‘चढ़ जा बेटा सूली पर भला करेंगे राम’ से दूर भागे कांग्रेस के विधायक

लाइव सिटीज डेस्क (रुदप्रताप सिंह) : नोटबंदी और जीएसटी के चलते आई मंदी का प्रभाव बिहार कांग्रेस पर साफ नजर आ रहा है. अच्छी बात यह है कि असर सकारात्मक है. कुछ दिन पहले तक जदयू में जाने को लेकर बेचैन रहने वाले विधायकों के कदम ठहर गए हैं. दल बदल समर्थक विधायकों की जो संख्या पहले एक दर्जन से अधिक बताई जा रही थी, आठ-दस पर आकर ठहर गई है. उम्मीद की जा रही है कि यह संख्या और घटेगी. अंततः चार-पांच पर आकर थम जाएगी. क्योंकि, कांग्रेस के चार विधायक ऐसे हैं, जो पहले जदयू में थे. महागठबंधन में जब सीटों का बंटवारा हो रहा था तो उसे चार सीटें उम्मीदवारों के साथ दी गई थीं. इन चारों का कमिटमेंट अब भी कांग्रेस से अधिक जदयू के प्रति है.

कैसे पड़ रहा मंदी का असर
हाल के दिनों में देशव्यापी मंदी के चलते मचे हाहाकार ने भाजपा को बचाव की मुद्रा में खड़ा कर दिया है. उधर इसी सवाल पर कांग्रेस पूरी तरह आक्रामक रूख अख्तियार कर चुकी है. ‘विकास पागल हो गया है’ वाला कांग्रेसी नारा गुजरात के बाहर भी लोकप्रिय हो गया है. केंद्र सरकार की लगातार गिर रही साख से कांग्रेस उत्साहित है. आकलन यह है कि इसी रफ्तार से आम जनता की नाराजगी बढ़ी, तो आनेवाले चुनावों में कांग्रेस फायदे में रहेगी. सोशल मीडिया पर केंद्र सरकार की आलोचना उसी तरह हो रही है, जिस तरह भाजपा के उदय के समय पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हो रही थी. खासकर युवाओं और छात्रों के असंतोष ने कांग्रेस को उम्मीदों से भर दिया है.

जदयू पर भी पड़ेगा असर
कंग्रेस छोड़ कर जदयू में जाने की इच्छा रखने वाले विधायकों का मन इस आकलन से भी डोल रहा है कि राज्य में जब कभी चुनाव हुए तो केंद्र सरकार के खिलाफ काम करने वाला एंटी इंकवेंसी फैक्टर पार्टनर होने के नाते नीतीश कुमार और उनके दल जदयू की संभावनाओं पर भी प्रभाव डालेगा. इसलिए कि जदयू तब एनडीए के घटक के तौर पर चुनाव लड़ेगा. उस समय नीतीश कुमार अपने अच्छे काम के नाम पर वोट नहीं मांग पाएंगे. ऐसी हालत में दल बदल कर जदयू में जाने वाले कांग्रेसी विधायकों की जीत की संभावना कम हो जाएगी. यह आकलन इन विधायकों को डरा रहा है. एक बात और डराने वाली है. जदयू की ओर से यह गारंटी भी नहीं की जा रही है कि पाला बदल करने वाले सभी विधायकों को अगले चुनाव में टिकट मिलेगा ही. क्योंकि कांग्रेंस के 27 में से 19 विधायक ऐसे हैं, जिन्होंने भाजपा उम्मीदवार को परास्त कर कामयाबी हासिल की थी. भाजपा इन विधायकों को जदयू का टिकट हथियाने देगी, यह लगभग असंभव है. वैसे, नीतीश कुमार का ट्रैक रिकॉर्ड भी कांग्रेसी विधायकों को डरा रहा है. वह टिकट वितरण के समय अपनी मजबूरी बताकर इन विधायकों को पैदल कर सकते हैं. ऐसा पहले भी हो चुका है.

विधान पार्षद हैं तैयार
कांग्रेस के निवर्तमान प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी को विधान परिषद सदस्यों को अपने पक्ष में कर लेने में कामयाबी जरूर मिल गई है. छह में से चार सदस्य उनके साथ हैं. इनके दम पर ये विधान परिषद में दल बदल करवा सकते हैं. लेकिन, जदयू की दिलचस्पी इनमें नहीं है. चार में से एक राज्यपाल कोटा के हैं. दो विधानसभा से निर्वाचित हैं. एक सीधे चुनाव जीतकर आए हैं. विधायकों की संख्या कम हो जाने के कारण जदयू के लिए अपने लोगों को विधान परिषद में भेजने में ही कठिनाई हो रही है. ऐसे में बाहर से आए चार विधान पार्षदों को एडजस्ट करना भी मुश्किल ही होगा. हालांकि, चौधरी के मामले में नीतीश कुमार का रूख सकारात्मक है. अगर वह अकेले भी आते हैं तो उनका समायोजन हो जाएगा. लेकिन, सभी चार विधान पार्षदों को अगले टर्म की गारंटी करना नीतीश के लिए भी नामुमकिन है.

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