गया में पिंडदान से 7 पीढ़ियों को मिलता है मोक्ष, जानें और क्या है महत्व, 10 बिंदुओं में जानिए

लाइव सिटिज डेस्क : पूर्वजों को याद करने के साथ उन्हें श्रद्धा के साथ पिंडदान करने की परंपरा पौराणिक और प्राचीन होने के साथ अपने पितरों के प्रति आगाध आस्था और श्रद्धा का एक ऐसा संगम है, जिसे हर कोई अपने जीवन में देना चाहता है. पितरों के लिए खास आश्विन माह के कृष्ण पक्ष या पितृपक्ष में मोक्षधाम गयाजी आकर पिंडदान एवं तर्पण करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और माता-पिता समेत सात पीढ़ियों का उद्धार होता है.

पवित्र फल्गु नदी के तट पर बसे प्राचीन गया शहर की देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी पितृपक्ष और पिंडदान को लेकर अलग पहचान है. आगामी 24 सितंबर से पितृपक्ष शुरू होने वाला है. इस अवसर पर बिहार के गया में पितृपक्ष मेले का आयोजन किया जाता है. हिन्दू धर्म में अपने पूर्वजों की आत्मा की संतुष्टि के लिए उनके श्राद्ध करने की परंपरा है. पितृपक्ष के दौरान 15 दिनों तक देश-विदेश से गया आने वाले श्रद्धालु अपने पितरों को पिंडदान करते हैं. माना जाता है कि हिन्दू धर्मावलंबियों को माता-पिता के साथ-साथ अपने दादा-नाना और दादी-नानी से ऊपर के पूर्वजों का भी श्राद्ध करना चाहिए.

हिन्दु शास्त्रों में गया का अत्यधिक महत्व है. क्योंकि पुराणों के अनुसार गया पुण्यभूमि है और यहां पर श्राद्ध करने से वंशजों का उद्धार हो जाता है. गया में पिंडदान का बड़ा महत्व है, जिसका वर्णन विभिन्न धर्मग्रंथों में किया गया है. आइए जानते हैं धर्मग्रंथों के अनुसार गया में श्राद्ध का क्या है महत्व.

1. धर्मशास्त्रों में गया में पिंडदान के महत्व के बारे में बताया गया है. साथ ही कई अन्य ग्रंथों में भी इसका जिक्र है. धर्मशास्त्रकार वृहस्पतिकृत वृहस्पतिस्मृति, वामनपुरान, कूर्मपुराण, वायुपुराण, गरुड़पुराण, व्यासस्मृति, भविष्योत्तरपुराण, मत्स्य पुराण, विष्णुस्मृति जैसे अनेक ग्रंथों में गया का महात्म्य वर्णित है. पुत्र अपने माता-पिता पितामह आदि पितरों का श्राद्ध करने के बाद अपनी पुत्रता की अन्वर्थता के लिए गया श्राद्ध (पिण्डदान) करना आवश्यक समझता है. यदि कोई पुत्र अपने पितरों को गया में पिण्डदान नहीं करता है तो उसका जीवन अपूर्ण रहता है. शास्त्रों में पुत्र को अपनी पुत्रता साबित करने के लिए…

जीवितो (जीविते) वाक्यकरणात् क्षयाहे भूरिभोजनात्।
गयायां पिण्डदानञ्च त्रिभिः पुत्रस्य पुत्रता।।

अर्थात् माता-पिता के जीवित रहते हुए उनका सम्मान करना चाहिए. मृत्यु के बाद उनके निमित्त ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए. पुत्र का तीसरा कर्तव्य है कि माता-पिता की मृत्यु
के पश्चात गया जाकर वहां पिंडदान करे.

2. जन्म लेते ही मनुष्य पितृऋण के भार से युक्त हो जाता है. इससे मुक्त होने के लिए गया श्राद्ध अनिवार्य है. कहा भी गया है- ‘गयायां पिण्डदानेन पितृणामनृणो भवेत्’. शास्त्रों के अनुसार गया में पिण्डदान से पितृ़ऋण से मुक्ति मिलती है. धर्मग्रंथों में कहा गया है कि अगर पुत्र ने माता-पिता या पितरों का श्राद्ध नहीं किया तो उसे मुक्ति नहीं मिल सकती है.

3. गया में पिंडदान की महत्ता को लेकर कई धर्मग्रंथों में कर्तव्यों की व्याख्या की गई है. कूर्मपुराण में कहा गया है-

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन ब्राह्मणस्तु विशेषतः
प्रदद्याद्विधिवत्पिण्डान् गयां गत्वा समाहितः।

अर्थात् मनुष्यों के लिए पितरों के निमित्त पिंडदान करना आवश्यक है. मनुष्य को किसी भी तरह का प्रयत्न कर अपने पितरों के लिए पिंडदान करना चाहिए. खासकर ब्राह्मणों के लिए तो इसे अत्यंत आवश्यक बताया गया है कि वे गया जाएं और वहां श्राद्ध कर पितरों की आत्मा को संतुष्ट करें.

4. पितर कामना करते हैं कि कुल में यदि कोई भी गया जाएगा तो वह हम सबों को उद्धार कर देगा. धर्म पृष्ठ पर ब्राह्मणों के समक्ष गया स्थित अक्षयवट पर पितरों के लिए किया गया श्राद्ध अक्ष्य होता है. धेनुकारण्य में पितरों का श्राद्ध करने वाला बीस पीढ़ी तक ऊपर नीचे वाले वंशजों का उद्धार कर देता है-

काङ्क्षन्ति पितरः पुत्रान्नकादभयभीरवः।
गयां यास्यति यः कष्चित्सोऽस्मान् तारयिस्यति।

गया तीर्थ की विशेषता बताते हुए त्रिस्थली सेतु के गया प्रकरण में भी पुत्र द्वारा माता-पिता और अन्य पितरों के गया में श्राद्ध करने के महत्व के बारे में बताया गया है.

गंगायां धर्मपृष्ठे च सदसि ब्रह्मणस्तथा।
गयाशीर्षक्षयवटे पितृणादंत्तमक्षयम्।
ब्रह्मारण्यं धेनुपृष्ठं धेनुकारण्यमेव च।
दृष्टवैतानि पितृंष्चाच्र्यं वंश्यान्विं शतिमुद्धरेत।।

5. संपूर्ण भारतवर्ष में गया, कुरुक्षेत्र और पुष्कर में पिण्डदान की महत्ता बताई गई है, जिनमें गया अनेक दृष्टियों से पृथक महत्व रखता है. बिहार की राजधानी पटना से लगभग 90 किलोमीटर दक्षिण में अवस्थित गया बिहार का एक विशेष पुण्य स्थान है, जिसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण, महाभारत, आनन्दरामायण, त्रिस्थली सेतु इत्यादि पौराणिक तथा निबन्धग्रन्थों में हैं. वायुपुराण के अनुसार गया गय, गयादित्य, गायत्री, गदाधर, गाय और गयासुर ये छः मोक्ष प्रदान करने वाले हैं.

गयापत्तलक ग्रंथ में इस बारे में स्पष्ट रूप से श्राद्ध और पिंडदान के महत्व के बारे में बताया गया है-
स्नानं कृत्वा गयालोले दृष्ट्वा च प्रपितामहम्।
अक्षयांल्लभते लोकान् कुलानां तारयेच्छतम्।।
गयां गतो गयालोलो गायत्री च गदाधरः।
गया गयाशिरष्चैव षड्गया मुक्तिदाः स्मृताः।।

6. धर्मसिन्धु नामक ग्रंथ में भी गया श्राद्ध का विशेष तौर पर उल्लेख किया गया है. इसमें कहा गया है कि गया में प्रसंगवश जाकर पुत्र माता के निमित्त श्राद्ध करे और जिसका पिता जीवित हो, वह श्राद्ध के निमित्त गया न जाए. इस ग्रंथ के तीसरे परिच्छेद के अनुसार-

गयां प्रसंगतोगत्वा, मातुः श्राद्धं सुतष्चरेत्।
जीवत्पिता मातुः श्राद्धमुद्दिष्यगयांनगच्छेत्।।

अर्थात् पुत्र को अपनी मां का श्राद्ध भी गया में ही करना चाहिए. अगर किसी का पिता जीवित है, तब उसे गया नहीं जाना चाहिए. यानी पिता की मृत्य़ु के पश्चात गया जाकर माता और पिता, दोनों का श्राद्ध करना चाहिए.

7. तीर्थ चिन्तामणि के अनुसार श्राद्ध के उद्देश्य से गया पहुंचे हुए महापातकी की सद्गति होती है. यानी बहुत बड़ा पापी मनुष्य भी अगर गया जाकर अपने पितरों का श्राद्ध करता है तो उसे मृत्यु के पश्चात स्वर्ग की प्राप्ति होती है. गरुड़पुराण में ब्रह्मा का वचन है कि गया में पिण्डदान से जो फल मिलता है, करोड़ों वर्षों में उसका आख्यान नहीं हो सकता. वायुपुराण के अनुसार महाकल्पों में किया गया पाप भी गया श्राद्ध से दूर हो जाता है. कृत्यसारसमुच्चय नामक ग्रंथ में कहा गया है-

महाकल्पकृतं पापं गयायां चविनष्यति।।

8. डॉ. संतोष मिश्र के शोध-ग्रंथ के अनुसार, महाभारत में पुलस्त्य ऋषि की यात्रा के सन्दर्भ में भी गया श्राद्ध की महत्ता बताई गई है. गया श्राद्ध की इसी विशेषता के कारण पिण्डदान सभी समय में करने के लिए अनुमोदित है. यानी कोई भी श्रद्धालु गया जाकर किसी भी समय में अपने पितरों के निमित्त पिंडदान कर सकता है. कृत्यसारसमुच्चय में कहा भी गया है-

गयायां सर्वकालेषु पिण्डं दद्याद्विचक्षणः।।
अधिमासे जन्मदिने अस्ते च गुरु शुक्रयोः।
न त्यजेच्च गया श्राद्धं सिंहस्थे च वृहस्पतौ।।

9. संस्कृत भाषा के प्रख्यात निबन्धकार कमलाकरभट्ट ने भी गया में किए जाने वाले श्राद्ध को, अन्य जगहों पर किए जाने वाले श्राद्ध के मुकाबले श्रेयस्कर माना है. उन्होंने गयाश्राद्ध के महत्व के विषय में व्यासस्मृति, आदित्यपुराण और शूलपाणि में वृहस्पति का वचन उद्धृत किया है-

गंगाद्वारे प्रयागे च नैमिषे पुष्करे तथा सन्निहत्यां गयायां च दत्तमक्ष यतां व्रजेत्।
अपि जायेत सोऽस्माकं कुले कष्चिन्नरोत्तमः. गयाशीर्षे वटेश्राद्धं यो नोदद्यात्समाहितः।।
एष्टव्या बहवः पुत्राः यद्येकोऽपिगयां व्रजेत्. यजेत वाष्वमेघेन नील वा वृषमुत्सृजेत्।।
– निर्णय सिन्धु

10. पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड में गया तीर्थ को अन्य तीर्थस्थलों की तुलना में श्रेष्ठ बताया गया है. कहा गया है कि कीकटों में गया पुण्य है, राजगृह का वन पुण्यमय है, च्यवनमुनि का आश्रम पुण्यमय है, पुनपुन नदी पुण्य है. इस तरह गया में पिण्डदान श्राद्ध करना बहुत ही प्रशस्त माना गया है.

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