होली के मौके पर पटना में सिख समुदाय ने मनाया होला-मोहल्ला पर्व

लाइव सिटीज, सेंट्रल डेस्क : राजधानी में विभिन्न समुदायों के द्वारा अलग-अलग तरह से होली का उत्साह देखने को मिलता है. वही सिखों के दूसरे तख्त श्री हरिमंदिर पटना साहिब में होली के मौके पर सिखों द्वारा शौर्य व वीरता का प्रदर्शन करते हुए उत्साह के साथ होला-मोहल्ला पर्व मनाया गया . अरदास व शस्त्र दर्शन कराने के बाद नगर-कीर्तन गया.

वीरों का भी है त्योहार

तख्त श्री पटना साहिब गुरुद्वारा प्रबन्धक कमिटी के महासचिव महेंद्रपाल सिंह ढिल्लन ने बताया कि वर्ष 1701 को आनंदपुर साहेब में दशमेश गुरु गोविंद सिंह ने आदेश दिया कि अब से होली नहीं होला मनाई जाएगी. इसे रंग-अबीर की जगह वीर सैनिकों का शौर्य का त्योहार बना दिया. सिखों द्वारा परंपरागत ढंग से पंज-प्यारों की अगुवाई में होली पर्व की सुबह नौ बजे तख्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब से नगर-कीर्तन निकाला गया .

लंगर में संगत चखती है प्रसाद

तख्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब से पंज-प्यारे और गाजे-बाजे के साथ तलवार, भाला व ढाल लिए सिख संगत श्री गोविंद सिंह घाट जाते हैं. उसके बाद झाऊगंज गली मार्ग चौक से श्री गुरु गोविंद सिंह पथ घूमते हुए सिखों का नगर-कीर्तन बाल लीला गुरुद्वारा पहुंचा . वहां हजूरी रागी जत्था के कीर्तन से संगत निहाल हुई.  कथावाचक ने होला-मोहल्ला की महत्ता पर प्रकाश डाला. वहां कीर्तन-प्रवचन के बाद विशेष लंगर में संगत पंगत में बैठ कर प्रसाद छका.  इसके बाद नगर-कीर्तन दिन में लगभग दो बजे वापस तख्त श्री हरिमंदिर पहुंचेगा.

आनंदपुर साहिब में छह दिनों तक चलता है उत्सव सिखों के पवित्र धर्मस्थान श्री आनंदपुर साहिब में होली के अगले दिन से लगने वाले मेले को होला मोहल्ला कहते हैं. यहां होली से दो दिन पहले पर्व प्रारंभ हो जाता है. होली पौरूष के प्रतीक पर्व के रूप में मनाई जाती है. यही कारण है कि दशमेश गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह ने होली के लिए पुलिंग शब्द होला मोहल्ला का प्रयोग किया. गुरु जी इसके माध्यम से समाज के दुर्बल और शोषित वर्ग की प्रगति चाहते थे.

आनंदपुर साहिब में छह दिन का उत्सव

तख्त श्री पटना साहिब गुरुद्वारा प्रबन्धक कमिटी के महासचिव महेंद्रपाल सिंह ढिल्लन ने बताया कि आनंदपुर साहिब के तीर्थपुर में तीन दिन होला मोहल्ला मनाया जाता है. ऐसे में होला मोहल्ला का उत्सव आनंदपुर साहिब में छह दिनों तक चलता है. इस मौके पर भांग की तरंग में मस्त घोड़ों पर सवार निहंग, हाथ में निशान साहेब उठाए तलवारों के करतब दिखाकर साहस, पौरूष और उल्लास का प्रदर्शन करते हैं. पंज प्यारे जुलूस का नेतृत्व करते हुए रंगों की बरसात करते हैं.

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