‘जोर की लगी है? गूगल में जगह देख ‘हल्का’ होईए…’

लाइव सिटीज डेस्क : बिहार के सीनियर जर्नलिस्ट हैं मधुरेश. पटना के दैनिक भास्कर में ब्यूरो चीफ हैं. गूगल पर टॉयलेट ढूंढ़ने को लेकर बुधवार को उन्होंने पटना नगर निगम के बारे में बहुत कुछ लिखा है. ‘हल्का’ होने को लेकर नगर निगम की डिजिटल व्यवस्था पर उन्होंने जोरदार तंज कसा है. नगर निगम के अफसरों को तो धो डाला है. आगे आप पढ़िए मधुरेश के अक्षरश: आलेख को –

‘बाप रे बाप! ई अफसर लोग ऐतना दिमाग कहां से लाता है रे भाई? मामूली मच्छर तक को नहीं मार पाने वाला पटना नगर निगम फारिग (हल्का) होने यानी शौच या पेशाब करने की डिजिटल व्यवस्था कर रहा है. इसकी कुछ प्रक्रिया, कुछ स्टेप्स ऑनलाइन से हैं. एक खबर के अनुसार राजधानी पटना में 3 दिन में निगम की यह व्यवस्था काम करने लगेगी. लेकिन जो व्यवस्था है, उसमें आदमी को ठीक से फारिग होने के लिए कुछ जरूरी शर्तें हैं. मसलन, उस आदमी के पास स्मार्ट फोन होना चाहिए. कायदे वाला नेट पैक तो रहे ही. जाहिर है 4 जी ही चलेगा.



फारिग होने के स्टेप्स जानिए. आपको जोर की लगी है. मोबाइल में नेट ऑन कीजिए. गूगल में जाकर फारिग होने की जगह (शौचालय) तलाशिए. अपने समय की प्राथमिकता से सबसे पास वाले में जाइए. इसमें ऑप्शन भी है- सामुदायिक शौचालय, सार्वजनिक शौचालय और डीलक्स शौचालय. अब नेट काम नहीं करे तो…? अफसर लोग, शायद अगले चरण में इस महान संकट का निवारण करें. ऐसा इंतजाम हो सकता है कि इस विकट परिस्थिति से उबारने के लिए आपके पास फौरन मोबाइल शौचालय पहुंच जाए. वैसे ही जैसे एम्बुलेंस पहुंचता है.

जब ऐसा होगा, तब होगा. फिलहाल अभी हो रहे इंतजाम को देखिए. पटना में नगर निगम के 7 दर्जन शौचालय हैं. इन सभी का जिओ टैगिंग, गूगल मैप पर किया जा रहा है. फोटो, बाकी सूचनाएं सहित. सभी लिंक्ड रहेंगे. एक क्लिक पर सारी सूचनाएं. क्या कहा- अब बर्दाश्त से बाहर है? अरे, नहीं भाई थोड़ा और जानिए. शौचालयों में यूजर मार्किंग सिस्टम लगा होगा. यूजर, शौचालय का यूज करने के बाद मार्किंग का बटन दबा देंगे. यूजर के फीडबैक पर शौचालय के ठेकेदार की मार्किंग होगी.

ऐसा नहीं है कि यह सब नहीं हो सकता है. किंतु, बात पटना नगर निगम और उस पर भरोसे की है. मच्छर को छोड़िए, वह तो बहुतों का बाप साबित है; कूड़ा-कचरा को ही लीजिए, तो पिछले 7-8 साल में निगम के अफसरों को भी याद नहीं होगा कि उन्होंने कूड़ा-कचरा हटाने, इसको साफ करने के लिए कितने उपायों का ऐलान किया? बात ये भी हो गई कि व्हाट्स एप पर कूड़ा का फोटो भेजिए, 24 घंटे में साफ होगा. पता नहीं कितने तरह के एप बने. डोर टू डोर. सूखा कचरा, गीला कचरा. सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट…, कान पक गये. बाकी मसलों की चर्चा निगम का और छीछालेदर ही करेगी.

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ऐसे में फारिग होने की यह नेटपरक व्यवस्था? निगम यह भी बता पाएगा कि उसके शौचालयों की क्या स्थिति रही है? क्या, वाकई ये इस्तेमाल लायक रहे हैं? क्यों बिहार विद्यालय परीक्षा समिति, बोरिंग रोड चौराहा जैसी जगहों पर स्थित डीलक्स शौचालयों पर कब्जा रहा है? निगम अपने शौचालयों तक को चलाने में असमर्थ है, तो इसका जिम्मेदार किसे माना जाए?

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बहरहाल, मैं तय नहीं कर पा रहा हूं कि कौन, किसको, कितना बरगला रहा है; ठग रहा है? और ऐसा क्यों है? क्या, मौज में नौकरी काट लेने के लिए “आइडिया की खेती” जरूरी है? ऐसे आइडियाबाजों को कहां से ताकत मिलती है? इनको रोकने वाला, इनके ऐलानों की मॉनिटरिंग करने वाला कोई नहीं है?’

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