असहज हैं नीतीश कुमार या डेमोक्रेसी कायम हो रही है जदयू में!

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का फाइल फोटो

लाइव सिटीज (रुद्रप्रताप सिंह) : जदयू के हाल के कुछ फैसले पर गौर करें. फिर इनका मिलान राष्ट्रीय अध्यक्ष और सीएम नीतीश कुमार के व्यक्तित्व से करें. दो बातें सामने आएंगी. पहली, जदयू में डेमोक्रेसी कायम हो गई है. फैसला बहुमत के आधार पर हो रहा है. दूसरी, नीतीश कुमार बेहद दबाव में हैं. मन लायक फैसले नहीं ले पा रहे हैं. अगर दूसरी बात सही है तो यह जदयू के साथ-साथ राज्य और यहां तक कि नीतीश की अपनी सेहत के लिए भी ठीक नहीं है. किसी भी दल में डेमोक्रेसी नहीं है. लिहाजा, दूसरी बात यानी बेहद दबाव का मामला ही सच के अधिक करीब लग रहा है.

क्यों उठ रहे सवाल
ताजा मामला विधान परिषद की दो सीटों की उम्मीदवारी से जुड़ा है. दोनों उम्मीदवार खालिद अनवर और रामेश्वर महतो जदयू के लिए एकदम से नए हैं. इन्हें उम्मीदवार बनाने को लेकर खुले तौर पर आरोप लग रहा है. महतो के बारे में बताया जाता है कि धन के जोर पर उम्मीदवारी मिली. खालिद के बारे में भी कुछ ऐसा ही है. मसलन, मुसलमानों का बड़ा जलसा आयोजित करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी. मुस्लिम वोटों को जदयू से जोड़ने की गरज से उम्मीदवार बनाया गया. हालांकि, जलसा के आयोजन के तुरंत बाद उपकृत हो जाने के लिए मुस्लिम बिरादरी में खालिद की तीखी आलोचना हो रही है. इसके चलते दीन को बचाने के लिए आयोजित पूरे जलसे पर ही सवाल खड़ा हो गया है.

एकदम नया है यह रूप
चुनाव के दिनों में धन से मदद करनेवालों को राज्यसभा या विधान परिषद में भेजकर पुरस्कृत करने की पुरानी परिपाटी रही है. 2005 के विधानसभा चुनाव में आर्थिक मदद के एवज में किंग महेंद्र को अगले साल राज्यसभा में भेजा गया. आलोचना हुई तो जदयू की ओर से सफाई दी गई कि किंग की मदद से ही उस चुनाव में जदयू का हेलीकाॅप्टर उड़ पाया था. जदयू के तत्कालीन नेता जार्ज फर्नांडीस ने अपने किसी सहयोगी के कहने पर आर्थिक मदद रोक दी थी. किंग महेंद्र उस बुरे दौर में तारणहार बनकर आए. इस सफाई के बाद किसी ने कभी भी किंग को राज्यसभा में भेजने पर ऐतराज नहीं किया. यहां तक कि जब उन्हें तीसरी बार राज्यसभा में भेजा गया. लोगों ने यही माना कि किंग ने अगले लोकसभा चुनाव में होनेवाले खर्च को लेकर नीतीश कुमार को बेफिक्र कर दिया है. लेकिन, रामेश्वर महतो जैसे नवधनाढय से भी नीतीश कुमार को उपकृत होने की जरूरत पड़ जाए, यह बात कुछ हजम नहीं हो रही है.

किंग महेंद्र

अपने सिर पर नहीं लिया
नीतीश कुमार के व्यक्तित्व को देखें तो विधान परिषद की उम्मीदवारी का फैसला उनके लिए भारी चोट से कम नहीं है. नीतीश इससे परिचित थे. यही कारण है कि हर बार की तरह उन्होंने उम्मीदवारों के चयन के लिए खुद अधिकृत होने के बदले चार सदस्यीय कमेटी का गठन कर दिया. कल अगर कोई बड़ा और परेशान करनेवाला खुलासा हो तो नीतीश यह कहकर निकल सकते हैं कि पार्टी में डेमोक्रेसी है. बहुमत के फैसले का उन्होंने सम्मान किया. नकारात्मक असर नजर आ रहे हैं. महतो की उम्मीदवारी को लेकर जदयू के जमीनी कार्यकर्ताओं में नाराजगी है. उनकी नजर में नीतीश की इज्जत कम हुई है. खालिद इस हद तक एक्सपोज हो चुके हैं कि शायद ही किसी मुस्लिम को जदयू से जोड़ पाएं. जलसे में आए लोग भी ठगे महसूस कर रहे हैं कि दीन के नाम पर उनका इस्तेमाल कर लिया गया.

खालिद अनवर

अति पिछड़े कहां रह गए
जातिवादी राजनीति में नीतीश कुमार की अपनी बिरादरी बहुत असरदार नहीं है. लेकिन, अतिपिछड़ों का समर्पण उन्हें ताकतवर बना देता है. ताज्जुब की बात है कि नीतीश ने इस बार किसी अति पिछड़े को राज्यसभा या विधान परिषद में नहीं भेजा. जबकि, दोनों सदनों से इस बिरादरी के तीन सदस्यों का कार्यकाल खत्म हुआ. वैसे, यह अपने आप में अलग किस्सा है कि इस बार किसी दल ने दोनों सदनों में किसी अति पिछड़े को नहीं भेजा, जबकि 2005 के बाद अति पिछड़े सभी दलों के आकर्षण के केंद्र बने हुए हैं.

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बाहरी दबाव भी है
कई घटनाओं को जोड़कर देखें तो नीतीश कुमार आंतरिक ही नहीं, बाहरी दबाव भी झेल रहे हैं. डीजीपी के पद पर केएस द्विवेदी की पोस्टिंग उनकी इच्छा के विरुद्ध हुई. जहानाबाद उपचुनाव में उन्हें जबरन धकेला गया. गुजरात विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार देने के लिए मजबूर किया गया. रामनवमी के मौके पर प्रायोजित तनाव को रोकने के मामले में उन्हें देर तक मूकदर्शक बना कर रखा गया. और तो और, पूर्व सीएम राबड़ी देवी के आवास की सुरक्षा में कटौती के संवेदनशील मसले पर उनकी राय नहीं ली गई. ये घटनाएं बताती हैं कि नीतीश असहज महसूस कर रहे हैं. यह असहजता लगातार बढ़ रही है. तभी तो राजनीतिक गलियारे में एक असंभव समीकरण की कल्पना के साथ सवाल पूछा जा रहा है- क्या नीतीश के कदम एकबार फिर बड़े भाई की कोठी की ओर बढ़ चले हैं?

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