नीम-हकिमों के वोट पर राजनीतिक पार्टियो की नज़र, विश्वास जीतने को कर रहे हैं मांगो का समर्थन

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लाइव सिटीज. सेंट्रल डेस्क: बिहार के कई इलाकों में जो अभी भी देहात माने जाते हैं, जहां आज भी किसी के बिमार पड़ने पर डॉक्टर नहीं पहुंच सकते वहां नीत—हकीम ही भगवान के दूसरे रुपो में देखे जाते हैं. लेकिन अब बिहार में इन नीम—हकीमों को लेकर राजनीति शुरू हो चुकी है. पक्ष और विपक्ष दोनों ही पार्टियां चिकित्सक के इस वर्ग को एक अधिकारिक मंजूरी दिलाने की बात कह रहा है. बता दे कि नीम—हकिमों ने सरकार से एक सही मापदंड और उनके अभ्यास के पैमाने पर उनके ज्ञान को मान्यता देने की मांग की है. ऐसे में दोनो ही दलों के लोग समाज में के इस सम्मानित वर्गो के प्रति अपनी सीानूभूति कुछ ज्यादा ही दिख रहे हैं.

मापदंड और गांवों में प्रैक्टिस की अधिकारिक मंजूरी चाहते हैं नीम-हकिम

इस समाज के लोगों के लिए एक मापदंड और उनके प्रैक्टिस को अधिकारिक मंजूरी देने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां अपनी सहानुभूति दिखा रहे हैं. बता दे कि ये समुदाय समाज में सबसे ज्यादा सम्मान पाने वाला वर्ग है, ऐसे में राजनीतिक पार्टियां इनका समर्थन पाना चाहती हैं. इस बात का दावा हिन्दुस्तान टाइम्स के किया गया है. हिन्दुस्तान टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में जनता दल (यूनाइटेड) के महासचिव आरसीपी सिंह के हाल ही में पटना में हुए जदयू चिकित्सक सम्मेलन में दिए बयान का  हवाला दिया है. जिसमे उन्होंने कहा था कि वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से नीम-हकीमों की मानदंड और प्रैक्टिस को औपचारिक मान्यता के मांग को देखने का आग्रह करेंगे.

वही रिपोर्ट में वरिष्ठ भारतीय जनता पार्टी नेता और कृषि मंत्री प्रेम कुमार के बयान को भी लिखा है. जिसमें उन्होंने ग्रामीण इलाको में काम आनेवाले चिकित्सकों को उचित ठहराया है. बता दे कि प्रेम कुमार ने कहा था कि इन चिकित्सको कि संख्या बहुत बड़ी है और वे उन इलाको में चिकित्सा सुविधाओं को देते हैं जहां अभी तक आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं नहीं पहंची हैं. कुमार ने अपने बयान में कहा था कि ये लोग सामाजिक हित में काम करते हैं, ऐसे में सरकार को एक बड़े समाजिक हित को ध्यान में रखते हुए काम करना होगा.

सरकार ने शुरू की है नीम—हकीमो के लिए औपचारिक  प्रशिक्षण कार्यक्रम

जानकारी के लिए बता दे कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान (एनआईओएस) ने पिछले साल राज्य स्वास्थ्य विभाग के सहयोग से मेडिकल प्रैक्टिस की मूलभूत जानकारी इन नीम—हकीमो को देने के लिए औपचारिक रूप एक प्रशिक्षण कार्यक्रम भी शुरू किया है. लेकिन ये वर्ग ग्रामीण इलाकों में अभ्यास करने के लिए एक मानदंड और मंजूरी की मांग कर रहा है. स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव संजय कुमार कि माने तो राज्य सरकार के पास ऐसी कोई योजना फिलहाल नहीं है जो इन नीम—हकिमो के लिए मानदंड देने या ग्रामीण इलाकों में अभ्यास करने की इजाजत देने का काम करता हो.

एनआईओएस के अनुमानों के बिहार में कम से कम 50,000 से ज्यादा नीम—हकीम अपनी सेवाएं गांवों में दे रहे हैं. वही अगर आधिकारिक सरकारी आंकड़ों की माने तो सूबे की सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों के लिए कम से कम आधे से ज्यादा पद रिक्त चल रहे हैं.

राजद ने भी किया है इनके मांगो का समर्थन

वहीं बिहार की मुख्य राजनीतिक विपक्षी पार्टी भी इन नीम—हकिमो की मांग को जायज मानती है. राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने भी इनके मांग का समर्थन किया है. आरजेडी विधायक भाई बिरेंद्र ने कहा है कि सरकार को स्वास्थ्य सुविधाओं के सुधार के लिए इस वर्ग का उपयोग करने और उन्हें अपनी सेवा के लिए भुगतान करने के दायरे लाना चाहिए.”

ऐसे में सरकार और विपक्षी पार्टियां इस वर्ग के समर्थन पाने की इच्छूक दिख रहीं हैं. बता दे कि नीम—ह​किम वे लोग हैं जो दूर दराजों के इलाको में अपनी पूस्तैनी चिकिस्ता जानकारियों से लोगो को प्राथमिक उपचार देते हैं. ये वर्ग पूरे भारत में ऐसे इलाको में अपनी सेवाएं देता है जहां आज भी मेंडिकल सुविधाएं ना मात्र हैं.

नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2017 की रिपोर्ट पर गौर करे तो भारत में हर 10,189 लोगों के लिए एक सरकारी एलोपैथिक डॉक्टर है, हर 2,046 लोगों के लिए एक सरकारी अस्पताल,बिस्तर और हर 90,343 लोगों के लिए एक सरकारी अस्पताल है. ऐसे में ये नीम—हकिम बिहार ही नहीं देशभर के दूर—दराज के इलाको में आम लोगो के लिए जिनके पास चिकित्सा सुविधाएं नहीं पहुंच सकती, उनके लिए पहली आशा की किरण होते हैं.

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