गुजरात : सहयोगी दलों को औकात में रखते हैं अमित शाह, जदयू क्या है…

अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष (फाइल फोटो)

                                                                       – रुद्रप्रताप सिंह –
गुजरात विधानसभा चुनाव में जदयू की भागीदारी को लेकर एनडीए के दो घटक दलों के कुछ नेता जुबानी जंग पर उतर आए हैं. कुछ लोग इसे भाजपा-जदयू के बीच दरार के रूप में देख रहे हैं. उनका आकलन है कि यह तकरार की शुरुआत ही है. ऐसी ही तकरार यूपी इलेक्शन के समय हुई थी. तत्कालीन सहयोगी राजद ने जदयू के यूपी चुनाव लड़ने का विरोध किया था.

हालांकि बाद में जब जदयू ने यूपी चुनाव से खुद को अलग किया था, यह कहने वाले भी कम नहीं थे कि यह फैसला सपा की नहीं, भाजपा की मदद के लिए किया गया है. जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस तरह के आरोप पर कोई टिप्पणी नहीं की. कुछ भी हो, यूपी प्रकरण से राजद और जदयू का रिश्ता जरूर असामान्य हुआ.

जाएंगे तो मदद के लिए
चुनाव लड़ने की घोषणा को भाजपा-जदयू के बीच दरार मानने वालों को आनेवाले दिनों में निराशा हाथ लगेगी. अव्वल तो नीतीश कुमार गुजरात विधानसभा चुनाव में जाने की कोशिश नहीं करेंगे. अगर उनकी पार्टी वहां चुनाव लड़ती है तो यह भाजपा को फायदा पहुंचाने की गरज से ही होगा. वे उन क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार खड़े कर सकते हैं, जिन पर लड़ने की तैयारी शरद यादव के गुट ने पहले से कर रखी है. ये क्षेत्र आदिवासी बहुल होंगे. जदयू के नाम पर एक क्षेत्र में दो-दो उम्मीदवार होंगे, तो भाजपा की राह आसान हो जाएगी. तो मानकर चलिए कि नीतीश कुमार के जदयू की उम्मीदवारी भाजपा की सहमति से तय होगी. अगर वे चुनाव लड़ने जा रहे हैं तो साफ है कि भाजपा से इजाजत मिल गई है.

भाजपा का यह रिकॉर्ड रहा है
अब तक का रिकॉर्ड बताता है कि राज्यों के चुनावों में भाजपा अपने सहयोगी दलों को औकात में रखती है. यूपी इलेक्शन को याद कीजिए. रालोसपा ने खूब तैयारी की थी. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा लगातार दौरे पर रहे. जोश इतना कि उम्मीदवारों की एक लिस्ट भी जारी कर दी गई. इधर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने आंखें तरेरी तो उम्मीदवारों को कह दिया गया कि वे घर बैठ जाएं. उम्मीदवारों ने आदेश का पालन किया. कुशवाहा का हश्र देखकर लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान ने चुनाव के दौरान यूपी का नाम लेना तक छोड़ दिया. उन्हें इसी तरह के आदेश का पालन दिल्ली नगर निगम के चुनाव के दिनों में करना पड़ा. उस चुनाव में लोजपा ने पहले उम्मीदवारों की सूची जारी की. अमित शाह के आदेश पर उसे वापस ले लिया. यूपी विधानसभा की तरह दिल्ली नगर निगम में भी भाजपा की जीत हुई.

भला नीतीश कैसे करेंगे हिम्मत
इस हालत में भला नीतीश कुमार क्या खाकर गुजरात में ऐसा कुछ करने के बारे में सोचेंगे, जिससे भाजपा को घाटा हो. वह भी इस हालत में जबकि भाजपा पर उनकी निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है. इधर सबसे बड़े दल राजद के सुप्रीमो लालू प्रसाद कसम खाकर बैठ गए हैं कि अगले सात जनम तक वे नीतीश से दोस्ती नहीं करेंगे. भाजपा भी समय-समय पर नीतीश कुमार को सीमाओं का अहसास करा ही रही है. केंद्रीय कैबिनेट में जदयू को जगह न मिलने का मामला भले ही पुराना पड़ गया हो, लेकिन पीयू को सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा देने की मांग को पीएम नरेंद्र मोदी की ओर से नोटिस न लेना इतना पुराना नहीं हुआ है, जिसे लोग भूल जाएं.

(लेखक रुद्रप्रताप सिंह पोलिटिकल एनालिस्ट हैं. डिस्‍क्‍लेमर : इस आलेख में व्‍यक्‍त किये गये विचार और तथ्‍य लेखक के हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्‍यावहारिकता अथवा सच्‍चाई के प्रति LiveCities उत्‍तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्‍यों की त्‍यों प्रस्‍तुत की गई है. कोई भी सूचना अथवा व्‍यक्‍त किये गये विचार LiveCities के नहीं हैं तथा LiveCities उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्‍तरदायी नहीं है.)

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