झारखंड में रघुवर दास की नींद हराम करेंगे नीतीश कुमार, भेजा ललन सिंह को

लाइव सिटीज डेस्क : भाजपा ने ऐलान किया है कि वह बिहार में कुर्मी सम्मेलन करेगी. इसी से तिलमिलाए जदयू झारखंड में अपने पुराने आधार की खोज में जुट गया है. राजनीतिक गलियारों में हो रही चर्चा की मानें तो नीतीश कुमार झारखंड में रघुवर दास की नींद हराम करेंगे. यही वजह है कि जदयू अपने आधार वोटों को मजबूत करने में जुट गया है.

इसकी जिम्मेवारी जल संसाधन मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह को दी गई है. वे सीएम नीतीश कुमार के भरोसेमंद तो हैं ही, अच्छे संगठनकर्ता भी माने जाते हैं. ललन सिंह मुहिम में जुट भी गए हैं. इस समय झारखंड के दौरे पर हैं. वहां तीन दिन रहेंगे. शुरुआत पलामू से हो रही है. उन्होंने दावा किया कि झारखंड में जदयू की स्थिति मजबूत होगी. इसे संयोग ही कहें कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी अभी झारखंड में ही हैं.

– शराबबंदी रहेगा मुद्दा
बिहार की तरह झारखंड की बड़ी आबादी शराबखोरी से तबाह रही है. राज्य में शराबबंदी के बाद सीएम नीतीश कुमार ने झारखंड में करीब छह छोटी-बड़ी सभाएं कीं. सबमें उन्होंने शराबबंदी पर जोर दिया. औदयोगिक क्षेत्रों की महिलाएं उनकी सभाओं में जुटती थी. नीतीश की शराबबंदी की मांग पर तालियां बजाती थीं. रिस्पांस से उत्साहित नीतीश ने रघुवर दास को पत्र लिख कर आग्रह किया कि वह अपने राज्य में शराब की बिक्री पर पूरी तरह पाबंदी लगा दें. नीतीश को इस बात पर भी एतराज था कि बिहार की सीमा से सटे झारखंड के इलाके में अचानक बड़ी संख्या में शराब की दुकानें खुलने लगी हैं.

– नीतीश की हो चुकी है नैतिक जीत
हालांकि झारखंड में शराब की बिक्री पर पूरी तरह पाबंदी नहीं लगी है. फिर भी इसके कारोबार पर नियंत्रण हो रहा है. देसी पर पाबंदी लगा दी गई है. जबकि, अंग्रेजी शराब की दुकानों की संख्या काफी कम कर दी गई हैं. पहली बार सावन-भादो में देवघर में शराब की बिक्री पर पूरी तरह रोक लगा दी गई थी. माना जा रहा है कि नीतीश की सभाओं में जुटने वाली महिलाओं की भीड़ को रघुवर दास ने गंभीरता से लिया. धनबाद और पलामू जैसे इलाके में महिलाएं सक्रिय हुईं और उन्होंने संगठित रूप से शराब की दुकानों और भटिठयों पर हमला किया. यही नहीं, रघुवर कैबिनेट के सीनियर मंत्री सरयू राय भी शराबबंदी के पक्ष में खुल कर उतर आए.

– कभी जदयू की हालत थी अच्छी
झारखंड में जदयू की हालत कभी अच्छी थी. विभाजन के बाद बाबूलाल मरांडी की अगुआई में बनी पहली सरकार को जदयू के आठ विधायकों का समर्थन था. जदयू उस सरकार में शामिल भी थी. हालांकि भाजपा की उस पहली सरकार का गठन बिहार विधानसभा के 2000 के चुनाव के आधार पर हुआ था. लेकिन उसके बाद के चुनावों में भी जदयू के सदस्य सदन में रहते ही थे. 2005 में छह और 2009 में जदयू के दो विधायक झारखंड विधानसभा में थे. 2014 के विस चुनाव में वहां जदयू का खाता नहीं खुल पाया था.

– शौक नहीं, मजबूरी है
एनडीए में फिर से शामिल होने के बाद झारखंड में अपनी पहचान कायम रखना जदयू के लिए शौक नहीं, मजबूरी भी है. आसार बता रहे हैं कि दो साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में राजद, कांग्रेस और झामुमो एकसाथ चुनाव लड़ेंगे. संभव है कि उसमें झारखंड विकास मोर्चा भी शामिल हो जाए. एनडीए में शामिल होने से पहले नीतीश कुमार उसी मोर्चे के स्वाभाविक पार्टनर माने जा रहे थे. बदली हालत में उन्हें जीतने लायक सीट पाने के लिए भाजपा की इच्छा पर निर्भर रहना होगा. लिहाजा, चुनिन्दा सीटों पर अपना दावा मजबूत करने के इरादे से झारखंड में जदयू की सक्रियता बढ़ाई जा रही है.

बता दें कि कल ही भाजपा के राजीव रंजन ने पटना में कुर्मी सम्मेलन की घोषणा की है. उन्होंने यहां तक कह दिया कि बिहार के 95 से 96 परसेंट कुर्मी, कोइरी व धानुक भाजपा को वोट देना चाहते हैं, जिस पर जदयू प्रवक्ता संजय सिंह का तीखा बयान आया था और उन्होंने कहा था कि राजीव रंजन को पहली बार हल्दी लगी है. सूत्रों की मानें तो झारखंड में जदयू की यह चाल कहीं न कहीं कुर्मी सम्मेलन से भी जुड़ा है. बहरहाल मामला जो भी हो लेकिन बिहार से झारखंड तक की सियासत गरम हो गयी है.

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