे कैदी यहां से अपनी सजा पूरी कर जा चुके हैं. लेकिन, वे जब तक मुक्त
कारागार में रहे, खुशी-खुशी अपना समय व्यतीत किए.

7 दिन में 7 तरह के भोजन की है व्यवस्था

मुक्त कारागार में बंद कैदियों को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता काफी बेहतर है. बंदियों को यहां सप्ताह के 7 दिनों में प्रतिदिन अलग-अलग मेन्यू के हिसाब से भोजन दिया जाता है. वृद्ध कैदियों के लिए जेल प्रशासन प्रतिदिन आधा लीटर दूध की भी व्यवस्था कराता है. हालांकि, कैदियों के साथ रह रहे परिजनों के भोजन की व्यवस्था कैदियों को स्वयं करनी होती है. जिसके लिए वे जेल से बाहर जाकर किसी प्रकार का काम कर सकते हैं. बताया जाता है कि बहुत सारे कैदी नगर के पांच किलोमीटर के दायरे में अपने रोजगार द्वारा परिजनों का भरण पोषण करते हैं.

चिकित्सक कैदी ने जेल में ही खोला था क्लिनिक

जेल में बंद कैदियों को किसी भी प्रकार के रोजगार का चुनाव करने की आजादी है. कुछ दिनों पूर्व जेल में बंद एक कैदी होम्योपैथिक चिकित्सक अस्थाई क्लीनिक खोल कर रोगियों का इलाज किया करते थे. असाध्य रोगियों को भी उन्होंने अपने इलाज से भला-चंगा किया था. उनके यहां इलाज कराने वाले कैदी बक्सर से ही नहीं, बल्कि दूरदराज से भी आया करते थे. बाद में सजा पूरी होने के बाद उक्त कैदी ने नगर में क्लीनिक स्थापित कर रोगियों का इलाज शुरू कर दिया है. कुछ कैदी सब्जियों की खेती भी करते हैं. इसके लिए जेल के बड़े भू-भाग में वह सब्जियां उगाते हैं. सब्जियां उपजाने के एवज में उन्हें जेल प्रशासन को निर्धारित राशि का भुगतान करना होता है. सब्जियों की खेती से आय प्राप्त कर परिवार का भरण पोषण करते हैं.

पुराना रहा है केंद्रीय कारा का इतिहास

बक्सर केंद्रीय कारा पुरानी जेलों में शुमार है. जो स्वतंत्रता संग्राम से लेकर लोहिया के नेतृत्व में कांग्रेस हटाओ देश बचाओ आंदोलन और जेपी आंदोलन जैसे आंदोलनों का मूक गवाह है. वर्ष 2012 में 23 मई को सीएम ने बक्सर केंद्रीय कारा में मुक्त कारागार का उद्घाटन किया था. उस दौरान उन्होंने बताया था कि कैसे जेपी आंदोलन में उन्होंने 15 दिन बक्सर केंद्रीय कारा में बिताए थे.

यहां उन्हीं कैदियों को रखा जाता है. जो अपनी आधी सजा काट चुके हैं. जिनका व्यवहार आम कैदियों से बेहतर और सद्भावनापूर्ण रहता है. जो जेल से निकलने के बाद समाज से जुडऩे की इच्छा रखते हों. ओपन जेल की परिकल्पना का एकमात्र उद्देश्य कैदियों को समाज के मुख्यधारा में लौटाने का है.