राज्य सभा चुनाव : क्या यह पिछड़ावादी राजनीति का सवर्णों के सामने समर्पण है?

लाइव सिटीज डेस्क (रुद्रप्रताप सिंह) : बिहार से राज्यसभा में पहली बार सवर्ण बिरादरी के छह सदस्य जा रहे हैं. इनका निर्वाचन निर्विरोध हो रहा है. पिछड़ों की राजनीति करनेवाले थोड़ा निराश हैं. सवर्ण बिरादरी खुश है. इस खुशी में भी थोड़ा विषाद है- आखिर एक बिरादरी के दो सदस्य कैसे चले गए? काश! दो सदस्य हमारी बिरादरी के होते. गौर करें तो यह न सवर्ण बिरादरी की जीत है. पिछड़ावादी या मंडलवादी राजनीति का सवर्णों के समक्ष आत्मसमर्पण भी नहीं है. यह नये राजनीतिक समीकरण का संकेत है. दुआ कीजिए कि इस समीकरण का विस्तार हो.

मंडल के पहले से है जातिवाद

मंडल के दौर से पहले भी बिहार की राजनीति जातिवाद को लेकर बदनाम थी. सच यह है कि जाति के नाम पर एक से एक नमूनों और आईपीसी की हरेक धारा से सुशोभितों को माननीय बनाने का सिलसिला मंडल से पहले शुरू हो चुका था. नाम लेने की जरूरत नहीं है. अपवाद को छोड़ दें तो इस श्रेणी के ज्यादा माननीय सवर्ण ही थे. बाद में पिछड़ों के बीच आई जागृति का लाभ दूसरे पक्ष के इसी तरह के लोगों को मिला. नाम दिया गया कि जाति के नाम पर राजनीति का अपराधीकरण हो गया है. बेशक यह हुआ. मगर, अधिक नहीं, यह तो पहले से चली आ रही परिपाटी का विस्तार था. राजनीतिक दलों ने इसमें सुधार नहीं किया. पानी सिर के उपर से गुजरा तो समाज ने ही इसे सुधारा. आज की तारीख में कितने बाहुबली सदन की शोभा बढ़ा रहे हैं?

हर चुनाव में एक नया वाद

चुनाव में वोट के लिए एक अदद वाद की जरूरत होती है. कोई वाद स्थायी नहीं होता है. करीब 15 साल तक राज्य में मंडल की राजनीति का दौर चला. सामाजिक चेतना के लिहाज से देखें तो यह बेहद जरूरी था. इसने वंचितों को वोट की ताकत का अहसास कराया. यह बाद कुछ पुराना हुआ तो नीतीश कुमार सत्ता में आए. उनका प्रभाव मंडल और कमंडल के संश्रय पर हुआ. उसी समय जाति आधारित राजनीति की पुरानी जंजीरों में से कुछ महत्वपूर्ण कड़ियां अलग हुईं. नीतीश ने अपने पहले और दूसरे शासन के दौर में किसी खास बिरादरी के साथ दुराव नहीं किया. उनके मौजूदा शासन में कुछ बिरादरी खुद को अलग-थलग महसूस कर रही हैं.

इसी तरह बनते हैं नए समीकरण

इन्हीं स्थितियों में नए समीकरण का निर्माण हो रहा है. छह सवर्णों का एकसाथ राज्यसभा में जाना इसी का परिणाम है. देखिए कि इसमें बड़ी पहल राजद की ओर से की गई, जिसे कुछ दिन पहले तक माय समीकरण में बांध कर रख दिया गया था. अवधारणाएं जड़ नहीं होती हैं. इसमें बदलाव आता रहता है. लालू प्रसाद से वैमनस्य का भाव रखनेवाले लोगों के दिल में भी तेजस्वी के लिए नरम कोण है. कह सकते हैं कि तेजस्वी ने यह संदेश दिया है कि वे अपने पिता की अगली पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं. समय के साथ बदलाव के पक्षधर हैं. एक हिसाब लगाइए. वे बच्चे, जिनका जन्म लालू-राबड़ी शासन के दस साल के अंदर हुआ, वे सबके सब युवा मतदाता हैं. उन्होंने लालू-राबड़ी शासन को महसूस कम किया है. सुना अधिक है. यह पीढ़ी नीतीश कुमार के शासन में जवान हुई है. यानी उनके शासन को महसूस किया है.

कम होगी दूरी

हुआ कुछ खास नहीं है. राज्यसभा के सदस्य सरकार बनाने-बिगाड़ने के खेल में शामिल नहीं होते हैं. लेकिन, इस परिघटना से अगड़े-पिछड़े की दूरी कुछ कम हुई है. एक अलग तरह का माहौल बन रहा है, जिसमें दुराव नहीं, अपनापन दिखता है. मुमकिन है कि आनेवाले दिनों में यह तनाव की राजनीति को कम करे. जाति के आधार पर वोटों के विभाजन की मौजूदा प्रवृति को कम करे. यह अच्छा होगा. तब सिर्फ जाति की राजनीति के सहारे माननीय बनने वालों की तादाद कम होगी. अभी तो सभी जातियों ने खुद को इस या उस दल के खूंटे में बांध रखा है. कैंडिडेट भला हो या चोर उचक्का पार्टी के नाम पर अमुक-अमुक जातियों का वोट मिल ही जाता है.

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