नीतीश कुमार के साथ नहीं रह सकते उपेंद्र कुशवाहा, राजद बहुत देने को तैयार है

लाइव सिटीज डेस्क (रुद्रप्रताप सिंह) : रालोसपा की ओर से आयोजित मानव श्रृंखला में राजद के प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे और वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी शामिल हुए. पार्टी अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा बता रहे हैं कि उन्होंने सभी दलों से इस आयोजन में शामिल होने की अपील की थी. किसी दल को अलग से न्यौता नहीं दिया था. यह सच भी है. इसके साथ यह सवाल अपना जवाब खोज रहा है- राजद ने क्यों उनकी अपील का सम्मान किया. एनडीए के दूसरे घटक दलों ने नोटिस क्यों नहीं ली, जबकि रालोसपा एनडीए का अंग है.

मानव श्रृंखला में राजद की सांकेतिक भागीदारी से इस अनुमान को आधार मिला है कि उपेंद्र कुशवाहा एनडीए में बहुत सहज महसूस नहीं कर रहे हैं. आनेवाले दिनों में वे राजद के करीब हो सकते हैं. एनडीए में उपेंद्र की असहजता कई बार जाहिर हुई. राज्य सरकार में उनके दल का प्रतिनिधित्व नहीं है. केंद्र सरकार में भी उनकी भागीदारी नाम के लिए ही है. बेशक उनका विभाग बड़ा है. मगर, उसमें उनकी हैसियत निर्णायक नहीं है. एनडीए का घटक रहने के कारण दूसरे राज्यों में रालोसपा का विस्तार बाधित है. यूपी विधानसभा चुनाव में उन्हें उम्मीदवार खड़ा करने से रोका गया. भाजपा के दबाव के चलते रालोसपा दिल्ली नगर निगम का चुनाव नहीं लड़ पाई.

‘मानव कतार’ में उपेंद्र कुशवाहा के साथ शामिल राजद के शिवानंद तिवारी

राजद से नजदीकी क्यों?
उपेंद्र कुशवाहा अनजाने में ही राजद के करीब नहीं पहुंच रहे हैं. स्थितियां उन्हें राजद के करीब ला रही हैं. जदयू के एनडीए में शामिल होने के बाद आनेवाले चुनावों में घटक दलों के बीच लोकसभा और विधानसभा की सीटों का नए सिरे से बंटवारा होगा. इसका सीधा असर रालोसपा, लोजपा और हम जैसे घटक दलों पर पड़ेगा. लोकसभा और विधानसभा के पिछले चुनावों की तुलना में इन दलों की सीटें कम होंगी. विधानसभा चुनाव में हैसियत से अधिक सीट हासिल करने के नाम पर इन घटक दलों को फटकार पहले ही लग चुकी है. अगला कदम यही होगा, इनकी सीटें कम कर दी जाएंगी. ऐसे में राजद गठबंधन में शामिल होने के अलावा रालोसपा और हम जैसे दलों के पास अधिक विकल्प नहीं बचेगा.

नीतीश कुमार, सीएम (फाइल फोटो)

नीतीश के साथ नहीं रह सकते
एनडीए के घटक के तौर पर भले ही उपेंद्र कुशवाहा गाहे-बगाहेे सीएम नीतीश कुमार की तारीफ कर दें, मगर नीतीश के साथ स्थायी तौर पर उनका रहना संभव नहीं है. कुशवाहा के मन में यह कसक है कि नीतीश ने उनकी हकमारी की. नीतीश बीच में नहीं आते तो विपक्ष के नेता रहने के चलते सीएम पद पर उनकी दावेदारी बनती थी. वे सीएम तो नहीं बन पाए, विधानसभा का चुनाव भी हार गए. अपनी हार के लिए उपेंद्र कहीं न कहीं नीतीश को जिम्मेवार मानते रहे हैं.

राजद की झोली में है बहुत
एनडीए की तुलना में रालोसपा के लिए राजद की झोली में बहुत कुछ है. मसलन, लोकसभा और विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी को अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने का अवसर मिल सकता है. राज्य में सरकार बनने की हालत में सम्मानजनक भागीदारी मिल सकती है. अब तक की रणनीति के हिसाब से राजद विधानसभा की 150 सीटों पर चुनाव की तैयारी कर रहा है. बाकी सीटें वह सहयोगी दलों के लिए छोड़ देगा. रालोसपा की तरह हम की भी राजद के प्रति हमदर्दी है. राजद के खाते में हम के लिए भी सीटों का इंतजाम है.

नालंदा से चुनाव लड़ने का है आॅफर
बताया जाता है कि लालू प्रसाद चाहते हैं कि उपेंद्र कुशवाहा को लड़ना है तो वे नीतीश कुमार से आर-पार की लड़ाई लड़ें. इसके लिए सबसे माकूल है कि 2019 का लोकसभा चुनाव उपेंद्र कुशवाहा नालंदा से लड़ें. लालू प्रसाद की यह बड़ी चाहत नीतीश कुमार के सबसे सुरक्षित गढ़ को ढाहने की है. हालांकि कुशवाहा ने नालंदा की बड़ी लड़ाई के लिए अभी कोई हामी नहीं भरी है. 2014 का लोकसभा चुनाव भी नालंदा में जदयू के प्रत्याशी कौशलेंद्र कुमार गिरते-लुढ़कते जीते थे.

आज की मानव कतार के बाद उपेंद्र कुशवाहा आनेवाले दिनों में जहानाबाद विधानसभा के उपचुनाव के लिए रालोसपा प्रत्याशी की घोषणा कर एनडीए के लिए और बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकते हैं. अभी उपचुनाव की घोषणा हुई नहीं है, पर कुशवाहा तैयार हैं. यह सीट राजद विधायक मुंद्रिका सिंह यादव के निधन से खाली हुई है. चर्चा में कुशवाहा के उम्मीदवार के तौर पर गोपाल शर्मा का नाम लिया जा रहा है. अगर सचमुच उपेंद्र कुशवाहा ने अभी ऐसा कर दिया तो जदयू-भाजपा के समक्ष बड़ा धर्मसंकट पैदा होगा. 2015 में यह सीट एनडीए के खाते से रालोसपा में ही गयी थी, पर तब जहानाबाद के सांसद अरुण कुमार साथ थे. अभी वे कुशवाहा के बागी हैं. राजनीति में अपने बेटे को भी आगे ला रहे हैं. जहानाबाद की सीट पर जदयू की नजर भी है, क्योंकि 2015 के विधानसभा चुनाव के पहले यहां से विधायक जदयू के अभिराम शर्मा थे.