जोकीहाट से सबक : सत्ता में रहनेवाले नहीं पढ़ पाते दीवार पर लिखी इबारत

लाइव सिटीज डेस्क (रुद्रप्रताप सिंह) : अररिया, जहानाबाद, भभुआ और अब जोकीहाट. उपचुनाव की चार में से तीन सीटों पर एनडीए की हार का कुछ संदेश है. सीएम नीतीश कुमार अगर हार का सिलसिला और संदेश को सुन पा रहे हैं तो उनकी सेहत के लिए ठीक है. नहीं सुन पा रहे हैं तो उन्हें अगले साल होनेवाले लोकसभा और उसके अगले साल के विधानसभा चुनाव में अपनी पराजय के लिए तैयार रहना चाहिए. संदेश यह भी कि वे जमीन से लगातार कटते जा रहे हैं.

वजह कुछ और नहीं है. फीड बैक के लिए अफसरों पर निर्भरता और गैर-राजनीतिक सलाहकारों की टोली है, जो उन्हें मन को भानेवाली झूठी सूचनाओं से भाव विभोर करती रहती है.

सुशासन/499

‘सुशासन/499’ यह कमेंट भतीजा तेजस्वी यादव ने किया है. यह बताते हुए कि लोकसभा उपचुनाव में जोकीहाट विधानसभा क्षेत्र में भाजपा को जितने वोट मिले थे, उससे 499 अधिक वोट विधानसभा उपचुनाव में राजद उम्मीदवार को मिले. कमेंट में तल्खी है. सीएम को खराब लगेगा. लेकिन, सच यह है कि उम्मीदवारी के चयन के समय ही जदयू की हार की इबारत लिख दी गई थी. एक तरह से बदनाम उम्मीदवार का चयन किया गया. कार्यकर्ताओं ने सावधान भी किया. लेकिन, दरबार में तो नए प्रयोग करनेवालों की जिद ही चली. नतीजा सामने है. हर कोई जानता है कि जोकीहाट में जदयू के पूर्व विधायक मंजर आलम की छवि किसी अन्य उम्मीदवार की तुलना में अच्छी है. लेकिन, गांठ की कमजोरी के चलते दरबारियों को वे नहीं रीझा पाए.

सतही आकलन का हश्र भी है

सब जानते हैं कि भाजपा से दोबारा जुड़ने के बाद अल्पसंख्यकों के बीच नीतीश कुमार की स्वीकार्यता पहले की तरह नहीं रह गई है. फिर से पैठ बनाने के लिए गंभीर प्रयास किए जा सकते थे. इसके बदले सतही उपाय किए गए. दीन बचाओ सम्मेलन के आयोजकों में से एक को विधान परिषद का सदस्य बना दिया गया. पैठ बनाने का यह प्रयास उल्टा पड़ गया. अल्पसंख्यकों ने माना कि खरीद-फरोख्त के जरिए उन्हें पटाने की कोशिश हो रही है. भाजपा के प्रचारक के तौर पर अर्जित शाश्वत की मौजूदगी ने जदयू की जड़ में मटठा डालने जैसा असर दिखाया. न इधर के रहे न उधर के रहे. धर्मनिरपेक्ष छवि वाला वोट पहले खिसक गया था. भाजपा का कटटर हिन्दुवाद भी काम नहीं आया.

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अलगाव को जनता ने एप्रूव नहीं किया

विधानसभा के पिछले चुनाव में महागठबंधन को राजद, जदयू और कांग्रेस के समर्थकों का वोट मिला. इसमें बड़ा हिस्सा उन लोगों का भी था, जो मन से भाजपा विरोधी हैं. इस श्रेणी के वोटरों ने राजद से अलग होकर भाजपा के साथ फिर से शुरु की गई दोस्ती को पसंद नहीं किया. सीधा हिसाब यह बना कि जिन लोगों ने नीतीश को वोट दिया था, वह वोट भाजपा के विरोध में भी था. ये लोग भाजपा से मिलने के बाद नीतीश के विरोधी हो गए. लेकिन, जनाधारविहीन दरबारी उन्हें इस तथ्य को समझने नहीं देंगे. उस दिन भी नहीं समझने दिया, जहानाबाद विधानसभा उपचुनाव में राजद का मार्जिन 2015 के विधानसभा चुनाव की तुलना में बहुत बढ़ गया. उससे पहले जदयू के लोग यही कह रहे थे कि विधानसभा में राजद की शानदार जीत नीतीश कुमार के चलते हुई थी. इसका जवाब जहानाबाद के बाद जोकीहाट ने दिया. भाजपा और राजद के गठबंधन के सहारे तीन चुनावों में जोकीहाट पर जदयू का कब्जा था. इस बार भाजपा की मदद से भी कब्जा कायम नहीं रह सका.

समर्थक भी निराश हैं

नीतीश कुमार की मौजूदा राजनीतिक दिशा से उनके कटटर समर्थक भी निराश हैं. भाजपा में उनकी कितनी इज्जत है, भाजपाई जब तक इसका अहसास करा दे रहे हैं. शुरुआत पटना यूनिवर्सिटी को केंद्रीय विवि का दर्जा देने की उनकी मांग को खारिज करने से हुई. स्पेशल स्टेटस की मांग धरी रह गई. सीएम के गाइड की भूमिका निभा रहे सांसद आरसीपी सिंह बता रहे हैं कि अब यह मांग पीएम से नहीं की जाएगी. सीधे पंद्रहवें वित्त आयोग से की जाएगी. मतलब कुछ मांगने की औपचारिकता की जाएगी. कुल उपचुनाव के नतीजे नीतीश के लिए गंभीर चेतावनी है. जल्दी समझ लें तो बेहतर. वैसे, लगातार सत्ता में बने रहनेवाले लोग दीवार पर लिखी इबारत नहीं पढ़ पाते हैं.

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