विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी परिषद की हार- क्या खतरे की घंटी !

लाइव सिटीज डेस्क : केंद्र में नरेंद्र मोदी की भाजपा सरकार है. आधे से अधिक राज्यों में भाजपा की सरकार बन गयी है. बिहार में विधानसभा चुनाव में भले ही भाजपा पटकनी खा गयी, लेकिन अब यहां भी भाजपा सत्ता में आ गयी है. भाजपा के बल पर समर्थित संगठन एबीवीपी के लोग भी खुद को अपने-अपने राज्यों में मजबूत होने के दावे कर रहे हैं. इसके बाद भी जिस तरह से राज्यों में एबीवीपी आ रही है, क्या यह भाजपा के लिए अनहोनी के संकेत तो नहीं. सवाल उठने लगे हैं कि युवा दक्षिणपंथी विचारों को नकारने लगे हैं अथवा बेरोजगारी बढ़ गयी है.

बिहार के पॉलिटिकल कॉरिडोर में इसे लेकर फुसफसाहट तेज हो गयी है. एक्सपर्ट की मानें तो तीन वर्षों में केंद्र की ओर से कोई उपलब्धि नहीं दिख रही है. युवाओं में निराशा आ रही है. उनकी आजादी छीनी जा रही है. उन पर विचार थोपे जा रहे हैं. कुछ ऐसी बातें अब चैनलों में भी छन कर आ रही हैं. इसके संकेत विभिन्न राज्यों की यूनिवर्सिटी में हो रहे छात्र संघ के चुनावी रिजल्ट से मिलने लगे हैं. सब जगह एबीवीपी हार रही है. सूत्रों की मानें तो इस पर भाजपा भी मंथन करने लगी है.

सबसे बड़ा झटका दिल्ली यूनिवसिर्टी ने दी. वहां पर चार साल से एबीवीपी का कब्जा था. लेकिन, इस बार बाजी पलट गई. दिल्ली यूनिवर्सिटी में अध्यक्ष व उपाध्यक्ष पद पर एनएसयूआई का कब्जा हो गया. यह दिल्ली में एबीवीपी की बड़ी हार है. अध्यक्ष पद पर रॉकी तूसीद और उपाध्यक्ष पद पर कुणाल शेरावत ने कब्जा जमाया. एबीवीपी को यहां महज दो सीटें मिलीं, वो भी अध्यक्ष व उपाध्यक्ष की बाद वाली. वहीं जेएनयू में तो एबीवीपी फिर एंट्री नहीं कर पायी. लेफ्ट यूनिटी ने जेएनयू में क्लीन स्वीप कर लिया. चारों सीटों पर लेफ्ट यूनिटी का कब्जा हो गया.

इतना ही नहीं, जेएनयू और डीयू के अलावा अन्य राज्यों में भी एबीवीपी को धूल फांकनी पड़ी है. राजस्थान, पंजाब, गुवाहाटी की यूनिवर्सिटी में भी एबीवीपी को करारी हार मिली है. राजस्थान यूनिवर्सिटी में तीन बड़ी सीटें हारी हैं. इसमें अध्यक्ष पद भी शामिल हैं. इन पदों पर एनएसयूआई का कब्जा हो गया है. यहीं मामला खत्म नहीं होता है. पंजाब यूनिवर्सिटी में भी एबीवीपी को असफलता हाथ लगी है. अध्यक्ष समेत तीन पदों पर एनएसयूआई का कब्जा हो गया है.

इसके बाद से पॉलिटिकल कॉरिडोर में तरह तरह के सवाल उठने लगे हैं. तीन साल में केंद्र में भाजपा की सत्ता रहने के बाद भी एबीवीपी लगातार हार रही है. खास कर उन राज्यों में भी जहां की सरकारें भी भाजपा की हैं. पॉलिटिकल एक्सपर्ट की मानें तो इसके पीछे कहीं न कहीं युवाओं में आक्रोश है. यह भाजपा के लिए शुभ संकेत नहीं है. वह इसलिए कि भाजपा भी मानती है कि युवा ही उसकी पार्टी के आधार वोट है. लेकिन हकीकत भी यही है कि तीन वर्षों में देश में बेकारी की समस्या बढ़ी है. उन पर जबर्दस्ती विचार थोपे जा रहे हैं.

गौरतलब है कि जब भाजपा केंद्र की सत्ता में आयी थी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने युवाओं से वादा किया था. कहा था हर साल दो करोड़ नौकरी दी जायेगी. लेकिन आज बेकारी की समस्या बढ़ गयी है. इसे केंद्र सरकार भी अपनी रिपोर्ट में मान रही है. सरकार के इकॉनोमिक्स सर्वे की रिपोर्ट को मानें तो वर्ष 2011-12 की तुलना में बेरोजगारी बढ़कर 5 परसेंट हो गया है. सर्वे रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2011-12 में बेरोजगारी 3.8 परसेंट थी, जो वर्ष 2015-16 में 1.2 परसेंट के उछाल के साथ 5 परसेंट हो गयी.

इकॉनोमिक्स सर्वे की रिपोर्ट यह भी बताती है कि नई नौकरी के मामले में बुरी स्थिति है. कहां हर साल 2 करोड़ नई नौकरी का वादा था और कहां वर्ष 2015 में महज 1 लाख 35 हजार ही नई नौकरी की स्थिति बनी है. जबकि, वर्ष 2011-12 में नई नौकरी 9 लाख 30 हजार थी. इतना ही नहीं, प्राइम मिनि​स्टर इंप्लाइमेंट जेनरेशन प्रोग्राम के तहत तैयार किये जानेवाले रोजगार के अवसर में भी काफी गिरावट आयी है. आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2012-13 में प्राइम मिनि​स्टर इंप्लाइमेंट जेनरेशन प्रोग्राम 4.28 लाख रोजगार दिये गये थे, जो अब घट कर 3.23 लाख हो गये हैं. यानी यहां भी 24.4 परसेंट की गिरावट आ गयी है.

देश में बढ़ती बेरोजगारी से युवाओं में चिंता बढ़ गयी है. वे यूनिवर्सिटी में पढ़ाई तो कर रहे हैं लेकिन चिंतित भी है कि यहां से निकलेंगे तो कहां जायेंगे. अब तो स्थायी नौकरी भी बीते जमाने की बात हो रही है. सब जगह टेंडर का जमाना आ गया है. इससे खुद को युवा कॅरियर के प्रति असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. सरकार वादा पर वादा कर रही है लेकिन जमीन पर की हकीकत कुछ और ही है.

यह तो हुई बेरोजगारी की बात. लेकिन सरकार की अन्य योजनाओं को भी देखें तो कुछ ऐसी ही स्थिति है. युवाओं की ही मानें तो केंद्र का एक भी ऐसा बड़ा प्रोजेक्ट नहीं है, जो तीन वर्षों में पूरा होते दिखा है. मेक इन इंडिया का हाल यह है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में कोई 500 करोड़ का भी निवेश करने को तैयार नहीं है. बड़ी-बड़ी टेलकॉम कंपनियों में छंटनी हो रही है. जीएसटी ने छोटे दुकानदारों की कमर तोड़ दी है. नोटबंदी तो उनके लिए वज्रपात बनकर आयी. कहां इससे एक लाख करोड़ की आमदनी होने की बात कही जा रही थी, वहीं अब बात आयी है कि इससे 16 हज़ार करोड़ का घाटा ही हो गया है. इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में भी बहुत उपलब्धि नहीं है. डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, स्मार्ट सिटी जैसे प्रोजेक्ट फाइलों पर ज्यादा ज़मीन पर कम दिख रहे हैं. इससे युवाओं में आक्रोश है और इसी का असर छात्रसंघ के चुनाव में दिखने लगा है. अभी भी केंद्र नहीं सतर्क हुआ तो मिशन 2019 पर प्रश्न​ चिह्न लग जायेगा.

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